एक समय था जब उत्तर प्रदेश को माफियाओं का गढ़ कहा जाता था। अपराध, रंगदारी, अवैध खनन और कानून के प्रति खुला चैलेंज वहां की पहचान बन चुका था, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जिस सख्ती के साथ कानून व्यवस्था को प्राथमिकता दी, उसने हालात बदलकर रख दिए। आज वही उत्तर प्रदेश अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई और मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति का उदाहरण बन चुका है।

जिस दौर से उत्तर प्रदेश बाहर निकल आया, दुर्भाग्य यह है कि उसी अंधेरे की ओर अब मध्यप्रदेश बढ़ता नजर आ रहा है। प्रदेश में कानून का डर खत्म होता जा रहा है और अपराधियों के हौसले बुलंद होते दिख रहे हैं। यह सिर्फ एक धारणा नहीं, बल्कि रोज सामने आ रही घटनाएं इस कड़वी सच्चाई की पुष्टि करती हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति खनन माफियाओं की है। नदियों को बेरहमी से छलनी किया जा रहा है, पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है और जो भी अधिकारी या कर्मचारी इस अवैध कारोबार के खिलाफ खड़ा होता है, उसे कुचलने तक की घटनाएं सामने आ रही हैं। यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि कानून और शासन के लिए खुली चुनौती है। सवाल यह है कि आखिर इन माफियाओं को यह दुस्साहस कहां से मिल रहा है? स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। प्रदेश में बाहरी गैंगों की सक्रियता तेजी से बढ़ रही है। व्यापारी वर्ग को फोन कर रंगदारी मांगी जा रही है, धमकियां दी जा रही हैं और डर का माहौल बनाया जा रहा है। इसी के साथ नशे का कारोबार एक नई सामाजिक बीमारी के रूप में फैल रहा है। ‘पाउडर’ जैसे नशीले पदार्थ खुलेआम बिक रहे हैं और सबसे भयावह बात यह है कि कम उम्र के बच्चों को इसकी गिरफ्त में धकेला जा रहा है। किशोर अपराधों में बढ़ोतरी इसी का सीधा परिणाम है। मामूली विवादों में दिनदहाड़े हत्या जैसी घटनाएं अब असामान्य नहीं रहीं। यह स्थिति केवल कानून व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि समाज के भविष्य के लिए भी गंभीर खतरा है। भ्रष्टाचार मध्यप्रदेश में जड़े जमा चुका है। हर विभाग में घूसखोर बैठे हैं और बिना रिश्वत के कोई काम नहीं करते। इंदौर शहर स्वच्छता और विकास के लिए जाना जाता है और अब अपराध और नशे के नेटवर्क के लिए भी पहचान बना रहा है।  आए दिन ड्रग्स पैडलरों की गिरफ्तारी यह बताती है कि समस्या कितनी गहरी जड़ें जमा चुकी है। सवाल यह नहीं है कि अपराधी पकड़े जा रहे हैं, बल्कि यह है कि अपराध हो ही क्यों रहे हैं और इतनी बड़ी संख्या में क्यों हो रहे हैं? नाबालिग बच्चों को ड्रग्स का आदी बनाया जा रहा और ये बच्चे खुलेआम अपराध कर रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी चिंता प्रशासनिक ढीलापन और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। जब तक अपराधियों को यह भरोसा रहेगा कि वे बच निकलेंगे, तब तक वे कानून को चुनौती देते रहेंगे। जरूरत है कि पुलिस और प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया जाए, कानून से ऊपर कोई नहीं है।

मध्यप्रदेश को ‘शांति का टापू’ कहने की परंपरा रही है, लेकिन हालात इस छवि को धूमिल कर रहे हैं।  पुलिस को सख्त होना होगा और जो आरोप खाकी पर लगते आ रहे है, उससे भी बचना होगा और माफियाओं पर निर्णायक कार्रवाई कर असामाजिक तत्वों में कानून का डर बनाना होगा।

-जगजीतसिंह भाटिया

प्रधान संपादक


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