महोदय, चाहे आप मानें या न मानें, लेकिन अब्दुल की एंट्री अब आपके घर तक हो चुकी है। पहले जहां अब्दुल बम बनाने या पंचर लगाने तक सीमित था, वहीं आज वह स्मार्ट हो चुका है। वह मेहंदी लगाता है, टैटू बनाता है, ब्यूटी पार्लर चलाता है, मेकअप करता है, चोटी बांधता है और अब तो आपकी बेटियों के पेटीकोट के नाड़े भी कस रहा है।
समाज में एक नया चलन देखा जा रहा है। शादी-ब्याह के मौकों पर जहां पहले पंडित जी दक्षिणा लेकर महिलाओं को तिलक लगाते थे, वहीं आज साड़ी-ब्लाउज पहनाने, मेहंदी लगाने और मेकअप के लिए बाहर से पुरुषों को हायर किया जा रहा है। कई परिवार दुल्हन को पार्लर या ब्यूटी सेंटर में ही तैयार करवा रहे हैं। मेहंदी, टैटू, टेलरिंग, हेयर स्टाइलिंग समेत कई काम अब पुरुष, खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के युवा कर रहे हैं।
युवा पीढ़ी और आधुनिकता की चिंता यह सिर्फ एक पहलू नहीं है। हमारी आधुनिक युवा पीढ़ी इस कथित आधुनिकता की ओर अंधे होकर बढ़ रही है। मेहंदी-टैटू तक तो ठीक था, लेकिन अब महिलाएं साड़ी पहनने और पहनाने के लिए पराए पुरुषों को किराए पर बुला रही हैं। एक ऐसे देश में जहां द्रौपदी के चीरहरण पर महाभारत रचा गया था, आज महिलाएं स्वयं पराए पुरुषों के सामने साड़ी खोलकर खड़ी हो रही हैं।
जिम सेंटर्स से लेकर घर तक, आर्टिस्ट, हेयर स्टाइलिस्ट, डिजाइनर और मेकअप आर्टिस्ट के नाम पर गैर-महिलाओं द्वारा महिलाओं के निजी अंगों का स्पर्श हो रहा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और चिंतित नागरिकों का कहना है कि यह आधुनिकता नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों और संस्कृति की मृत्यु है।
परिवारों से सवाल एक चिंतित महिला ने सवाल उठाया, “आपकी मेहरारू कहां मर गई है? उसे बोलिए कि अपनी बेटी को खुद तैयार करे। मेकअप और मेहंदी न आती हो तो पेटीकोट का नाड़ा बांधना तो आता ही होगा। अगर पत्नी नहीं है तो पिता स्वयं सीख लें कि बेटी को कैसे तैयार किया जाए।”
यह मुद्दा वर्तमान में सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ इसे लैंगिक समानता और व्यवसायिक स्वतंत्रता मान रहे हैं, जबकि बड़े वर्ग इसे सांस्कृतिक क्षरण और परिवारिक मूल्यों के पतन के रूप में देख रहा है।
क्या समाज को सोचना चाहिए? क्या परंपरागत कामों में पुरुषों की बढ़ती भूमिका सामान्य प्रगति है या यह घरेलू गोपनीयता और संस्कृति के लिए खतरा है? बहस जारी है।

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