मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने एक बार फिर दुनिया को यह याद दिला दिया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी आपस में जुड़ी हुई है। हजारों किलोमीटर दूर चल रही जंग का असर भारत की रसोई से लेकर उद्योगों की मशीनों तक साफ दिखाई देने लगा है। तेल महंगा हो रहा है, कच्चे माल की आपूर्ति बाधित है, और महंगाई धीरे-धीरे आम आदमी की कमर तोड़ने लगी है। लेकिन हर संकट अपने साथ एक अवसर भी लेकर आता है, जरूरत है उसे पहचानने और सही दिशा में कदम बढ़ाने की।

ये समय किसी तरह की कोई कमजोरी निकालने का नहीं, है, बल्कि संकट से लड़ने का है। आज भी हम अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा मीडिल ईस्ट से आयात करते हैं। जैसे ही वहां तनाव बढ़ता है, हमारे यहां पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ जाते हैं और इसका सीधा असर हर सेक्टर पर पड़ता है। ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, उत्पादन लागत बढ़ती है और अंततः आम उपभोक्ता को इसका बोझ उठाना पड़ता है। 

दूसरा बड़ा असर उद्योगों पर पड़ रहा है। कच्चे माल की 

कमी और महंगे लॉजिस्टिक्स के कारण छोटे और मध्यम उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। कई उद्योग बंद होने की कगार पर हैं, तो कुछ उत्पादन कम करने को मजबूर हैं। यह स्थिति रोजगार के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। लेकिन यही वह समय है जब भारत अपने घरेलू उत्पादन को मजबूत कर सकता है। ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहल को सिर्फ नारा नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतारने की जरूरत है। अगर हम स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाते हैं, तो न सिर्फ आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।, दरअसल हमारे देश में गांव, शहर और कस्बों में जगह-जगह प्लास्टिक सहित लोहा, कांच आदि बिखरा पड़ा है, जो तकलीफ भी देता है, उसे उठाना शुरू कर देना चाहिए...। युवाओं को रोजगार के साथ-साथ इस दिशा में भी सोचना होगा कि वे इस आपदा में देश के लिए कुछ कर रहे हैं। क्योंकि जब हम देश का सोचकर कोई काम करना शुरू करेंगे तो हमारी मेहनत रंग लाएगी। 

  सबसे बड़ी चिंता रोजगार को लेकर है। उद्योगों के धीमे पड़ने का सीधा असर युवाओं पर पड़ रहा है। बेरोजगारी बढ़ने का खतरा है और यह सामाजिक असंतोष को भी जन्म दे सकता है। ऐसे में सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को मिलकर स्वरोजगार और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना होगा। छोटे-छोटे व्यवसाय, स्थानीय सेवाएं और डिजिटल प्लेटफॉर्म इस संकट में नए अवसर बन सकते हैं।

इतिहास गवाह है कि हर बड़ा संकट बदलाव का रास्ता खोलता है। मीडिल ईस्ट का यह युद्ध भी भारत के लिए एक चेतावनी है कि अब समय आ गया है आत्मनिर्भर बनने का, अपनी नीतियों को मजबूत करने का और वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने का। अगर हमने इस संकट से सबक लिया, तो यह आपदा भारत के लिए एक बड़े अवसर में बदल सकती है।  आज जरूरत है दूरदर्शिता की, निर्णायक नेतृत्व की और ठोस नीति निर्माण की। क्योंकि जो देश संकट में अवसर खोज लेते हैं, वही भविष्य में विश्व मंच पर अपनी मजबूत पहचान बनाते हैं।

देशभर के कचरों के ढेर में जरूरी धातुएं पड़ी हुई हैं, जैसे प्लास्टिक, लोहा, एल्युमीनियम आदि। इन वस्तुओं को छांटकर रीसाइकल उद्योगों को भेजकर वहां से इन वस्तुओं की कमी की आपूर्ति पूरी की जा सकती है। और यदि छह-आठ महीने इस दिशा में काम कर लिया है तो पूरे देश से कचरा भी साफ हो जाएगा और रोजगार के नए अवसर भी शुरू होंगे।

-जगजीतसिंह भाटिया

प्रधान संपादक


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