मध्यप्रदेश में पंचायत राज व्यवस्था लोकतंत्र की सबसे निचली लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई मानी जाती है। संविधान ने ग्राम पंचायतों को स्वशासन का अधिकार दिया, ताकि गांव का विकास गांव के चुने हुए प्रतिनिधि तय करें। लेकिन प्रदेश के अनेक जिलों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करती हैं। विशेषकर अनुसूचित जनजाति (ST), अनुसूचित जाति (SC) और महिला सरपंचों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। कागज़ों में वे पंचायत की मुखिया हैं, लेकिन जमीन पर उनकी जगह उनके पति, रिश्तेदार, बाहुबली दबंग और प्रभावशाली लोग पंचायत चला रहे हैं।

कुछ ऐसा ही मामला इंदौर जिले के असरावद बुजुर्ग में भी सामने आ रहा है, जहां सरपंच का काम सिर्फ अंगूठे लगाना है और वह भी तब जब कोई रसूखदार कहे कि यहां अंगूठा लगाना है तो लगा दिया जाता है। दरअसल, असरावद बुजुर्ग पंचायत में कांग्रेस के कुछ नेताओं का कब्जा है और यहां पर मनमानी इतनी ज्यादा हो गई है कि बिना रिश्वत दिए काम ही नहीं हो रहा है। आसपास के लोग नक्शे पास करवाने जाते हैं तो लाखों रुपए की मांग की जा रही है। सरपंच तो को कुछ समझ में नहीं आता, वह तो सिर्फ मुहर और अंगूठे लगाने तक सीमित है। असल खेल तो नेताओं द्वारा किया जा रहा है। उन्होंने तो सरपंच को जीताकर सिर्फ अंगूठेबाजी करने के लिए पद दिलवा दिया है। बाकी पूरा काम कथित नेता ही संभाल रहे हैं।

नाम सरपंच का, शासन चल रहा दबंगों का

ऐसा सिर्फ इंदौर जिले में नहीं, बल्कि प्रदेश के कई आदिवासी और पिछड़े इलाकों में देखने को मिल रहा है। प्रदेश के आदिवासी और पिछड़े इलाकों में बड़ी संख्या में ऐसी शिकायतें सामने आई हैं, जहां निर्वाचित महिला या एसटी सरपंच केवल नाममात्र की प्रतिनिधि बनकर रह गई हैं। पंचायत बैठकों में वे मौजूद भी नहीं रहतीं, या उन्हें बोलने नहीं दिया जाता। कई जगह उनके पति, जिन्हें आम बोलचाल में ‘सरपंच पति’ कहा जाता है, जो सभी निर्णय लेते हैं। या फिर वह दबंग नेता या समाज के लोग जिन्होंने इन्हें सरपंच की गद्दी तक पहुंचाया है।

स्थिति इतनी गंभीर है कि कई पंचायतों में असली सरपंच मजदूरी करने को मजबूर हैं, जबकि पंचायत की फाइलें, योजनाएं, भुगतान और सरकारी दस्तावेज दबंगों के कब्जे में रहते हैं। 

अंगूठा लगवाकर करोड़ों का खेल

गांवों में अशिक्षा और प्रशासनिक जानकारी की कमी का फायदा उठाकर कई दबंग तत्व सरपंचों से खाली कागजों पर हस्ताक्षर या अंगूठा लगवा लेते हैं। बाद में उन्हीं दस्तावेजों का उपयोग निर्माण कार्य, भुगतान स्वीकृति, फर्जी बिल और सरकारी योजनाओं के नाम पर धन निकासी में किया जाता है।

सील का दुरुपयोग: लोकतंत्र की मुहर अपराध के हाथों में

सरपंच की सरकारी सील पंचायत की वैधानिक पहचान होती है। लेकिन अनेक मामलों में यही सील दबंगों के पास रहती है। पंचायत भवन में चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं, बल्कि बाहरी व्यक्ति बैठकर फाइलें निपटाते हैं। कई जिलों से ऐसी शिकायतें मिली हैं कि सरपंच की सील से फर्जी प्रमाण पत्र, निर्माण स्वीकृतियां और भुगतान आदेश जारी किए गए। यह केवल वित्तीय भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि पंचायत व्यवस्था की संवैधानिक आत्मा का हनन है।

जातीय भेदभाव और सामाजिक अपमान

SC/ST और महिला सरपंचों के साथ सामाजिक भेदभाव के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं। कहीं दलित सरपंच को कुर्सी पर बैठने नहीं दिया गया, कहीं आदिवासी महिला सरपंच को तिरंगा फहराने से रोका गया। कई बार उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता है, ताकि वे पंचायत के कामकाज में दखल न दें।

यह स्थिति बताती है कि पंचायत चुनाव जीतना ही पर्याप्त नहीं,  सामाजिक सत्ता संरचना अब भी दबंग जातीय समूहों के हाथ में केंद्रित है।


समाधान?

  • सरपंच सुरक्षा प्रकोष्ठ बने - SC/ST और महिला सरपंचों के लिए जिला स्तर पर हेल्पलाइन और त्वरित सुरक्षा तंत्र।
  • डिजिटल प्रमाणीकरण लागू हो -  सील और हस्ताक्षर की जगह बायोमेट्रिक सत्यापन अनिवार्य किया जाए।
  • सरपंच प्रशिक्षण अनिवार्य हो - निर्वाचित प्रतिनिधियों को वित्तीय और कानूनी अधिकारों की जानकारी दी जाए।
  • सरपंच पति प्रथा पर सख्ती-  यदि कोई परिजन पंचायत संचालन में अवैध हस्तक्षेप करे तो तत्काल अयोग्यता की कार्रवाई हो।
  • स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट-  पंचायत खर्च और निर्णयों की तीसरे पक्ष से जांच।

धमकियां, भय और प्रशासनिक चुप्पी

कई सरपंचों ने आरोप लगाए हैं कि यदि वे विरोध करते हैं तो उन्हें धमकियां मिलती हैं- जान से मारने की, सामाजिक बहिष्कार की, या झूठे मुकदमों में फंसाने की। ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस तक पहुंच सीमित होने और राजनीतिक संरक्षण के कारण पीड़ित प्रतिनिधि शिकायत दर्ज कराने से भी डरते हैं।

सरकार के लिए  ,चेतावनी संकेत

यदि यही स्थिति बनी रही, तो पंचायत चुनाव केवल औपचारिकता बन जाएंगे। लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण, जो पंचायत राज की आत्मा है, पूरी तरह खोखला हो जाएगा। यह प्रदेश सरकार के लिए गंभीर चेतावनी है कि पंचायतों में दबंग कब्जे को केवल भ्रष्टाचार का मामला न समझा जाए, बल्कि इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के अपहरण के रूप में देखा जाए।

गांवों का लोकतंत्र कागजों में जीवित और जमीन पर होगा मृत

मध्यप्रदेश की पंचायतें आज दो राहों पर खड़ी हैं- एक तरफ संविधान का लोकतांत्रिक सपना, दूसरी तरफ दबंगों का छाया शासन। यदि सरकार अब भी नहीं चेती, तो गांवों का लोकतंत्र कागज़ों में जीवित और जमीन पर मृत घोषित हो जाएगा। सरकार को यह समझना होगा कि सरपंच की कुर्सी केवल एक पद नहीं, बल्कि गांव के लोकतांत्रिक सम्मान का प्रतीक है और जब वह कुर्सी दबंगों के कब्जे में चली जाती है, तब हार केवल एक व्यक्ति की नहीं, पूरे लोकतंत्र की होती है।


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