संपादकीय
देश में स्वच्छता के क्षेत्र में लगातार नंबर वन का खिताब हासिल करने वाला इंदौर अब एक और ‘नंबर वन’ की ओर बढ़ता नजर आ रहा है- ट्रैफिक नियम तोड़ने में नंबर वन बनने की ओर।
ऐसा लगता है कि शहर के चौराहों पर जो सिग्नल लगे हैं, उसके रंग धुंधले से हो गए हैं या फिर लोगों को नजर ही नहीं आ रहे है! यही कारण है कि दोपहिया हो या चार पहिया चालक, हर कोई जल्दी में है, और इस जल्दबाजी में नियमों को कुचलना अब आम बात हो गई है। नतीजा यह कि जो वाहन चालक नियमों का पालन करते हुए ग्रीन सिग्नल का इंतजार करते हैं, वे जाम में फंसकर रह जाते हैं। स्थिति और भी चिंताजनक तब हो जाती है जब दोपहिया वाहन चालक खुलेआम तीन-तीन, चार-चार लोगों को बैठाकर निकलते हैं। ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी में ही नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं, और टोकने पर उल्टा दबाव बनाने की कोशिश की जाती है। यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि कानून के प्रति खुली अवहेलना है। अब सवाल यह उठता है कि क्या केवल चालान काटने से यह समस्या हल हो पाएगी? आंकड़े बताते हैं कि जुर्माने भरना लोगों के लिए आसान हो गया है, लेकिन नियमों का पालन करना नहीं। ऐसे में ट्रैफिक पुलिस को पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर नवाचार की दिशा में सोचना होगा।
दरअसल, मध्यप्रदेश का गौरव, स्वच्छता का सिरमौर और पुरस्कारों का चहेता शहर ‘इंदौर’ इन दिनों नंबर वन का दूसरा चेहरा बनता जा रहा है और वह भी बिगड़ैल ट्रैफिक के लिए...? सुबह हो या शाम शहर के चौराहे अब ट्रैफिक सिग्नल के नहीं, बल्कि आजाद चौराहे के रूप में जाने जा रहे हैं! रेड लाइट का मतलब अब ‘रुकना’ नहीं, बल्कि देख लो, अगर कोई आ नहीं रहा तो निकल लो... हो गया है। पीली बत्ती तो जैसे शर्म से खुद ही झपककर बुझ जाना चाहती है... और हरी बत्ती? वह उन लोगों के लिए है जो नियमों का पालन करने की ‘पुरानी बीमारी’ ‘ईमानदारी’ से ग्रस्त हैं, जो बेचारगी से खड़े रहते हैं, जबकि बाकी जनता नियमों को तोड़कर बिना डरे नियमों को तोड़कर निकलती जाती है?
यह दृश्य केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि मानसिकता का आईना है। हर व्यक्ति को जल्दी ‘मैं क्यों रुकूं,’ और दोपहिया वाहन चालकों की बात ही क्या की जाए! वे तो जैसे सड़क पर नहीं, अपने निजी आंगन में सैर कर रहे होते हैं। यहां तक कि सड़क और चौराहों को बाप का मान बैठे है..., जिन्हें कोई बोलने वाला नहीं, कोई टोकने वाला नहीं...? एक बाइक पर तीन-तीन, चार-चार लोग हेलमेट सिर पर नहीं, हाथ में या हैंडल पर टंगा हुआ रहता है, जैसे सजावट का सामान हो। ट्रैफिक पुलिस सामने खड़ी हो, तब भी वाहन चालक निडर होकर निकल रहे यदि राह चलते किसी सभ्य नागरिक ने उन्हें समझाइश देने की कोशिश की तो तो जवाब तैयार..., ‘सामान फंसा है… ज्यादा बोले तो तुम्हें ही फंसा देंगे।’ और लगभग कई बार इंदौर में मामूली बातों पर चाकूबाजी चौराहों या सड़कों पर होती रही है।
यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं, यह कानून को चुनौती देने की प्रवृत्ति है। और जब यह प्रवृत्ति सार्वजनिक रूप से, खुलेआम और बिना किसी डर के दिखाई देने लगे, तो समझ लीजिए कि समस्या सड़कों तक सीमित नहीं रही, यह व्यवस्था की जड़ों तक पहुंच चुकी है।
वहीं, जब चुनाव के समय विश्वस्तरीय व्यवस्था के जो सपने दिखाए जाते हैं, वे चौराहे पर आते-आते धुंधले क्यों पड़ जाते हैं? क्या यह मान लिया गया है कि जनता नियम नहीं मानेगी, इसलिए सख्ती बेकार है?
ट्रैफिक पुलिस की स्थिति भी कम विडंबनापूर्ण नहीं है। एक तरफ उन्हें व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी दी जाती है, दूसरी तरफ संसाधनों, स्टाफ और अधिकारों की सीमाएं उनके हाथ बांध देती हैं। चालान काटना अब एक ‘औपचारिकता’ बनकर रह गया है, लोग जुर्माना भरते हैं..., और अगले ही दिन फिर वही गलती दोहराते हैं।
ट्रैफिक जवानों को गुलेल चलाने का देना होगा प्रशिक्षण
अब ऐसा लग रहा है कि ट्रैफिक विभाग को भी नियमों के अलावा कुछ सोचना चाहिए, जैसे जवानों को नवाचार के तहत गुलेल चलाने का प्रशिक्षण देना चाहिए... जो कार चालक और दो पहिया वाहन चालक ट्रैफिक सिग्नल तोड़े गुलेल से निशाना लगाकर अंटी से कार का कांच फोड़ देना चाहिए... अब शायद ये विकल्प बचा है यातायात सुधारने के लिए। ऐसे ही दो पहिया वाहन चालकों के पहियों की हवा निकाली जाती रही है, अब उसे पंक्चर करना चाहिए.... ताकि ऐसे लोग सुधर सके...।
लोगों को समझना होगा कि ट्रैफिक नियम केवल ‘सरकारी नियम’ नहीं हैं, यह हमारी और दूसरों की सुरक्षा के लिए बने हैं। एक रेड लाइट तोड़ना केवल समय बचाने का तरीका नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी खतरे में डालने का जोखिम है। एक ओवरलोडेड बाइक केवल नियम का उल्लंघन नहीं, बल्कि चलती हुई दुर्घटना है। और जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। शहर को “नंबर वन” बनाने का दावा करना आसान है, लेकिन उस नंबर वन की गुणवत्ता क्या है, यह तय करना ज्यादा जरूरी है। क्या हम ऐसे शहर पर गर्व करेंगे, जहां कचरा तो नहीं दिखता, लेकिन अव्यवस्था हर चौराहे पर खड़ी मिलती है? इंदौर वाकई ‘नंबर वन’ बनने की होड़ में है, चाहे वह स्वच्छता हो, या फिर नियमों की अनदेखी। फर्क बस इतना है कि एक नंबर वन हमें गर्व देता है... और दूसरा हमें आईना दिखाता है।
-जगजीतसिंह भाटिया
प्रधान संपादक
ड्रोन की नजर तेज, लेकिन ई-रिक्शा पर ढील: जवाहर मार्ग पर बिगड़े हालात
शहर में ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए ट्रैफिक पुलिस इन दिनों हाईटेक तरीकों का सहारा ले रही है। ड्रोन कैमरों के जरिए सड़कों पर नजर रखी जा रही है, जहां भी वाहन अव्यवस्थित रूप से खड़े नजर आते हैं या यातायात बाधित होता दिखता है, वहां तत्काल कार्रवाई की जा रही है। चार पहिया वाहनों में व्हील लॉक लगाया जा रहा है और दोपहिया चालकों पर चालानी कार्रवाई भी की जा रही है। पुलिस द्वारा ड्रोन से ली गई तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कर यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि शहर में यातायात व्यवस्था बेहतर हो रही है और नियमों का सख्ती से पालन कराया जा रहा है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह सख्ती हर जगह समान रूप से लागू हो रही है? अगर नहीं, तो फिर यह अभियान सिर्फ दिखावा बनकर क्यों रह गया है? जवाहर मार्ग के चौराहे, खासकर गुरुद्वारे के आसपास की स्थिति इस सवाल का सीधा जवाब देती नजर आती है। यहां ई-रिक्शा चालकों की मनमानी देखी जा सकती है। सड़क के बीचों-बीच खड़े ई-रिक्शा, सवारी भरने के लिए अचानक ब्रेक लगाना, बिना किसी निर्धारित स्टैंड के जहां-तहां रुकना, ये सभी कारण इस चौराहे को हमेशा जाम की स्थिति में बनाए रखते हैं।
इस चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस की तैनाती भी रहती है। यानी यहां न तो ड्रोन कैमरे की जरूरत है और न ही किसी विशेष तकनीक की, फिर भी स्थिति नियंत्रण में नहीं है। जहां एक ओर आम वाहन चालकों के खिलाफ सख्ती दिखाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर ई-रिक्शा चालकों को खुली छूट मिलती नजर आ रही है। क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या फिर किसी तरह का दबाव?
जवाहर मार्ग पर लगे सीसीटीवी कैमरे भी इस समस्या को नजरअंदाज करते प्रतीत होते हैं। यदि कैमरे सक्रिय हैं, तो फिर इन नियम उल्लंघनों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? और यदि कैमरे निष्क्रिय हैं, तो फिर उनकी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। करोड़ों रुपये खर्च कर लगाए गए निगरानी तंत्र का यदि सही उपयोग ही नहीं हो रहा, तो यह केवल दिखावे का माध्यम बनकर रह जाता है।
ट्रैफिक व्यवस्था को सुधारने के लिए जरूरी है कि नियम सभी पर समान रूप से लागू हों। केवल कार चालकों या दोपहिया वाहन चालकों पर कार्रवाई करके व्यवस्था को संतुलित नहीं किया जा सकता। जब तक ई-रिक्शा जैसे सार्वजनिक परिवहन साधनों को भी नियमों के दायरे में लाकर सख्ती से नियंत्रित नहीं किया जाएगा, तब तक शहर की ट्रैफिक व्यवस्था सुधरने की उम्मीद करना बेमानी है।
ई-रिक्शा चालकों के लिए निर्धारित स्टैंड बनाए जाएं, सवारी भरने और उतारने के लिए तय स्थान सुनिश्चित किए जाएं और नियमों का उल्लंघन करने पर सख्त कार्रवाई हो, ये कुछ ऐसे कदम हैं जो स्थिति में सुधार ला सकते हैं। साथ ही, ट्रैफिक पुलिस को भी अपनी कार्रवाई में पारदर्शिता और निष्पक्षता दिखानी होगी, ताकि आम जनता का भरोसा बना रहे।
आज जरूरत इस बात की है कि ट्रैफिक प्रबंधन केवल तकनीक का प्रदर्शन न बनकर वास्तविक सुधार का माध्यम बने। ड्रोन कैमरे और सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें तभी सार्थक होंगी, जब जमीन पर भी वैसी ही सख्ती और व्यवस्था नजर आए। वरना यह पूरा अभियान सिर्फ एक दिखावटी प्रयास बनकर रह जाएगा, जिसमें समस्या वहीं की वहीं बनी रहेगी और आम जनता रोजाना जाम और अव्यवस्था से जूझती रहेगी।


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