घूसखोर और गुंडे-बदमाशों की समानांतर सरकार चल रही है। गुंडे-बदमाश हथियारों के दम पर लूट-खसोट कर रहे हैं। वहीं, कथित भ्रष्ट अफसर कोई व्यक्ति ईमानदारी से भी काम कर रहा है तो उसका काम अटकाकर खुलेआम रिश्वत मांग रहे हैं। दरअसल, घूसखोर अफसर और गुंडे-बदमाशों में कोई अंतर नहीं है। दोनों ही देश के दुश्मन है और अराजकता फैला रहे हैं, ऐसा नहीं है कि ऐसे हालात सिर्फ मध्यप्रदेश में है, पूरे देश में हालात बिगड़े हुए हैं।

मध्यप्रदेश में करप्शन के 57 % आरोप सही, पर सजा के नाम पर सन्नाटा

14 फीसदी एफआईआर और

1 प्रतिशत से भी कम सजा

प्रदेश में भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था का चौंकाने वाला सच

कुछ जिलों और संभागों की पहचान ही बन गया करप्शन

लचर कानून व्यवस्था से ही घूसखोरों का आचरण गुंडे-बदमाशों जैसा हो गया है। जिस तरह से बदमाश लगातार अपराध करता जाता है, उस पर तमाम कानूनी धाराएं लगती रहती है और उसे जिलाबदर भी किया जाता है। जिलाबदर के दौरान बदमाश जिस जिले में जाता है, वहां भी अपराध करता है, वो कभी नहीं सुधरता। उसे जेल की सजा भी हो जाती है और वो जमानत पर छूटने के बाद फिर अपराध करने लग जाता है। ठीक इसी तरह हमारे देश के रिश्वतखोर अफसर हो चुके हैं। 

रिश्वत लेते पकड़े तो जाते हैं, लेकिन नियमों इतने लचर है कि रिश्वतखोर का कुछ नहीं बिगड़ता, जिस विभाग में रिश्वत लेते पकड़ा जाता है, उस विभाग से हटाकर दूसरे विभाग में भेज दिया जाता है, और ये रिश्वतखोर अफसर जहां भी जाता रहता है, वहां रिश्वतखोरी ही करता रहता है। कुलमिलाकर गुंडे-बदमाशों और रिश्वतखोरों में कोई अंतर नहीं हैं। गुंडे के अपराध तब थमते है, जब उसकी कोई अन्य बदमाश हत्या कर दे, तब...? लेकिन इन घूसखोर अफसरों की जान लेने वाला कोई दूसरा घूसखोर अफसर भी तो नहीं होता है...। जब तक ये जीवित रहते हैं या नौकरी पर होते हैं, तब तक देश को दीमक की तरह खोखला करते जाते हैं।

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति अब केवल जुमला बनकर रह गई है। विधानसभा के पटल पर रखे गए ताजा आंकड़े प्रदेश की प्रशासनिक ईमानदारी का वह काला चेहरा उजागर करते हैं, जो न केवल चुभने वाला है, बल्कि डरावना भी है।  पढ़िए जवाबदेही की विशेष रिपोर्ट 

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति अब केवल जुमला बनकर रह गई है। विधानसभा के पटल पर रखे गए ताजा आंकड़े प्रदेश की प्रशासनिक ईमानदारी का वह काला चेहरा उजागर करते हैं, जो न केवल चुभने वाला है, बल्कि डरावना भी है। एक तरफ लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू की टीम नोटों की गड्डियों के साथ अफसरों को रंगे हाथ पकड़ रही हैं, तो दूसरी तरफ सजा की दर महज 1 प्रतिशत से भी नीचे सिमट गई है। 

हालात यह है कि रिश्वतखोरी अब किसी एक जेंडर तक सीमित नहीं रही। महिला अधिकारी भी इस ‘काली कमाई’ की रेस में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। न्याय की सुस्त रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक भ्रष्टाचारी को उसके अंजाम तक पहुंचाने में सिस्टम को औसतन 14 साल लग रहे हैं। हजारों मामले जांच और अभियोजन स्वीकृति की फाइलों के नीचे दबे पड़े हैं, जो साफ संकेत दे रहे हैं कि मध्य प्रदेश में ईमानदार व्यवस्था का संकल्प अब सिस्टम के ‘ब्लैक होल’ में समा चुका है।


हर साल 200 घूसखोर धराए जा रहे हैं

लोकायुक्त की कार्रवाई के अनुसार, महिला कर्मचारी मुख्य रूप से राजस्व (पटवारी), नगर निगम, और स्वास्थ्य विभागों में रिश्वत के मामलों में पकड़ी गई हैं। 2025 में, इंदौर लोकायुक्त ने भी बड़ी संख्या में भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई की, जिसमें पटवारी और क्लर्क शामिल थे। औसतन, मध्यप्रदेश में हर साल 200 से अधिक अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े जाते हैं, जिनमें अब महिला कर्मचारियों की संलिप्तता के मामले भी सामने आ रहे हैं।

पहली पोस्टिंग में धरी गई सीएमओ मैडम

फरवरी-2026 में सीएमओ मैडम से बिल्कुल भी सब्र नहीं हुआ और पहली ही पोस्टिंग में 40 हजार लेते धरी गई हैं। प्रदेश में इस तरह का पहला मामला था। दरअसल, छतरपुर जिले के बक्सवाहा नगर परिषद में सीएमओ नेहा शर्मा और उपयंत्री शोभित मिश्रा को 40 हजार घूस लेते सागर ईओडब्ल्यू की टीम ने रंगे हाथों गिरफ्तार किया। पीएससी से चयनित नेहा शर्मा की यह पहली पोस्टिंग थी। सीएमओ नेहा शर्मा द्वारा आवासीय पट्टा और प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत करने के लिए रिश्वत मांगी थी।


करप्शन में टॉप संभाग-जिले

लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू के आंकड़ों में इंदौर, भोपाल, उज्जैन, जबलपुर, सागर, ग्वालियर, और रीवा संभागों के जिलों में भ्रष्टाचार के सबसे अधिक मामले सामने आते हैं। वहीं, छापों के लिए संवेदनशील जिलों में सतना, छतरपुर, दमोह, पन्ना, कटनी, नरसिंहपुर, बालाघाट, धार, नीमच, झाबुआ, बड़वानी, खंडवा, खरगोन, अलीराजपुर, सीधी, सिंगरोली, टीकमगढ़ जिले सबसे आगे हैं।

असली कहानी समय की

मध्यप्रदेश में फरवरी-2026 में विधानसभा सत्र के दौरान विधायक पंकज उपाध्याय और भंवर सिंह शेखावत के सवालों के लिखित जवाब में सरकारी कहा-वर्ष 2020 से 2025 के बीच ईओडब्ल्यू के 70 आपराधिक केसों में फैसला हुआ। इनमें 40 मामलों में सजा हुई। 30 में आरोपी बरी हो गए। यानी 57 प्रतिशत दोष सिद्धि दर रही। पहली नजर में यह आंकड़ा मजबूत लगता है, लेकिन यहां असली कहानी समय की है। इन 70 मामलों में औसतन फैसला आने में 13 साल और 7 महीने लगे।

तीन दशक में आया फैसला

मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार और घूसखोरी के कुछ केसों में तो न्याय आने में तीन दशक लग गए। 1990 का मामला 33 साल बाद निपटा। इसी तरह 1995 के एक मामले में फैसला 28 साल बाद आया। 1996 के मामले में 29 साल बाद और 1999 के मामले का 26 साल बाद फैसला आया।  


2.8% केसों में ही एफआईआर

वर्ष 2020 से जनवरी 2026 तक ईओडब्ल्यू को कुल 19775 शिकायतें मिलीं। हर साल औसतन तीन हजार से ज्यादा शिकायतें। जनवरी 2026 में 437 शिकायतें दर्ज हुईं। 20000 शिकायतों में से केवल 2624 यानी लगभग 14% ही औपचारिक रूप से दर्ज की गईं, इनमें केवल 566 मामलों में ही अपराध पंजीबद्ध हुआ। कुल शिकायतों के मात्र 2.8% मामले में ही केद दर्ज किया गया। 97% शिकायतें एफआईआर तक नहीं पहुंचीं।  वर्ष 2023 से 2026 तक लोकायुक्त को करीब 2000 शिकायतें मिलीं और 1063 आपराधिक केस दर्ज किए गए। 1592 जांच पूरी की गईं और इस समय करीब 1500 अधिकारी-कर्मचारी जांच के घेरे में हैं। लेकिन अब भी सैकड़ों मामले अभियोजन स्वीकृति का इंतजार कर रहे हैं। सिर्फ 39 मामलों में ही प्रारंभिक अभियोजन कार्रवाई ही शुरू हुई। 208 मामलों में चालान पेश हुए और दोषसिद्धि सिर्फ 7 मामलों में हुई। यानी 1063 दर्ज मामलों में 7 को सजा। लगभग 0.65 प्रतिशत दोषसिद्धि दर। सजा की दर लगभग 3 प्रतिशत है।


मुरैना: में 23 लाख का घोटाला

ईओडब्ल्यू ने मुरैना स्थित बैंक आफ इंडिया की शाखा में 23 लाख के गबन मामले में कार्रवाई की। 8 बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज की गई है। 2013 से 2016 के बीच शाखा में पदस्थ रहे हेड कैशियर महेंद्र सिंह बाजौरिया सहित अन्य कर्मचारियों ने मिलकर ग्राहकों के खातों से अवैध रूप से रकम निकाली। आरोपियों में गौरीशंकर राम, ऋचि तिवारी, इंद्रनाथ विश्वास, विकास शर्मा, विकास त्रिवेदी, विजय कुमार मेहता और सौरभ मिश्रा के नाम शामिल हैं।

सिंगरौली: डीईओ पर केस

सिंगरौली शिक्षा विभाग में  डीईओ सूर्यभान सिंह, सहायक संचालक शिक्षा राजधर साकेत, जिला परियोजना समन्वयक रामलखन शुक्ल, सहायक परियोजना समन्वयक (वित्त) छविलाल सिंह सहित अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया है। स्वच्छता के नाम 97 लाख 67 हजार, वर्चुअल रियलिटी लैब की खरीदी में 4 करोड़ 68 लाख 16 हजार और स्कूलों में विद्युत व्यवस्था, मरम्मत सामग्री की खरीद पर 3 करोड़ 5 लाख कागजों में खर्च किए गए।

पीडब्ल्यूडी विभाग रडार पर

मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के केसों में लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) लोकायुक्त की रडार पर है।  विभाग भ्रष्टाचार में टॉप विभागों की सूची में बरकरार है। विभाग के ईई, एसडीओ और उपयंत्री अक्सर ठेकेदारों से बिल पास करने के बदले में घूस लेते रंगे हाथों पकड़े जाते हैं। यही नहीं, निर्माण और सड़क परियोजनाओं में कमीशनखोरी हावी है। लोक निर्माण विभाग भी निर्माण ठेकों और टेंडर प्रक्रिया में घूसखोरी के कारण शीर्ष 10 में बना हुआ है।  


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