एक ओर सरकार ‘नारी सशक्तिकरण’ के नारे के साथ महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाने की बात करती है, उन्हें नेतृत्व, प्रशासन और निर्णय लेने की भूमिकाओं में स्थापित करने के लिए योजनाएं चलाती है तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत कई बार इस आदर्श तस्वीर को झकझोर देती है।
ताजा मामला महू का है, जहां जनपद पंचायत डॉ. अंबेडकर नगर में पदस्थ उपयंत्री सावित्री मुवेल को 15 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए लोकायुक्त टीम ने रंगे हाथों गिरफ्तार किया। यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो सशक्तिकरण और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने में विफल होती नजर आ रही है।
घटना जिसने फिर खोली सिस्टम की परतें
ग्राम पंचायत यशवंत नगर के सचिव रमेशचन्द्र चौहान की शिकायत पर हुई इस कार्रवाई में यह सामने आया कि 15वें वित्त आयोग के तहत बने सीसी रोड के सत्यापन और माप पुस्तिका में मूल्यांकन दर्ज करने के बदले रिश्वत मांगी जा रही थी। शिकायत की पुष्टि के बाद लोकायुक्त ने जाल बिछाया और आरोपी उपयंत्री को रंगे हाथों पकड़ लिया। यह घटना बताती है कि भ्रष्टाचार अब किसी एक वर्ग या लिंग तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक ऐसी बीमारी बन चुका है, जिसने पूरे प्रशासनिक ढांचे को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
सवाल सशक्तिकरण पर नहीं, जिम्मेदारी पर है
महिलाओं को सशक्त बनाने का उद्देश्य उन्हें आत्मनिर्भर और समाज में बराबरी का अधिकार दिलाना है। लेकिन जब वही महिलाएं जिम्मेदार पदों पर बैठकर भ्रष्टाचार में लिप्त पाई जाती हैं, तो यह सशक्तिकरण की भावना को ही कमजोर करता है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह मुद्दा ‘महिला बनाम पुरुष’ नहीं है, बल्कि ‘ईमानदारी बनाम भ्रष्टाचार’ का है। लेकिन चूंकि महिलाओं के सशक्तिकरण को एक सामाजिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, इसलिए जब ऐसे मामले सामने आते हैं तो वे अधिक चर्चा और आलोचना का विषय बनते हैं।
महिलाओं की संलिप्तता भी बढ़ी
पिछले कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश सहित देशभर में महिला अधिकारियों की संख्या बढ़ी है। पंचायत से लेकर पुलिस और प्रशासनिक सेवाओं तक, महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। लेकिन इसी के साथ भ्रष्टाचार के मामलों में उनकी संलिप्तता भी सामने आने लगी है।
तल्ख सच्चाई: कुर्सी बदलती है, मानसिकता नहीं
असल समस्या कहीं गहरी है। यह उस मानसिकता की समस्या है, जहां सरकारी पद को ‘सेवा’ नहीं बल्कि ‘कमाई का जरिया’ समझ लिया गया है।
आज स्थिति यह है कि-
फाइल आगे बढ़ाने के लिए पैसा
माप पुस्तिका में एंट्री के लिए पैसा
भुगतान जारी करने के लिए पैसा
यानी हर स्तर पर भ्रष्टाचार का एक अनौपचारिक रेट तय हो चुका है। ऐसे में जब महिलाएं भी उसी सिस्टम का हिस्सा बनती हैं, तो वे भी उसी प्रवृत्ति में बह जाती हैं।
महिलाओं से अपेक्षाएं ज्यादा क्यों?
समाज में महिलाओं को परंपरागत रूप से अधिक संवेदनशील, ईमानदार और नैतिक माना जाता रहा है। यही कारण है कि जब कोई महिला अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त पाई जाती है, तो लोगों की प्रतिक्रिया अधिक तीखी होती है।
पुरुष अफसर भी पीछे नहीं
यह भी उतना ही जरूरी है कि इस मुद्दे को सिर्फ महिलाओं तक सीमित न किया जाए। हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार के अधिकांश मामलों में अब भी पुरुष अधिकारियों की संख्या ज्यादा है। महू की घटना के समानांतर हर सप्ताह ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जहां पटवारी, इंजीनियर, पुलिसकर्मी, नगर निगम कर्मचारी सहित तमाम सरकारी विभागों के अफसर और कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़ा रहे हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि समस्या व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है।
सिस्टम की खामियां: जहां से शुरू होती है गिरावट
भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले कुछ प्रमुख कारण हैं
- जटिल प्रक्रियाएं: आम आदमी को छोटे-छोटे काम के लिए कई चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे वह ‘शॉर्टकट’ अपनाने को मजबूर होता है।
- जवाबदेही की कमी: कई मामलों में कार्रवाई धीमी या अधूरी रहती है, जिससे दोषियों का मनोबल बढ़ता है।
- राजनीतिक संरक्षण: कुछ अधिकारियों को राजनीतिक समर्थन मिलने से वे बेखौफ होकर भ्रष्टाचार करते हैं।
लोकायुक्त की कार्रवाई: उम्मीद की किरण
महू में हुई कार्रवाई यह दिखाती है कि यदि शिकायतकर्ता आगे आए और एजेंसियां सक्रिय हों, तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती है। लोकायुक्त की अपील भी यही कहती है कि ‘डरें नहीं, शिकायत करें’
बाणगंगा में कार्रवाई
अवैध कॉलोनी में बनाए जा रहे रो हाऊस पर निगम का एक्शन
इंदौर नगर निगम की रिमूवल टीम ने सोमवार को बाणगंगा इलाके के जगदीश नगर में अवैध कॉलोनी में बनाए जा रहे रो-हाउस को तोड़ने की कार्रवाई की। शिकायत मिली थी, जिसके बाद निगम टीम ने एक्शन लिया। नगर निगम की रिमूवल टीम 3 पोकलेन मशीन और 70 से ज्यादा निगमकर्मियों के साथ इलाके में पहुंची और अवैध निर्माण को तोड़ने की कार्रवाई की। नगर निगम के रिमूवल अधिकारी अंकेश बिरथरिया ने बताया कि नगर निगम के कॉलोनी सेल डिपार्टमेंट में शिकायत मिली थी कि सर्वे क्रमांक 242/1 पर अवैध कॉलोनी काटी जा रही है, जहां रो-हाउस बनाए जा रहे हैं। एक शुभम साहू नाम का व्यक्ति इन रो-हाउस को बना रहा था। क्षेत्रीय भवन अधिकारी को शिकायत मिली थी, जिसके बाद उन्होंने यहां का मौके पर मुआयना किया। इसके बाद भवन अनुज्ञा से संबंधित कार्रवाई पूरी की गई और यह कार्रवाई की गई। अंकेश ने बताया कि यहां 12 रो-हाउस बन रहे थे। इनमें कोई नहीं रह रहा था, इसलिए इन्हें तोड़ा गया है। यहां किसी प्रकार का कोई विरोध नहीं हुआ। ये 5 से 10 हजार स्क्वेयर फीट में तैयार हो रहे थे। इन रो-हाउस में 6 बनकर तैयार हो गए थे, जिनमें पुट्टी का काम भी हो गया था, जबकि 6 रो-हाउस अंडर कंस्ट्रक्शन थे।
परिसीमन ने बढ़ाई परेशानी
पटवारी की एक साइन के लिए 10 से 50 किलोमी तक खाने पड़े धक्के
इंदौर जिले में ‘डी-सेंट्रलाइज सिस्टम’ (विकेंद्रीकरण) के नाम पर आम जनता की परेशानी दोगुनी कर दी गई है। प्रशासनिक संकुल में कलेक्टर या अपर कलेक्टर से मिलना तो आसान है, लेकिन एक पटवारी या एसडीएम के छोटे से काम के लिए लोगों को 30 से 50 किलोमीटर तक धक्के खाने पड़ रहे हैं। तहसीलों का परिसीमन बिना भौगोलिक दूरी देख कर दिया गया, जिसके चलते जिले की चार तहसीलों की जनता और वकील दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। शहर से इतनी दूर दफ्तर होने के कारण वकीलों ने भी वहां जाने से तौबा कर ली है। अधिवक्ताओं का कहना है कि कहने को पूरा सिस्टम ऑनलाइन है, लेकिन अधिकारी तो वहीं मिलेंगे। आरआई, पटवारी या एसडीएम बिना बुलाए काम नहीं करते। ये अधिकारी सिर्फ मीटिंग के लिए कलेक्टोरेट आते हैं, बाकी कामों के लिए जनता और वकीलों को तहसील मुख्यालय ही बुलाया जाता है। मोती तबेला स्थित प्रशासनिक संकुल में सारे प्रमुख अधिकारी बैठते हैं। यह संकुल बना ही इसलिए था कि जनता के सारे काम एक जगह हो सकें। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।

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