विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की ताजा रिपोर्टें संकेत करती हैं कि दुनिया तेजी से कचरे के ऐसे संकट की ओर बढ़ रही है, जो आने वाले दशकों में पर्यावरण, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। वर्ष 2022 में दुनिया में लगभग 2.6 अरब टन कचरा उत्पन्न हुआ, जो 2050 तक बढ़कर 3.9 अरब टन तक पहुंचने की आशंका है। इसी क्रम में यूएनईपी की ‘फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट’ बताती है कि हर वर्ष लगभग 1 अरब टन भोजन बर्बाद होता है, जिसका लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा घरों से आता है। यह स्थिति संसाधनों की भारी बर्बादी व समाज की उपभोग-प्रधान मानसिकता उजागर करती है। कचरे के बढ़ते ढेर केवल अस्वच्छता का प्रतीक नहीं , बल्कि वे पर्यावरण के लिए गंभीर वैज्ञानिक खतरा उत्पन्न करते हैं। विश्व बैंक की ‘व्हाट अ वेस्ट’ रिपोर्ट और यूएनईपी की ‘ग्लोबल वेस्ट मैनेजमेंट आउटलुक’ रिपोर्ट स्पष्ट करती हैं कि लैंडफिल में जमे जैविक कचरे के सड़ने से मीथेन गैस निकलती है। यह ग्रीनहाउस गैस वैश्विक तापवृद्धि तेज करती है। इसके अलावा, कचरे के अनुचित निपटान से मिट्टी और भूजल प्रदूषित होते हैं, जिससे कृषि और मानव स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, खुले में कचरा जलाने से निकलने वाली विषैली गैसें और सूक्ष्म कण गंभीर बीमारियों को बढ़ावा देते हैं। प्लास्टिक कचरे के विघटन से उत्पन्न सूक्ष्म कण जल स्रोतों में मिलकर खाद्य शृंखला का हिस्सा बन जाते हैं, जो मानव जीवन के लिए खतरा बनते हैं। अहम प्रश्न है कि कचरे के ढेर आखिर किन कारणों से निरंतर बढ़ रहे हैं। इसका उत्तर हमारी उपभोक्तावादी संस्कृति में निहित है, जो निरंतर अधिक से अधिक उपभोग करने के लिए प्रेरित करती है। समाजशास्त्री जिग्मुंट बॉमन के अनुसार, आधुनिक समाज एक ‘उपभोक्ता समाज’ में परिवर्तित हो चुका है, जहां वस्तुओं का निर्माण दीर्घकालिक उपयोग के लिए नहीं, बल्कि शीघ्र त्याग के लिए किया जाता है। यूएनईपी की ‘ग्लोबल वेस्ट मैनेजमेंट आउटलुक 2024’ रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि वर्तमान ‘उत्पादन–उपभोग–त्याग’ आधारित अर्थव्यवस्था में निर्मित अधिकांश वस्तुएं अंततः कचरे में बदल जाती हैं। यदि यह मॉडल जारी रहा, तो कचरे की मात्रा और उससे जुड़े पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभाव लगातार बढ़ते जाएंगे। विश्व बैंक की ‘व्हाट अ वेस्ट’ रिपोर्ट यह संकेत देती है कि आर्थिक विकास, शहरीकरण और बढ़ते उपभोग के साथ कचरे की मात्रा में भी निरंतर वृद्धि होती है। इसी प्रकार, यूएनईपी रेखांकित करता है कि वर्तमान अस्थिर उपभोग और उत्पादन की प्रवृत्तियां कचरे के बढ़ते संकट का प्रमुख कारण हैं। ‘ग्लोबल वेस्ट मैनेजमेंट आउटलुक’ रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि टिकाऊ समाधान के रूप में पुनः उपयोग, मरम्मत और पुनर्चक्रण जैसी प्रक्रियाओं को अपनाना आवश्यक है।
जहां पारंपरिक समाजों में वस्तुओं का उपयोग अधिक टिकाऊ और पुनः उपयोग पर आधारित था, वहीं आधुनिक उपभोग-प्रधान जीवनशैली ने इस संतुलन को समाप्त कर दिया। विश्व स्तर पर सीमित और सजग उपभोग को बढ़ावा देने के लिए कई संगठित प्रयास किए गए हैं। ‘जीरो वेस्ट’ आंदोलन, जिसे 21वीं सदी के प्रारंभ में संस्थागत रूप मिला, इस विचार को स्थापित करता है कि कचरे को न्यूनतम स्तर तक लाया जा सकता है। वहीं, वर्ष 2011 में ऑस्ट्रेलिया से शुरू हुआ ‘प्लास्टिक फ्री जुलाई’ अभियान आज वैश्विक स्तर पर लोगों को सिंगल-यूज़ प्लास्टिक से दूरी बनाने को प्रेरित कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2022 में ‘इंटरनेशनल जीरो वेस्ट डे’ की घोषणा दर्शाती है कि यह विषय अब वैश्विक प्राथमिकता है। इन आंदोलनों ने इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई लेकिन केवल आंदोलनों के जरिये इस समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है। इसके प्रभावी नियंत्रण के लिए हमें अपनी जीवनशैली और उपभोग के तरीकों में परिवर्तन लाना होगा।
वास्तव में, यह समस्या बाहर से अधिक भीतर से जुड़ी हुई है। हम कैसे जीते हैं, क्या खरीदते हैं और कितना त्याग करते हैं। ऐसे में आवश्यक है कि हम ऐसे जीवन मूल्यों को अपनाएं, जो संतुलन और संयम पर आधारित हों। समझना होगा कि अत्यधिक उपभोग केवल तात्कालिक सुविधा प्रदान करता है, जबकि दीर्घकाल में यह पर्यावरणीय असंतुलन और संसाधनों के क्षय का कारण बनता है। जापान जैसे देश यह उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि सादगी, अनुशासन और संतुलित जीवनशैली भी एक समृद्ध और सम्मानित समाज की पहचान हो सकती है। जापानी जीवनशैली का न्यूनतावादी दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण दिशा प्रस्तुत करता है। मैरी कोंडो की पुस्तक ‘द लाइफ-चेंजिंग मैजिक ऑफ टाइडिंग अप’ के मुताबिक, व्यक्ति को केवल उन्हीं वस्तुओं को पास रखना चाहिए, जो वास्तव में आवश्यक हों। यह दृष्टिकोण अनावश्यक संग्रह की प्रवृत्ति को सीमित कर कचरे की समस्या को कम करने में सहायक होगा।

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