स्वच्छता में नंबर वन, जनता की सुरक्षा में फिसड्डी : तीन माह में 13,640 लोगों को काटा

इंसान की जान सस्ती, सिस्टम की नीयत महंगी


देश के सबसे स्वच्छ शहरों में गिने जाने वाला इंदौर आज एक कड़वी सच्चाई के सामने खड़ा है- यहां सड़कों पर इंसान असुरक्षित है। सवाल सीधा है,  क्या इस व्यवस्था में मानव जीवन की कोई कीमत बची है या नहीं? हर दिन अस्पतालों में आवारा कुत्तों के काटने के सैकड़ों मामले पहुंच रहे हैं। कई मासूम बच्चे आज भी बिस्तरों पर पड़े हैं, कुछ दर्द से कराह रहे हैं, तो कुछ मानसिक डर से उबर नहीं पा रहे है। जिन परिवारों के बच्चे बाहर खेलने से डरने लगे हैं, उनके लिए ‘स्वच्छ शहर’ का तमगा किसी मजाक से कम नहीं है।
सबसे दुखद यह है कि यह कोई अचानक आई समस्या नहीं है। सालों से आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ रही है, हमलों की घटनाएं सामने आ रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी हर बार वही घिसा-पिटा जवाब देते हैं- ‘अभियान चल रहा है‘, ‘स्थिति नियंत्रण में है’। अगर यही नियंत्रण है, तो फिर अराजकता किसे कहेंगे?
सच यह है कि नगर निगम और संबंधित विभागों की प्राथमिकता कहीं और है। करोड़ों रुपए खर्च कर आवारा कुत्तों की  नसबंदी अभियान के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर नतीजा शून्य है। यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ये पैसा जा कहां रहा है? क्या यह सिर्फ कागजों में खर्च हो रहा है? क्या यह पूरा तंत्र सिर्फ अपनी जेब भरने में लगा है?
और इस सबके बीच सबसे बड़ा अपराध यह है कि आम नागरिक को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है।   सिस्टम की संवेदनहीनता इतनी बढ़ चुकी है कि मानो इंसान की पीड़ा अब आंकड़ों में बदलकर रह गई है।
यहां एक बात शहरी सरकार को समझनी होगी कि मानव जीवन सर्वोपरि है। किसी भी सभ्य समाज में इंसान की सुरक्षा सबसे पहली जवाबदेही होती है। पशु संरक्षण जरूरी है, लेकिन यह इंसानों की जान की कीमत पर नहीं हो सकता। ‘कुत्ते बचाओ’ की आड़ में अगर ‘इंसान मरने दो’ वाली मानसिकता पनप रही है, तो यह न केवल गलत है बल्कि खतरनाक भी है। कानून और नियम अपनी जगह हैं, लेकिन जब हालात नियंत्रण से बाहर हो जाएं, तो सख्त फैसले लेने ही पड़ते हैं। आक्रामक और खतरनाक कुत्तों की पहचान कर उन्हें तुरंत हटाना होगा। केवल नसबंदी और कागजी कार्रवाई से यह समस्या हल नहीं होने वाली। एक उपाय जवाबदेही नगर निगम को देना चाह रहा है कि शहरभर में जो आवारा कुत्तों के संरक्षक एनजीओ है, उनके घरों पर भी 25-50 आवारा कुत्ते देखरेख के लिए दे दिए जाए..। तो उन्हें भी समझ आएगा कि किस तरह से ये आवारा कुत्ते लोगों को परेशान कर रहे हैं। इस मुद्दे पर सबसे बड़ी विफलता प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है। अगर वही तत्परता और सख्ती दिखाई जाए, जो स्वच्छता अभियान में दिखाई गई थी, तो हालात बदल सकते हैं। लेकिन इसके लिए नीयत साफ होनी चाहिएऔर यही सबसे बड़ा सवाल है।

आज जरूरत है जवाबदेही तय करने की। जिन अधिकारियों की लापरवाही से यह स्थिति बनी है, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। केवल बैठकों और प्रेस नोट से काम नहीं चलेगा। जमीन पर ठोस और तुरंत असर दिखाने वाले कदम उठाने होंगे। अगर अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो यह समस्या और विकराल रूप ले लेगी। और तब सिर्फ आंकड़े नहीं बढ़ेंगे, बल्कि लोगों का सिस्टम पर से भरोसा भी पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

इंदौर नगर निगम सिर्फ सफाई को लेकर डंका बजाने में व्यस्त है, लेकिन जमीनी तौर पर आम आदमी की जिंदगी से उसे कोई लेना-देना नहीं है। प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को आवारा कुत्ते काट रहे हैं, लेकिन नगर निगम पुख्ता इंतजाम करने में आज भी फिसड्डी ही है। मध्य प्रदेश का आर्थिक और सबसे स्वच्छ शहर कहलाने वाला इंदौर इन दिनों एक गंभीर समस्या से जूझ रहा है। सड़कों पर बढ़ती आवारा कुत्तों की संख्या ने आम नागरिकों का जीना मुश्किल कर दिया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि शहर के कई इलाकों में लोग घर से निकलने से पहले डरने लगे हैं। नगर निगम के दावे और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई अब खुलकर सामने आ चुकी है।

स्वास्थ्य विभाग के ताजा आंकड़े स्थिति की भयावहता को उजागर करते हैं। वर्ष 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही 31 मार्च तक 13,640 लोग कुत्तों के हमले का शिकार होकर अस्पताल पहुंचे हैं। यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है बल्कि नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल भी खड़े करता है। इतने बड़े पैमाने पर डॉग बाइट की घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि जिम्मेदार एजेंसियां समस्या को नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल रही हैं।

हॉटस्पॉट बने शहर के कई इलाके

शहर के 20 से अधिक क्षेत्रों को डेंजर जोन घोषित किया जा चुका है। खजराना की हिना कॉलोनी, शाहीन नगर मुख्य मार्ग और जमजम चौराहा जैसे प्रमुख इलाके अब आवारा कुत्तों के गढ़ बन चुके हैं। इसके अलावा परदेशीपुरा, पंचम की फेल, आजाद नगर, चंदननगर, मूसाखेड़ी और बाणगंगा क्षेत्र में भी स्थिति बेहद गंभीर है। इन क्षेत्रों से लगातार लोगों के घायल होने की खबरें सामने आ रही हैं, लेकिन नगर निगम की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद निगम की टीम मौके पर नहीं पहुंचती या केवल औपचारिक कार्रवाई कर वापस लौट जाती है।

महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित

आंकड़ों के अनुसार मार्च महीने में ही 4,722 लोग कुत्तों के हमले का शिकार हुए। इनमें 833 महिलाएं और 787 बच्चे शामिल हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि समाज का सबसे कमजोर वर्ग इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। स्कूल जाने वाले बच्चे, कामकाजी महिलाएं और बुजुर्ग सुबह-शाम घर से निकलने में डर महसूस कर रहे हैं। कई मामलों में कुत्तों के झुंड ने लोगों पर हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया।
नसबंदी अभियान पर उठे सवाल
नगर निगम वर्षों से आवारा कुत्तों की नसबंदी अभियान चलाने का दावा करता रहा है। इस अभियान पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की बात भी कही जाती रही है। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को झूठा साबित कर रही है। अगर अभियान प्रभावी होता, तो कुत्तों की संख्या में कमी आती और हमलों की घटनाएं घटतीं। लेकिन इसके विपरीत, घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इससे साफ है कि या तो अभियान सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा या फिर इसमें गंभीर स्तर पर लापरवाही और भ्रष्टाचार हो रहा है।

कागजों में कार्रवाई, जमीन पर नाकामी

नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा आरोप यही है कि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित है। अधिकारियों द्वारा समय-समय पर बैठकें कर योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन उनका असर जमीनी स्तर पर नजर नहीं आता। कई इलाकों में लोगों ने बताया कि कुत्तों को पकड़ने वाली टीम महीनों से नहीं आई। जहां टीम पहुंचती भी है, वहां केवल एक-दो कुत्तों को पकड़कर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है। इसके बाद वही कुत्ते कुछ दिनों में वापस उसी इलाके में नजर आते हैं।

नागरिकों में बढ़ता आक्रोश

लगातार बढ़ती घटनाओं के चलते शहरवासियों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय स्तर तक लोग नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। कई स्थानों पर नागरिकों ने विरोध प्रदर्शन भी किए हैं। लोगों का कहना है कि जब शहर स्वच्छता में देशभर में अव्वल आ सकता है, तो सुरक्षा के मामले में इतनी बड़ी लापरवाही क्यों? क्या नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं?

स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता दबाव

डॉग बाइट के मामलों में तेजी से वृद्धि के कारण सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर भी दबाव बढ़ गया है। एंटी-रेबीज वैक्सीन की मांग में अचानक वृद्धि हुई है। कई बार अस्पतालों में वैक्सीन की कमी की शिकायतें भी सामने आती हैं, जिससे मरीजों को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। इससे आम लोगों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।
जिम्मेदारी से बचते अधिकारी
इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारी स्पष्ट जवाब देने से बच रहे हैं। हर बार वही पुरानी दलील दी जाती है कि अभियान जारी है और जल्द ही स्थिति नियंत्रित कर ली जाएगी। लेकिन आंकड़े और जमीनी सच्चाई इस दावे की पोल खोल रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक नागरिक इस डर के साये में जीते रहेंगे?

छलांग लगाकर गर्दन पर लपका कुत्ता, पैर में काटा

कुत्ते ने एक साथ चार लोगों पर किया हमला 

इंदौर के पास महू में एक खूंखार कुत्ते ने अचानक कुछ ग्रामीणों पर हमला कर दिया। किसी की गर्दन दबोची तो किसी के पैर पर काट लिया। हमले में पांच लोग घायल हुए हैं। घटना के दौरान एक युवक ने प्लास्टिक की कुर्सी से कुत्ते पर हमला किया, लेकिन भागने के बजाय वह उस पर झपट्‌टा मारता रहा। इसका सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है।
मामला शुक्रवार को किशनगंज थाना क्षेत्र के केवटी गांव का है। पूरे गांव में दहशत का माहौल है।

ग्रामीण बोले- जल्द से जल्द प्रशासन करे कार्रवाई

गांव के अजीज पटेल ने बताया कि हमले में फारूक, अरमान, शाकिर, मालिक पटेल और एक अन्य घायल हैं। सभी को महू के सिविल अस्पताल भेजा गया। जहां रैबीज के इंजेक्शन लगाए गए। ग्रामीणों ने प्रशासन से जल्द से जल्द इस मामले में कार्रवाई करने की मांग की है।
6 महीने में 1000 से ज्यादा को लगे रैबीज के इंजेक्शन
महू तहसील में 6 महीनों में एक हजार से अधिक लोगों को रैबीज के इंजेक्शन लगे हैं। ये सभी लोग डॉग बाइट के शिकार हुए थे। वहीं 3 और 4 अप्रैल काे 24 लोग रैबीज के इंजेक्शन लगवाने सिविल अस्पताल पहुंचे। इनमें से 5 लोग एक ही गांव केवटी के है।

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