मध्यप्रदेश इन दिनों एक ऐसे भयावह दौर से गुजर रहा है, जहां आम इंसान खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि लोग समझ नहीं पा रहे कि आखिर जाएं तो जाएं कहां, एक तरफ जंगल से निकलकर आबादी में घुसते तेंदुए और दूसरी तरफ सड़कों पर आतंक मचाते आवारा कुत्ते। यह दोहरी मार अब जनता के लिए किसी बड़े संकट से कम नहीं रह गई है।
प्रदेश के कई जिलों से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिनमें जंगली जानवरों और आवारा कुत्तों के हमलों ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में यह समस्या विकराल रूप ले चुकी है।
तेंदुओं का बढ़ता खतरा: जंगल से बस्तियों तक
गर्मी के मौसम में जंगलों में पानी और शिकार की कमी का सीधा असर अब इंसानी बस्तियों पर दिखने लगा है। तेंदुए, जो कभी घने जंगलों तक सीमित रहते थे, अब गांवों, कस्बों और शहरों के बाहरी इलाकों में खुलेआम घूमते नजर आ रहे हैं।
इंदौर के आसपास के क्षेत्र जैसे डकाच्या और महू में तेंदुओं की मौजूदगी ने लोगों में दहशत फैला दी है। तेजी से हो रहे शहरी विस्तार और जंगलों की कटाई ने वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को खत्म कर दिया है। नतीजतन, तेंदुए भोजन और पानी की तलाश में आबादी की ओर रुख कर रहे हैं।
हाल ही में धार जिले के धामनोद वन परिक्षेत्र के गुजरी गांव की डेहरिया बस्ती में घटी घटना ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया। 21 अप्रैल को अचानक एक तेंदुआ झाड़ियों से निकलकर बस्ती में घुस आया और लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। इस हमले में महेश वास्केल, ग्यारसीलाल सोलंकी, कांताबाई राठौड़ और विकास डावर घायल हो गए। स्थिति इतनी भयावह थी कि लोगों को अपनी जान बचाने के लिए घरों में छिपना पड़ा। इस दौरान वन विभाग का एक कर्मचारी भी घायल हो गया।
सरकार के दावे बनाम जमीनी हकीकत
सरकार समय-समय पर आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए योजनाओं का ऐलान करती रही है। नसबंदी अभियान, आश्रय स्थल निर्माण और टीकाकरण कार्यक्रमों की घोषणाएं होती हैं, लेकिन इनका असर कहीं दिखाई नहीं देता। इसी तरह वन विभाग भी तेंदुओं की निगरानी और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पकड़कर छोड़ने की बात करता है, लेकिन घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। जमीनी हकीकत यह है कि न तो शहर सुरक्षित हैं और न ही गांव।
यह घटना कोई अपवाद नहीं है, बल्कि अब एक खतरनाक ट्रेंड बनता जा रहा है
आवारा कुत्तों का आतंक: हर गली में खतरा
जहां एक तरफ तेंदुए का खतरा सीमित इलाकों में है, वहीं आवारा कुत्तों का आतंक हर गली, हर मोहल्ले में फैल चुका है। प्रदेश के कई जिलों में हर दिन सैकड़ों लोग कुत्तों के हमले का शिकार हो रहे हैं। 23 अप्रैल को सतना और धार जिले से सामने आई घटनाओं ने स्थिति की गंभीरता को उजागर कर दिया। सतना में आवारा कुत्तों ने 40 लोगों को काट लिया, जिससे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। वहीं धार के मनावर में महज तीन घंटे के भीतर एक कुत्ते ने 23 लोगों को अपना शिकार बना लिया, जिनमें से 14 की हालत गंभीर बताई जा रही है। इतना ही नहीं, कुत्तों ने तीन पशुओं पर भी हमला किया। यह घटनाएं यह दर्शाती हैं कि आवारा कुत्तों की संख्या अब नियंत्रण से बाहर हो चुकी है।
रेबीज का
खतरा: मौत से भी बदतर हालात
छिंदवाड़ा जिले के तामिया क्षेत्र से सामने आई एक घटना ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है। यहां एक महिला को कुत्ते ने काट लिया, जिसके बाद वह रेबीज से संक्रमित हो गई। हालत इतनी बिगड़ गई कि महिला लोगों को काटने के लिए दौड़ने लगी। पानी को देखकर डरना और अजीब व्यवहार करना रेबीज के गंभीर लक्षण हैं।
यह सिर्फ एक मामला नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि अगर समय रहते इलाज और नियंत्रण नहीं किया गया तो यह समस्या और भयावह रूप ले सकती है।
जिम्मेदार कौन? सिस्टम या हालात?
तेंदुओं के हमलों को लेकर एक हद तक यह तर्क दिया जा सकता है कि इंसान ने उनके क्षेत्र में अतिक्रमण किया है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अवैध निर्माण और शहरी विस्तार ने वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास से बेदखल कर दिया है।
लेकिन आवारा कुत्तों के मामले में यह तर्क नहीं चलता। यह पूरी तरह से प्रशासनिक विफलता का मामला बन चुका है। नसबंदी और टीकाकरण जैसे कार्यक्रम कागजों में तो चलते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका असर नजर नहीं आता। अक्सर यह भी आरोप लगते हैं कि इन योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार होता है, जिसके कारण न तो कुत्तों की संख्या कम होती है और न ही रेबीज जैसे खतरनाक रोग पर नियंत्रण हो पाता है।
जनता में बढ़ता डर और गुस्सा
लगातार हो रहे हमलों ने लोगों में डर के साथ-साथ गुस्सा भी पैदा कर दिया है। लोग अब प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं कि आखिर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
बच्चे स्कूल जाने से डर रहे हैं, बुजुर्ग घर से बाहर निकलने से कतरा रहे हैं और महिलाएं शाम के बाद अकेले निकलने में असुरक्षित महसूस कर रही हैं।
समाधान
- इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए त्वरित और ठोस कदम उठाने की जरूरत है:
- वन क्षेत्रों का संरक्षण और तेंदुओं के लिए पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था
- शहरी विस्तार पर नियंत्रण और वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्गों को सुरक्षित रखना
- आवारा कुत्तों की व्यापक नसबंदी और टीकाकरण अभियान
- स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय करना
- रेबीज के प्रति जागरूकता और तुरंत इलाज की व्यवस्था
- आवारा कुत्तों की नसबंदी और रेबीज का इंजेक्शन लगाकर जंगलों में छोड़ना।
3 गायों के शिकार के बाद 2 और गायों को ले गया तेंदुआ
बड़गोंदा नर्सरी से कुछ किलोमीटर दूर बसीपीपरी पंचायत की सीमा के अंदर महू फारेस्ट रेंज की आड़ा पहाड़ वन चौकी के इलाके में बनी गौशाला तेंदुओं के लिए शिकारगाह बन चुकी है। इस इलाके में अब तक तेंदुए इस गौशाला की 5 गायों का शिकार कर चुके हैं।
जिस गौशाला अथवा वृद्ध गौ आश्रम को लावारिस असहाय कमजोर गायों की बेहतर परवरिश और अच्छी तरह से देखभाल के लिए बनाया गया था, मगर आवश्यक और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने के चलते इसी गौशाला की अब तक 5 गायें तेंदुओं का शिकार हो चुकी हैं। गौशाला संचालक मनोज अशोक पाटीदार का कहना है कि उन्होंने इस घटना के बाद गौ शाला में सुरक्षा के लिए जाली लगवा दी है। इसके अलावा खुली जगह को पूरी तरह से बन्द कर दिया है। इधर वन विभाग का दावा है कि घटनास्थल पर कैमरे लगा चुके हैं। गौशाला संचालक और वन विभाग के इन दावों के बावजूद तेंदुए अलग-अलग मौके पर 3 बार हमला कर अब तक 5 गायों का शिकार कर चुके हंै।
पाटीदार के मुताबिक गौशाला वाले इलाके में एक से ज्यादा तेंदुओं का मूवमेंट है। ऐसा लगता है कि तेंदुआ अपने पूरे परिवार के साथ मौजूद है। मामले में महू वन विभाग एसडीओ कार्यालय ने भी स्वीकार किया कि कुल पांच गायों का शिकार तेंदुओं ने किया है।

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