'विकसित भारत-जीरामजी' योजना से युवाओं को जोड़ना शुरू हो
मिडिल ईस्ट की जंग से भारत में खाद्य सामग्री के साथ-साथ कई वस्तुएं महंगी होती जा रही है, जिसका असर रोजगार पर सबसे ज्यादा दिखाई देने लगा है। ज्यादातर उद्योग-धंधे बंद हो चुके हैं और कुछ बंद होने की कगार पर हैं, क्योंकि जंग की वजह से भारत में कच्चा माल आ नहीं रहा और यहां से कुछ विदेशों में नहीं जा पा रहा है, जिसकी वजह से पूरे देश में एकजैसे हालात बन गए हैं।
यह समय डरने या घबराने का नहीं है, बल्कि इस चुनौती से लड़ने का भी है, जिस तरह से कोराना काल में लोगों ने जीना सीखा था...। जीने का नया तरीका लोगों ने अपना लिया था। ऑनलाइन पढ़ाई, वर्क फ्रॉम होम और घर बैठे खाना पहुंचाने सहित तमाम वो गतिविधियां लोगों ने सीखी और अपनाया और हर मुसीबत को जीत कर आगे बढ़ते गए। उस काल में कई लोग मौत से भी लड़कर जिंदगी जी रहे हैं, लेकिन अब ये आपदा मौत जैसी त्रासदी की नहीं हैं, बल्कि रोजगार से ज्यादा जुड़ी है, जिससे जीवन भी ताल्लुकात रखता है। कोरोना काल में सब एक समान हो गए थे,...। कोई भी काम किसी को छोटा या बड़ा नहीं लग रहा था। कई कंपनियों ने लोगों को नौकरियों पर से हटा दिया था और इंजीनियर जैसे पदों पर रहे युवक-युवतियों ने अपने खुद के व्यवसाय, कोई सब्जी बेचने लगा था तो कोई स्ट्रीट फूड बनाकर डिलीवरी करने लग गया था..., क्योंकि सबसे बड़ी बात है हम हमारी जीविका कैसे चलाएंगे, और इसके लिए रोजगार होना जरूरी है और यही कारण रहा था कि कोई भी काम किसी को छोटा नहीं लग रहा था और लोगों ने बढ़चढ़कर छोटे-छोटे काम करके अपना जीवन शुरू किया। कई लोगों का ये छोटा काम अब बड़े स्तर पर चल रहा है और उन्होंने फिर कोई कंपनी ज्वाइन नहीं की और अपना खुद का व्यवसाय कर रहे हैं।
अब जवाबदेही सरकार महती बन जाती है कि लोग पैनिक ना हो और रोजगार के लिए शहरों से पलायन ना कर सके, इसके लिए उन्हें सीधे रोजगार से जोड़ा जाना चाहिए। दरअसल, मिडिल ईस्ट की जंग की वजह से लोहा, एल्यूमिनियम, कांच सहित कई आवश्यक वस्तुओं की कमी बन गई है। लेकिन सुखद ये है कि ये धातु हमारे देश में शहरों से लेकर गांवों तक में कचरे के ढेरों में बड़ी मात्रा में पड़ी हुई हैं। सरकार को 'विकसित भारत-जीरामजी' योजना से युवाओं को जोड़ना शुरू कर देना चाहिए। छह माह तक लगातार इस योजना में काम यदि किया जाएगा तो देशभर के कचरे के ढेर साफ हो जाएंगे और एक नया साफ-सुथरा भारत पूरी दुनिया के सामने होगा और पूरी दुनिया के लोग भारत आकर इस परिवर्तन को देखेंगे कि कैसे यहां के लोगों ने आपदा को अवसर में बदला और एक नए भारत की नींव रखी।
आज दुनिया एक बार फिर अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव तक को हिला दिया है। इसका सीधा असर हमारे देश भर पर भी पड़ रहा है - कच्चे माल की कमी, सप्लाई चेन का टूटना, महंगाई में उछाल और सबसे बड़ी चिंता, रोजगार के अवसरों का सिकुड़ना। लेकिन इतिहास गवाह है कि हर संकट अपने भीतर एक अवसर छिपाए होता है- जरूरत होती है उसे पहचानने और साहसपूर्वक उस पर काम करने की।
देशभर में पड़े कचरे का निदान, देश में बढ़ाएगा रोजगार
कोरोना काल ने हमें यह सिखाया था कि विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन रुकता नहीं, बल्कि नए रास्ते खोजता है। जब पूरी दुनिया लॉकडाउन में थी, तब भारत ने न केवल खुद को संभाला, बल्कि डिजिटल क्रांति के माध्यम से नए अवसर भी पैदा किए। ऑनलाइन शिक्षा, वर्क फ्रॉम होम, ई-कॉमर्स और होम डिलीवरी जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ। लाखों लोगों ने अपनी नौकरी खोने के बाद छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू किए और आज वे आत्मनिर्भर बन चुके हैं।
आज वही स्थिति एक बार फिर सामने है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार संकट स्वास्थ्य का नहीं बल्कि आर्थिक और औद्योगिक है। ऐसे में घबराने के बजाय हमें उसी जज्बे के साथ आगे बढ़ना होगा, जो हमने कोरोना के समय दिखाया था।
संकट की जड़ और
उसका समाधान
मिडिल ईस्ट के संघर्ष के कारण भारत में लोहा, एल्यूमिनियम, कांच जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल की कमी उत्पन्न हो रही है। कई उद्योग बंद होने की कगार पर हैं और लाखों लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। लेकिन यदि गहराई से देखा जाए, तो इन समस्याओं का समाधान हमारे अपने देश में ही मौजूद है। देशभर में फैले कचरे के ढेर केवल गंदगी का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे संसाधनों का भंडार भी हैं। इन ढेरों में बड़ी मात्रा में धातुएं, प्लास्टिक, कांच और अन्य पुनर्चक्रण योग्य सामग्री मौजूद है। यदि इनका वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए, तो न केवल कच्चे माल की कमी दूर हो सकती है बल्कि लाखों युवाओं को रोजगार भी मिल सकता है।
कचरे से कमाई
एक राष्ट्रीय अभियान
यह समय है कि भारत ‘वेस्ट टू वेल्थ’ यानी कचरे से संपत्ति बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाए। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक व्यापक योजना लागू करनी चाहिए, जिसमें युवाओं को सीधे जोड़ा जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ने स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से देश को साफ-सफाई का महत्व समझाया। इंदौर जैसे शहर इसका जीता-जागता उदाहरण हैं, जहां कचरे के ढेर आज सुंदर गार्डनों में बदल चुके हैं। अब इस पहल को अगले स्तर पर ले जाने का समय है, जहां सफाई के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण भी जुड़ा हो।
- प्लास्टिक रिसाइक्लिंग यूनिट
- ई-वेस्ट मैनेजमेंट
- कांच और पेपर रिसाइक्लिंग
- स्क्रैप आधारित छोटे उद्योग
- कचरा संग्रहण और वर्गीकरण: हर शहर और गांव में कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की व्यवस्था हो।
- युवाओं को प्रशिक्षण: रिसाइक्लिंग और वेस्ट मैनेजमेंट के लिए स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम चलाए जाएं।
- फाइनेंशियल सपोर्ट: स्टार्टअप और छोटे व्यवसायों के लिए आसान लोन और सब्सिडी दी जाए।
- पुलिस थानों में पड़े वाहनों का उपयोग: देशभर के थानों में हजारों वाहन सालों से जंग खा रहे हैं। इन्हें तुरंत नीलाम या रिसाइक्लिंग के लिए भेजा जाए, जिससे लोहे की कमी दूर हो सके।
- अवैध शराब का उपयोग: जब्त की गई शराब को नष्ट करने के बजाय एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल किया जाए, जिससे ईंधन संकट को कम किया जा सके।
मानसिकता में बदलाव की जरूरत
हमें यह समझना होगा कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। कोरोना काल में जब इंजीनियर सब्जी बेच रहे थे और मैनेजर डिलीवरी बॉय बन रहे थे, तब समाज ने काम की गरिमा को समझा था। आज फिर उसी सोच को अपनाने की जरूरत है। यह संकट हमारे लिए परीक्षा है, लेकिन साथ ही एक अवसर भी है, दुनिया को यह दिखाने का कि हम केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक भी बन सकते हैं।यदि हम अपने कचरे को संसाधन में बदल दें, अपने युवाओं को रोजगार से जोड़ दें और अपनी नीतियों को समय के अनुसार ढाल लें, तो यह संकट हमें एक नए भारत की ओर ले जा सकता है।



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