मध्य प्रदेश में मिलावट और फर्जीवाड़े का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में सामने आए अलग-अलग मामलों ने यह साबित कर दिया है कि मुनाफे की लालच में मिलावटखोर अब हर हद पार कर रहे हैं—चाहे वह खाद्य सामग्री हो, निर्माण कार्य हो या फिर जमीन का कारोबार। नकली तेल, नमक, घी से लेकर करोड़ों के डामर घोटाले तक, हर जगह धोखाधड़ी का जाल फैला हुआ है।

इंदौर में नकली टाटा नमक का खेल

इंदौर के लोकनायक नगर में पुलिस ने नकली नमक पैकिंग करने वाले एक युवक को गिरफ्तार किया। आरोपी सियागंज से सस्ता खुला नमक खरीदकर उसे ब्रांडेड “टाटा नमक” के पैकेट में भरकर बेच रहा था।

पुलिस ने मौके से 840 नकली पैकेट और करीब 1850 किलो कच्चा नमक जब्त किया। आरोपी दिल्ली से ब्रांडेड पैकेजिंग मंगवाता था और इतनी सफाई से पैकिंग करता था कि लोगों को शक तक नहीं होता था। यह धंधा वह पिछले दो-तीन महीनों से चला रहा था और मोटा मुनाफा कमा रहा था।

नकली घी कांड से जमीन माफिया तक

इंदौर में नगर निगम ने अवैध कॉलोनी पर बड़ी कार्रवाई करते हुए 12 रो-हाउस तोड़ दिए। इस मामले में चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि इस अवैध निर्माण से जुड़ा व्यक्ति पहले नकली घी बनाने के मामले में आरोपी रह चुका है। जानकारी के मुताबिक, पहले पॉम ऑयल और एसेंस से नकली घी बनाकर बेचा जाता था, जिसमें 60% तक का मुनाफा कमाया जाता था। कार्रवाई के बाद अब वही लोग जमीन के अवैध कारोबार में उतर गए हैं और भोले-भाले लोगों को प्लॉट बेचकर ठग रहे हैं।

ब्रांडेड कंपनियों की नकल कर बाजार में उतारे जा रहे उत्पाद

मंडीदीप में नकली तेल का बड़ा पर्दाफाश 

औद्योगिक क्षेत्र मंडीदीप में दिल्ली कोर्ट के आदेश पर हुई कार्रवाई में नकली तेल पैकेजिंग का बड़ा मामला सामने आया। यहां कथित रूप से प्रसिद्ध ब्रांड ‘रुचि स्टार’ की नकल कर “नव रूशि” नाम से तेल बाजार में बेचा जा रहा था। जांच में पाया गया कि पैकेजिंग, डिजाइन और नाम इस तरह तैयार किए गए थे कि आम उपभोक्ता असली और नकली में फर्क नहीं कर सके। इस मामले में करीब 20 लाख रुपए का सामान जब्त किया गया है। कोर्ट ने इसे गंभीर मानते हुए संबंधित फर्म को ऐसे किसी भी उत्पाद के निर्माण और बिक्री पर रोक लगा दी है।

डामर घोटाला: सड़कों में भी मिलावट

मामला केवल खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं है। रीवा और मऊगंज जिलों में 2017 से 2021 के बीच सड़क निर्माण में 18.59 करोड़ रुपए का डामर घोटाला सामने आया है। जांच में खुलासा हुआ कि घटिया गुणवत्ता के डामर का उपयोग किया गया, जबकि बिल इंडियन ऑयल के नाम से उच्च गुणवत्ता के लगाए गए। इस फर्जीवाड़े में विभागीय अधिकारी और ठेकेदारों की मिलीभगत सामने आई है। ईओडब्ल्यू ने 44 लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया है।

मुनाफे की लालच में जनता से खिलवाड़

इन सभी मामलों में एक बात समान है। मिलावटखोर सस्ते कच्चे माल का उपयोग कर ब्रांडेड पैकेजिंग में बेच रहे हैं, जिससे उपभोक्ता ठगा जा रहा है। यह न केवल आर्थिक धोखाधड़ी है, बल्कि लोगों की सेहत के साथ भी खिलवाड़ है। नकली खाद्य पदार्थ बीमारियों को न्योता दे सकते हैं, जबकि घटिया निर्माण आम लोगों की जान के लिए खतरा बन सकता है।

लघुकथा संग्रह
चमक जुगनूं की

जुगनुओं का काफिला


किसी भी साहित्यिक विधा की प्रतिष्ठा उसके रचनाकारों की निष्ठा, संवेदनशीलता और विचार-विवेक से जुड़ी होती है। हिंदी-लघुकथा को उसका उचित मान और सम्मान दिलाने में जिन कथाकारों ने अपनी ज़मीन की तरह अडिग भूमिका निभाई, उनमें प्रताप सिंह सोढ़ी का नाम आदर और गरिमा के साथ लिया जाता है। एक शिक्षाविद् के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी क़लम कभी विश्राम नहीं लेती। बल्कि यही कालखंड उनके रचनात्मक जीवन का सबसे ऊर्जस्वित और सारगर्भित दौर बनकर उभरा है।

मध्य प्रदेश की कथा परंपरा में उन्होंने अपने लिए एक विशिष्ट स्थान अर्जित किया है। उनका लेखन अनुभव की संजीवनी से सिंचित है और भाषा में एक ऐसी सहजता है जो पढ़ने वाले को भीतर तक स्पर्श करती है। प्रताप सिंह सोढ़ी न केवल जीवन की गहराइयों को शब्द देने वाले कथाकार हैं, बल्कि विक्रम सोनी, सतीश दुबे और डॉ. सतीशराज पुष्करणी जैसे लघुकथा के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों के समकालीन भी हैं। यह समकालीनता केवल समय की साझेदारी नहीं है, बल्कि विचार, दृष्टि और प्रतिबद्धता की साझी ज़मीन पर खड़ी हुई आत्मीयता है। उनकी कहानियां मनुष्य के भीतर के रसायन को टटोलती हैं, कभी विस्थापन की पीड़ा में, कभी सत्ता के छलावे में, कभी रिश्तों के बुनियादी प्रश्नों में और कभी मौन में दबी करुण पुकार में। वे लघुकथा को केवल आकार में लघु नहीं मानते, बल्कि उसे सार और संकेत की सबसे प्रभावशाली विधा के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। यह संग्रह उनके उन विचारों और अनुभवों की दस्तावेज़ी प्रस्तुति है, जो उन्होंने जीवन की धूल और धूप में खड़े होकर अर्जित किए हैं। उनकी रचनाएँ पाठक से संवाद करती हैं, सिर्फ़ कथा नहीं कहतीं, बल्कि सोचने को विवश करती हैं। प्रताप सिंह सोढ़ी की लघुकथाएँ महज़ कथानक नहीं, समय की नब्ज़ हैं। इन्हें पढ़ते हुए हमें न केवल एक वरिष्ठ कथाकार से साक्षात्कार होता है, बल्कि एक ऐसे मनुष्य से भी, जिसने साहित्य को जीवन की संवेदनशील व्याख्या का माध्यम बनाया है।

प्रताप सिंह सोढ़ी अपनी रचनाओं में कभी लेखक के रूप में हस्तक्षेप नहीं करते। वे न तो पात्रों की ओर से बोलते हैं, न ही पाठक को दिशा देने का प्रयास करते हैं। लेकिन आश्चर्य यह है कि हर रचना में उनका व्यक्तित्व एक सौम्य ध्वनि की तरह उपस्थित रहता है, एक ऐसा स्वर जो भले ही प्रत्यक्ष न हो, पर उसकी उपस्थिति गहन होती है। उनकी कहानियों में कहीं कोई प्रचार नहीं, कोई आग्रह नहीं, फिर भी हर कथा के भीतर एक सहज आत्मीयता, एक स्नेहिल दृष्टि और एक गहरी मानवीयता साँस लेती मिलती है। उनका धार्मिक विश्वास जड़ नहीं, जीवंत है। वह उपदेश देने वाला नहीं, बल्कि जीवन को सहभाव और समरसता से देखने वाला दृष्टिकोण है। इसलिए जब उनकी कथा के पात्र किसी संकट से गुज़रते हैं, तो पाठक के भीतर एक करुणा उपजती है, जो केवल लेखक की संवेदना के कारण संभव हो पाती है। यह उनकी लेखनी का चमत्कार ही है कि वे स्वयं अनुपस्थित रहते हुए भी हर पंक्ति में उपस्थित रहते हैं। पाठक को ऐसा अनुभव होता है जैसे कोई बुज़ुर्ग, जिसके जीवन ने बहुत कुछ देखा-झेला है, मौन रहकर भी अपने अनुभवों की आँच से रचना को तपाकर हमें सौंप रहा हो। प्रताप सिंह सोढ़ी की लघुकथाएँ इसलिए भी अनमोल हैं, क्योंकि वे न तो शोर मचाती हैं, न निर्देश देती हैं। वे बस मानवता की थकी हुई आत्मा पर एक शीतल, स्निग्ध हाथ रखती हैं, बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती हैं।

प्रताप सिंह सोढ़ी का शिल्प ठीक उनके व्यक्तित्व की ही तरह सीधा, सादा और आत्मीय है। वे भाषा में चमत्कार की तलाश नहीं करते, न ही किसी ‘तथाकथित प्रयोगवादिता’ के मोह में उलझते हैं। उनके लिए कथा कहना सजावट नहीं, सहजता का विषय है। इसलिए उनकी कहानियाँ बनावटी जटिलता या भाषाई साज़-सज्जा से दूर रहती हैं। वे अपनी बात को संकेतों और प्रतीकों की उलझी गलियों में नहीं ले जाते, बल्कि सीधे और स्पष्ट शब्दों में रखते हैं, जैसे कोई अपने आत्मीय जन से बात कर रहा हो। यह स्पष्टता किसी वैचारिक सरलता का परिणाम नहीं, बल्कि उस गहरे आत्मविश्वास का संकेत है जो जीवन और भाषा दोनों की गहराई को जानता है। उनके शिल्प में कोई नाटकीय उतार-चढ़ाव नहीं, कोई कृत्रिम क्लाइमेक्स नहीं, पर एक सधा हुआ रचनात्मक प्रवाह है। यही प्रवाह कहानी को कहीं भी टूटने नहीं देता और पाठक को अनायास ही कथा के अंत तक बाँधे रखता है। यह शिल्प उस रचनाकार का है जिसे अपनी बात पर भरोसा है और जो जानता है कि सच्चाई को कहने के लिए सादगी ही सबसे बड़ा सौंदर्य है।

इस संग्रह में प्रस्तुत लघुकथाएँ जहाँ एक ओर लेखक की वैचारिक गहराई और रचनात्मक संतुलन को प्रमाणित करती हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी संवेदनशील दृष्टि और मानवीय सरोकारों की सघन उपस्थिति को भी सामने लाती हैं। यूँ तो हर कथा अपनी जगह एक पूर्ण अनुभव है, कथ्य, शिल्प और संवेदना की दृष्टि से, फिर भी मैं यहाँ कुछ विशेष कथाओं का उल्लेख करना चाहूँगा जो मुझे व्यक्तिगत रूप से अधिक प्रभावशाली, विचारोत्तेजक और काल-सापेक्ष प्रतीत हुईं। इन कथाओं पर कुछ शब्द कहना मैं आवश्यक समझता हूँ।

‘अनाम रिश्ते’ लघुकथा एक बस यात्रा की सामान्य-सी परिस्थिति में उत्पन्न होने वाली मार्मिक स्थिति को प्रभावशाली ढंग से उकेरती है। कथाकार द्वारा बस में यात्रा कर रही महिला के प्रति अचानक विकसित होती करुणा और सहानुभूति कथा का प्रमुख आकर्षण है। इस रचना में स्त्री-पीड़ा, सामाजिक विषमताओं तथा व्यक्तिगत त्रासदियों का सहज चित्रण देखने को मिलता है। शेष अगले अंक में

समाज को जागने की जरूरत

आईटी कंपनी में लड़कियों के यौन शोषण

नासिक की मल्टीनेशनल IT कंपनी में हिंदू महिला कर्मचारियों का यौन शोषण और ऑफिस में जबरन नमाज पढ़ने, हिंदू देवी-देवताओं का अपमान और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने का मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में कंपनी के मुस्लिम टीम लीडर्स और एचआर मैनेजर सहित 7 लोगों को गिरफ्तार किया है। 

    पुलिस जांच में पता चला कि कुछ लोग कंपनी में अपने पद का गलत फायदा उठा रहे थे। वे नौकरी के लिए आई लड़कियों को पहले भरोसे में लेते थे। उन्हें प्रमोशन और बड़े मौके का लालच दिया जाता था। फिर उन्हें ‘वीकेंड ट्रिप’ के नाम पर बड़े रिसॉर्ट या वाटर पार्क ले जाते थे, जहां उनके साथ गलत व्यवहार किया जाता था और उन पर दबाव बनाया जाता था।

    नासिक की एक मल्टीनेशनल आईटी कंपनी का मामला केवल एक कंपनी या कुछ लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। आरोप हैं कि महिला कर्मचारियों के साथ यौन शोषण, धार्मिक दबाव और मानसिक उत्पीड़न किया गया। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि मानवता और कार्यस्थल की गरिमा पर भी बड़ा आघात है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कोई भी धर्म गलत काम करने की अनुमति नहीं देता। हर धर्म मानवता, सम्मान और नैतिकता की शिक्षा देता है। लेकिन जब कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ या विकृत मानसिकता के कारण धर्म का इस्तेमाल दूसरों को दबाने या शोषण करने के लिए करते हैं, तो वह धर्म नहीं बल्कि अपराध बन जाता है।

इस तरह के मामलों में सबसे चिंताजनक बात यह है कि पीड़ित अक्सर लंबे समय तक चुप रहते हैं। डर, सामाजिक दबाव, नौकरी जाने का भय और बदनामी का खतरा उन्हें आवाज उठाने से रोकता है। यही कारण है कि कई बार ऐसे अपराध सालों तक चलते रहते हैं। इस मामले में भी आरोप है कि शिकायतें पहले की गईं, लेकिन उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। यह दर्शाता है कि संस्थानों के अंदर जवाबदेही की कितनी कमी है।

कार्यस्थल पर हर कर्मचारी को सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल मिलना उसका अधिकार है। भारत में इसके लिए सख्त कानून भी बने हैं, जैसे कि यौन उत्पीड़न कानून, जो महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया है। लेकिन कानून तभी प्रभावी होते हैं, जब उनका सही तरीके से पालन हो और शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए।

समाज को यह समझना होगा कि किसी भी प्रकार का धार्मिक दबाव, जबरन परिवर्तन, या व्यक्तिगत आस्था में हस्तक्षेप पूरी तरह गलत और असंवैधानिक है। हर व्यक्ति को अपनी आस्था और जीवनशैली चुनने का अधिकार है। इसे छीनने की कोशिश करना सीधे-सीधे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। कई युवा, खासकर नौकरी की शुरुआत में, अपने अधिकारों और कानूनी सुरक्षा के बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते। इसका फायदा गलत मानसिकता वाले लोग उठाते हैं। इसलिए जरूरी है कि कंपनियां अपने कर्मचारियों को नियमित रूप से जागरूक करें, प्रशिक्षण दें और एक मजबूत शिकायत प्रणाली विकसित करें। इसके साथ ही, परिवार और समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चों, खासकर बेटियों, से खुलकर संवाद करें। अगर उनके व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई दे, तो उसे नजरअंदाज न करें, बल्कि संवेदनशीलता से बात करें और उनकी स्थिति समझने की कोशिश करें। 


Post a Comment

Previous Post Next Post