मुंबई के गोरेगांव से आई एक दर्दनाक खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। महज 24 वर्ष के दो छात्रों, एक युवक और एक युवती की संदिग्ध ड्रग ओवरडोज से मौत हो गई। शुरुआती जांच में सामने आया है कि तीन छात्रों का एक ग्रुप किसी निजी कार्यक्रम में शामिल था, जहां नशे का सेवन किया गया। अचानक हालत बिगड़ी और अस्पताल पहुंचने से पहले ही दो जिंदगियां खत्म हो गईं। तीसरे छात्र की हालत भी गंभीर बताई जा रही है। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि आखिर इन युवाओं तक यह जहरीला नशा पहुंचा कैसे और इसके पीछे कौन लोग हैं।

लेकिन यह घटना सिर्फ एक केस नहीं है, यह उस खतरनाक सामाजिक सच्चाई का आईना है, जिसे हम लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं।

कॉलेज की दहलीज और ‘आजादी’ का भ्रम

स्कूल से निकलकर जब छात्र कॉलेज में कदम रखते हैं, तो उनके सामने एक नई दुनिया होती है, बिना रोक-टोक की दुनिया, जहां ‘कोई देखने वाला नहीं’ का भ्रम हावी रहता है। यही वह मोड़ होता है, जहां कई युवा सही-गलत का फर्क भूलकर ‘आजादी’ को ‘मनमानी’ समझ बैठते हैं। आज का युवा यह मानने लगा है कि जिंदगी का असली मजा पार्टी, पब, शराब और ड्रग्स में है। सोशल मीडिया, वेब सीरीज और फिल्मों ने इस धारणा को और मजबूत किया है कि नशा करना ‘कूल’ है,  लेकिन यह ‘कूल’ ट्रेंड कब जानलेवा बन जाता है, इसका अंदाजा गोरेगांव की इस घटना से लगाया जा सकता है।

नशा: एक खामोश महामारी

देश के महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक ड्रग्स का नेटवर्क तेजी से फैल चुका है। पहले यह समस्या सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन अब गांवों की गलियों तक भी इसका जहर पहुंच चुका है। इंदौर में तो कुछ क्षेत्र पाउडर वाली गली के नाम से भी जाने जाने लगे हैं। कोकीन, एमडीएमए, एलएसडी, सिंथेटिक ड्रग्स, ये नाम अब सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं हैं। कॉलेज कैंपस, हाउस पार्टी, क्लब और यहां तक कि पीजी और होस्टल भी इनका अड्डा बनते जा रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ड्रग्स अब  ‘हाई-प्रोफाइल’ चीज नहीं रह गई, बल्कि आसानी से उपलब्ध हो रही है। कुछ क्लिक में ऑनलाइन डिलीवरी तक संभव हो रही है।

माता-पिता की चूक या व्यस्तता का बहाना?

इस पूरी तस्वीर में सबसे बड़ा सवाल माता-पिता की भूमिका पर खड़ा होता है। क्या उन्हें सच में पता है कि उनके बच्चे कहां जा रहे हैं?

किसके साथ समय बिता रहे हैं? किस तरह की लाइफस्टाइल अपना रहे हैं? अफसोस की बात यह है कि आज कई माता-पिता अपने बच्चों को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं। उन्हें लगता है कि आर्थिक जरूरतें पूरी कर देना ही उनकी जिम्मेदारी है। लेकिन भावनात्मक जुड़ाव और निगरानी की कमी बच्चों को गलत रास्तों की ओर धकेल रही है।

पुलिस की प्राथमिकता पर सवाल

यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि कई जगहों पर पुलिस की कार्रवाई छोटे-मोटे मामलों तक सीमित रह जाती है। गांजा या मामूली नशे के मामलों में कार्रवाई जरूर होती है, लेकिन बड़े ड्रग सिंडिकेट तक पहुंचने में सुस्ती दिखाई देती है। कैसे शहरभर की पान की दुकानें चकाचक होती जा रही है। पब में पार्टियां हो रही हैं, जहां पर शराब के साथ-साथ ड्रग्स की सप्लाई अधिक हो गई है...। 

मजदूर तक बेच रहे ड्रग्स

इंदौर शहर की बात की जाए तो यहां पर मजदूर वर्ग को इस पेशे में बड़े सप्लायरों ने डाल दिया है। इन पर संदेह नहीं होता और ये लोग कॉलेज तक पहुंच रहे हैं और ड्रग्स सप्लाई कर रहे हैं। बड़े सप्लायर पुलिस के हाथ आ ही नहीं रहे हैं।  पुलिस के बयान जरूर होते हैं कि जो ड्रग्स बेचने वाले मजदूर लोग पकड़ा जा रहे हैं, उनसे पूछताछ की जा रही है कि कहां से वो ड्रग्स लाकर बेच रहे हैं, लेकिन बड़े सप्लायरों को लेकर आज भी पुलिस खालीहाथ ही है। जब तक इस नेटवर्क की जड़ तक नहीं पहुंचा जाएगा, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे।

नशे के बाद रिश्तों का पतन

नशा सिर्फ शरीर को नहीं, बल्कि सोच और संस्कार को भी खोखला कर देता है। ड्रग्स के प्रभाव में युवा अपनी सीमाएं भूल जाते हैं। अस्थायी रिश्ते, शारीरिक संबंध, भावनात्मक शोषण, यह सब एक  सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। यह सिर्फ व्यक्तिगत पतन नहीं है, बल्कि समाज की मूल संरचना पर हमला है। रिश्तों की गंभीरता खत्म हो रही है और दुखद ये भी है कि ‘यूज एंड थ्रो’ की संस्कृति बढ़ती जा रही है।

पुलिस का रवैया ईमानदार वाला होना चाहिए

दरअसल, कई बार देखने में आता है कि पुलिस की लापरवाही की वजह से कई जगह अवैध धंधे चल रहे होते हैं और ऐसे कई मामलों में थाना प्रभारियों तक को निलंबन की गाज गिर चुकी है। पुलिस अधिकारियों को सोचना चाहिए कि यदि उनके बच्चे ड्रग्स के लती हो जाएंगे तो क्या करेंगे? इसलिए पैसों का लालच और सेटिंगबाजी छोड़ ईमानदारी से ड्यूटी कर ड्रग्स सप्लायरों को पकड़े। वहीं, स्कूल, कॉलेज और पब्स में नियमित जांच होन चाहिए।  

मुंबई की घटना जैसी कई घटनाएं हो रही है, लेकिन कोई इस मामले को लेकर गंभीर होता नजर नहीं आ रहा है। आज किस तरह से लोग बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा कर रहे हैं, ये वो जानते हैं। बैंक लोन लेकर बड़े कॉलेजों में पढ़ाना, होस्टल के खर्चे सहित तमा खर्च उठाते-उठाते मां-बाप कर्ज के बोझ उठाते रहते हैं और उच्च शिक्षित छात्र-छात्राएं कॉलेज की डिग्री लेने के बाद या कॉलेज में अध्ययनरत होते हुए नशा कर रहे हैं? क्या ये ही जीवन है? नशा एक धीमा जहर है, जो सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार और समाज को खत्म कर देता है। अगर अब भी हम नहीं चेते, तो आने वाला समय और भी भयावह होगा।

शहरों की चकाचौंध का काला सच

मेट्रो शहरों की चमक-दमक के पीछे एक अंधेरा भी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। नाइटलाइफ, क्लब कल्चर, वीकेंड पार्टी, ये सब अब स्टेटस सिंबल बन चुके हैं। युवा इन गतिविधियों को ‘मॉडर्न लाइफस्टाइल’  समझकर अपना रहे हैं और धीरे-धीरे यही लाइफस्टाइल उन्हें नशे और अपराध के दलदल में धकेल रही है।

शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी

कॉलेज और यूनिवर्सिटी सिर्फ डिग्री देने के केंद्र नहीं हैं, बल्कि चरित्र निर्माण के भी केंद्र भी है, लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश संस्थान इस जवाबदेही से बच रहे हैं और उनका उद्देश्य सिर्फ मोटी फीस वसूलना है। माता-पिता को बच्चों के साथ खुलकर बात करनी चाहिए। उनकी दिनचर्या और दोस्तों की गतिविधियों पर नजर रखना चाहिए। बच्चों का अचानक व्यवहार में बदलाव आए तो नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

युवाओं के लिए ‘जवाबदेही’ का संदेश

‘कूल’ दिखने के चक्कर में जिंदगी बर्बाद न करें। असली आजादी जिम्मेदारी के साथ आती है। नशा कोई समाधान नहीं, बल्कि समस्या की शुरुआत है।

तस्करों की कुएं में डूबने से मौत

शहडोल। जैतपुर इलाके में नशे के अवैध कारोबार से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। पुलिस से बचने की कोशिश में भाग रहे तीन तस्करों की खेत में बने एक कुएं में गिरने से मौत हो गई।  जानकारी के मुताबिक, घटना की शुरुआत कामता कॉलेज तिराहे के पास हुई, जहां डायल-112 की टीम देर रात गश्त पर थी। इसी दौरान पुलिस को सड़क किनारे एक दुर्घटनाग्रस्त कार मिली।  जब पुलिस ने कार की तलाशी ली, तो उसमें कोई व्यक्ति नहीं मिला, लेकिन अंदर से 5 किलो से ज्यादा गांजा बरामद हुआ। पुलिस ने मादक पदार्थ जब्त कर लिया और आसपास तलाशी के बाद थाने लौट गई। मामले ने अगली सुबह नया मोड़ ले लिया, जब एक किसान ने पुलिस को सूचना दी कि उसके खेत में बने कुएं में तीन शव दिख रहे हैं। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। गोताखोरों की मदद से कुएं से एक-एक कर तीन शव बाहर निकाले गए।

ऐसे हुआ हादसा

प्रारंभिक जांच के अनुसार, देर रात पुलिस की गाड़ी देखकर तस्करों ने अपनी कार तेज गति से भगाने की कोशिश की, जिससे वाहन अनियंत्रित होकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसके बाद तीनों युवक अंधेरे का फायदा उठाकर खेतों की ओर भागे।  घबराहट और अंधेरे के चलते उन्हें खेत में बना कुआं दिखाई नहीं दिया और वे सीधे उसमें गिर गए। हादसे में घायल होने के कारण वे बाहर नहीं निकल सके और डूबने से उनकी मौत हो गई।


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