बैसाखी को सिख धर्म में बेहद महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन के पीछे गहरा धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व जुड़ा हुआ है। पंजाब और हरियाणा में इस त्योहार को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। किसान भी इसे रबी की फसल पकने की खुशी के रूप में मनाते हैं। इस दिन गुरुद्वारों में लंगर और कीर्तन का आयोजन किया जाता है।
बैसाखी के दिन ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी और पंज प्यारों को चुना था।
13 अप्रैल 1699 को बैसाखी के पावन अवसर पर गुरु जी ने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए खालसा पंथ की स्थापना की। इसका उद्देश्य अत्याचार के खिलाफ निडर और समर्पित समाज तैयार करना था, जो निर्दोषों की रक्षा कर सके। इसके लिए उन्होंने देशभर से अपने अनुयायियों को आनंदपुर साहिब में बुलाया और उनकी आस्था व समर्पण की परीक्षा ली।
कहानी के अनुसार, गुरु जी ने अपने शिष्यों से बलिदान के रूप में शीश मांगा। उस समय पांच लोग धर्म के लिए अपना जीवन समर्पित करने के लिए आगे आए। गुरु जी उन्हें एक-एक करके तंबू के अंदर ले गए और बाहर तलवार पर खून के निशान के साथ लौटे, जिससे लोगों को लगा कि उनका बलिदान दे दिया गया है। हालांकि, वास्तव में वहां बकरों का बलिदान किया गया था। अंत में गुरु जी उन पांचों व्यक्तियों को सुरक्षित बाहर लेकर आए और उन्हें अमृत पान कराकर “पंज प्यारे” घोषित किया।
पंज प्यारों में अलग-अलग स्थानों से आए पांच व्यक्ति शामिल थे—भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई हिम्मत सिंह, भाई मोहकम सिंह और भाई साहिब सिंह। गुरु जी ने सभी को “सिंह” की उपाधि दी। ये पांचों सिख समाज में समानता, साहस और एकता के प्रतीक माने जाते हैं।

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