धार्मिक विचारधारा
श्री गुरू नानक देव जी ने देखा कि मनुष्यों के बीच होने वाले अधिकतर वैर-विरोध का कारण मज़हबी ख्याल था। हिन्दू मुसलमानों को मलेच्छ मानते थे तथा उन के स्पर्श से बचने का अधिक से अधिक यत्न करते थे। इस के विपरीत मुसलमान यह कहते थे कि हज़रत मुहम्मद साहिब द्वारा प्रचार किए गए दीन को न मानना कुफ़र है तथा इस दीन को न मानने वाले सभी काफ़िर है। सब सम्भव साधनों द्वारा काफ़िरों को इस्लाम की सीमा में लाना इस्लामी शराह के अनुसार हलाल था तथा मोमनों का ज़रूरी फर्ज़ था। हिन्दूओं को हाकम-कौम का दीन कबूलने हेतु मज़बूर करने के लिए हर तरह की कठोरता बल, आर्थिक तथा सामाजिक परेशानियों तथा बाधाओं का शरेआम प्रयोग किया जाता था। इसलिए यह बात हैरानी वाली नहीं कि बहुत लोगों ने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। जो इस धर्म परिवर्तन से बचे रहें, वे करीब-करीब ऐसा सब कुछ गंवा बैठे, जो जीवन को इज्जत या स्वभाविकता देता है।
हाकम कौम स्वर्ग तथा परमात्मा की प्रसन्नता तथा कृपा प्राप्ति की आशा में हिन्दूओं को तुच्छ जान कर उन से नफरत तथा गन्दा व्यवहार करती थी। इस तरह ताकत तथा हकूमत का नशा और घमण्ड मुसलमानों को वहशी तथा पशु बना रहा था। दूसरी तरफ मुसलमानों द्वारा हिन्दूओं पर जो मानवताहीन दुर्व्यवहार तथा अत्याचार किए जा रहे थे उन से हिन्दूओं के मन में मुसलमानों के विरुद्ध जो नफरत पैदा हो रही थी तथा बढ़ रही थी, वह उन की आत्मा को कूबेद रही थी। उन का धर्म अन्धविश्वास, पाखण्ड तथा दिखावे का रूप धारण कर चुका था।
मानवता के प्रेमी होने के कारण श्री गुरू नानक देव जी ने इस दोतरफी बदी तथा गिरावट की जड़ खोदने की मुहिम आरम्भ की। दूसरों के धर्मों तथा विश्वासों सम्बन्धी आप की सहनशीलता या विचारधारा अद्वितीय थी। आप एक उच्च जाति के घराने में पैदा हुए। आप ने अपने घराने के रीति-रिवाजों की गैर कुदरती बन्दिशों को तोड़ा। आप ने दूर-दूर तक लम्बे सफ़र किए तथा अरब, मिश्र, तुरकी, सूडान, तुरकिस्तान, ईराक, अफगानिस्तान, तिब्बत, चीन तथा लंका आदि दूर-दूर देशों के चक्कर लगाए। वे इन देशों के लोगों से पूर्ण रूप से खुले ढंग से मिलते रहे। उन्होंने कभी भी किसी के साथ मिलने बैठने तथा व्यवहार करने से पहले यह पूछताछ न की कि उन का दीन धर्म क्या है? या जाति-जन्म के आधार पर समाज में उन का क्या स्थान है?
वे हर स्थान पर ‘जी आया’ कहलवाने वाले तथा आदर सत्कार प्राप्त करने वाले अतिथि होते थे। वे ऐसे सब लोगों के घर आतिथ्य स्वीकार करते तथा भोजन करते थे, जिन के दिल में परमात्मा का प्यार होता था। वे निम्न जाति के धार्मिक लोगों को उच्च जाति, पदवी पर मलिन हृदय वाले लोगों की अपेक्षा अच्छा समझते थे। आप का ऐलान था :
नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु ॥
नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस ॥
जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस ॥
आप ने ऐलान किया कि परमात्मा के बंदे, जहाँ भी वे हों, चाहे वे किसी भी नस्ल या धर्म के हों, सब एक जैसे भाईचारे के अंग होते हैं तथा वह भाईचारा होता है मानवता का भाईचारा, जो जन्म, जाति, नस्ल तथा धर्म की जंजीरों से आज़ाद होता है। आप का यकीन था कि सभी इन्सान एक ही पिता के पुत्र हैं तथा एक दूसरे के भाई हैं। वह सब का सांझा पिता है। भिन्न-भिन्न धर्म के मत तो केवल पोशाक या भेष ही हैं जो इस सारे जगत् तमाशे में भाग लेने वाले भिन्न-भिन्न अदाकार धारण करते हैं। इस में जाति, मत या धर्म भला क्या फर्क डाल सकता है? फिर लोग इन लिबासों तथा (वेशभूषा) भेष के बारे में लड़ते क्यों हैं?
जहाँ भी आप जाते रहे, वहाँ ही आप लोगों को यही मति तथा उपदेश देते रहे कि भाई! अपने दीन धर्म को अच्छी तरह समझो। आप उन को समझाते रहे कि आप अपने किए कर्मों, अपनी करनी के आधार पर ही ऊँची या नीची पदवी प्राप्त कर सकते हो, न कि इस या उस दीन धर्म के धारणी होने से। जब आप मक्का गये, हज्ज पर गए हाज़ी काज़ियों-मुलाणों ने आप से पूछाः
हिन्दू वडा कि मुसलमानाेई?
बाबा आखे हाजीआ सुभि अमला बाझहु दोनो रोई।
हिन्दू मुसलमान दुइ दरगह अंदरि लहनि न ढोई।
आप ने उन को समझाया कि परमात्मा की प्रेमपूर्ण भक्ति तथा प्यार सहित मानव-मात्र की सेवा के सहारे ही परमात्मा की दरगह में आदर-मान प्राप्त होता है। प्यार, अमन, शांति तथा सद्भावना का यह सन्देश ही आप ने सब देशों तथा कौमों तक पहुँचाया। जिन्होंने भी आप का उपदेश सुना, वे तन मन से आप के बन गए। आप के चेले, मुरीद सभी दीन-धर्मों तथा जातियों बिरादरियों में से होते थे। गुरु हरिगोबिन्द साहिब तथा गुरु गोबिन्द सिंह जी की फौज में प्रसिद्ध मुसलमान यौद्धा गन अपनी मर्जी से भर्ती हुए तथा अपने दीन भाइयों के विरुद्ध बहादुरी से लड़ते रहे क्योंकि गुरू साहिब की लडाई मुसलमानों के विरुद्ध उन के मुसलमान होने के कारण नहीं थी बल्कि अत्याचारी तथा ज़ालिम होने के कारण थी। सिक्ख भी अपने दसों गुरू साहिबान के पदचिह्नों पर पूर्ण श्रद्धा तथा दृढ़ता से चलते आए है तथा सभी परमात्मा के बंदों का उन को अपने आत्मिक मंडल के भाई जान कर आदर स्वागत करते रहे हैं।
सिक्ख को हुक्म था कि वह सब बंदों को अपना भाई समझे। उसे हुक्म था कि वह दूसरों के विश्वासों तथा भावों का सत्कार करे। यह पाठ प्रत्येक सिक्ख ने चिरकाल से अच्छी तरह याद कर लिया है। सन् 1697 ईस्वी के करीब मुन्शी सुजानराय ने सिक्खों के बारे में यह लिखा-
“इन में से अध्यात्मिक लोगों ने संसारिक सम्बन्धों से पैदा होने वाली मलिनता से अपने हृदयों को पाक साफ कर लिया है, उन्होंने अपने अन्दर से दुनियावी झगड़े लड़ाइयों के पर्दे को फाड़ कर फेंक दिया है। अपने तथा पराये, साक सम्बन्धी, दूसरे बेगाने, मित्र तथा वैरी उन के लिये सब एक समान हैं। वे उन के साथ एक सा व्यवहार करते हैं। अपने मित्रों के साथ वे एकसुर हो कर रहते हैं; अपने शत्रुओं के साथ वे अमन सहित दिन गुज़ारते हैं। सिक्खों का अपने गुरू पर जो भरोसा विश्वास है वह अन्य धर्मों में कम ही मिलता है। अपने गुरू के नाम पर जिस की बाणी वे हर समय, हर साँस के साथ पढ़ते रहते हैं, मुसाफिरों राहगीरों की सेवा करने को वे भक्ति का काम समझते हैं। यदि कोई आदमी अर्धरात्रि में भी उन के दरवाजे पर आ जाए तथा बाबा नानक का नाम ले कर आवाज़ मारे, चाहे वह बेगाना ही हो, अजनबी हो, चाहे वह डाकू, लुटेरा, चोर या बदमाश ही हो, वे उस की आवश्यकता अनुसार सेवा करते हैं, उसी तरह जिस तरह यदि वह भाई या मित्र होता तो करते।”
हम अब भी देखते हैं कि जहाँ-जहाँ सिक्ख ज़मीनों के मालिक होने के कारण ताकत में हैं तथा मुसलमान सिर्फ कामे या मुज़ारे ही हैं, सिक्ख ज़मींदारों ने अपने मुसलमान कर्मकरों पड़ोसियों के लिए मस्जिदें बनवाई हुई हैं। इन को अपने दीन के अनुसार रहने तथा व्यवहार आदि की बिना रोकटोक पूर्ण आज़ादी होती है।
यह बात स्पष्ट करने के लिए बहुत कुछ कहा जा चुका है कि सिक्ख गुरू साहिबान का अपने सिक्ख सेवकों के प्रति हुक्म उपदेश यह था कि वे अपने दिलों को नफरत तथा मज़हबी ईष्या-द्वेष से पाक करें तथा दूसरों के विश्वासों, धर्मों तथा भावों का सत्कार करें। यह ही सबक है जो कि हिन्दुस्तान के लोगों को सीखना चाहिए तब ही वे एकजुट तथा एकसुर कौम का रूप धारण कर सकते हैं।
पवित्र भाईचारा
यहाँ हमें उन अत्याचारों तथा कठोरताओं का विस्तार सहित जिक्र, करने की आवश्यकता नहीं जो कथित नीच जाति तथा जातिहीन लोगों के साथ किए जाते थे। चारों तरफ दृष्टि डालने से ही पता चल जाता है कि इस बीसवीं सदी में भी वे किस रूप में तथा कितने जोर से कायम है। जिस समय गुरू नानक देव जी ने इस धर्महीन तौर-तरीके के विरुद्ध धर्मयुद्ध शुरू किया, उस समय हालात अब से बहुत अधिक खराब थे। आप ने देखा कि जो बेचारे लोग तथा कथित उच्चजाति के लोगों की हर तरह की सेवा करते थे, उन को उस सेवा के बदले में नीचा तथा घृणा योग्य समझा जाता था। उन को अछूत कहा जाता था। उन के साथ छू जाने से उच्च जाति के लोग मैले हो जाते थे, अपवित्र हो जाते थे। जब वे किसी गली, बाज़ार में से निकलते थे उन को ‘पोश पोश’ पुकारना पड़ता था ताकि उच्च जाति के लोग उन की परछाई या साथ छूने से पैदा होने वाली अपवित्रता से बच सकें। उच्च जाति के लोगों की उन सेवाओं को करने से जिन को वे स्वयं अपवित्र करने वाली गिनते थे तथा जिन को करने के लिये वे स्वयं कभी तैयार नहीं होते थे उन सेवाओं को करने के बदले में जो धन्यवाद उन बदनसीबों को मिलता था वह यह होता था कि उन को ‘परे हटो’, ‘दूर हटो’, ‘छुओ न’ कहा जाता था।
कई इलाकों में खास करके दक्षिण में तो अछूतों के लिये रास्ते तथा सड़कें भी अलग थी तथा आम लोगों वाले रास्तों पर चलने की उन को मनाही होती थी। मेहनत मज़दूरी करने वाले इन बदनसीब लोगों को यह भी आज्ञा नहीं थी कि वे परमात्मा तथा देवी देवताओं के आगे प्रत्यक्ष अरदास (प्रार्थना) करके अपने दिलों को होंसला दे लें। उन को मन्दिरों के पास जाने की भी आज्ञा नहीं थी। जैसे उन के अन्दर मुक्ति या उद्धार की ज़रूरतमंद आत्मा ही नहीं थी! धर्म पुस्तकें उन के लिए नहीं थीं। धर्म पुस्तकों का पाठ करने की उन को मनाही थी। धर्म पुस्तकें थीं भी ऐसी बोली में जिन को वे समझ नहीं सकते थे। उन को उच्च जाति के लोगों के गुलाम हो कर रहना पड़ता था तथा हर प्रकार की ज्यादती भरी नफरत सहनी पड़ती थी। कहा जाता था कि यह सब कुछ परमात्मा की आज्ञा अनुसार था तथा यह सब कुछ करना सहना ही उन मन्द भाग्य वालों के लिए योग्यता हासिल करने तथा अगले जन्म में अपनी किस्मत सुधारने का साधन हो सकता था। गुरू नानक देव जी ने यह सब देखा। नफरत तथा अहंकार के शिकार निम्न जाति के लोगों के लिए हमदर्दी से आप का हृदय भर उठा। उन्होंने इन को आज़ाद कराने का प्रण धारण किया। उन्होंने एक तथाकथित नीच जाति के मुसलमान मिरासी या डूम को अपने साथ लिया तथा उस को भाई कह कर बुलाया। आप ने अपने पवित्र भाईचारे की नींव रखी। प्रत्येक मनुष्य मात्र के लिये आप का खुशियों भरा सन्देश यह था कि किसी भी इन्सान से नफरत न करो, किसी को नीचा जान कर उस से घृणा न करो, परमात्मा प्रत्येक हृदय में घट-घट में बसता हैं; सारे एक ही पिता के पैदा किए हुए है। इस या उस परिवार या घराने में जन्म लेने से कोई ऊँचा या नीचा नहीं बन सकता, इन्सान के अमल या किए कर्म ही उस को नीच या उच्च बनाते हैं। परमात्मा या परमात्मा के बंदों की नज़रों में नीच जाति का नेक तथा धर्मी बन्दा उच्च जाति के बदमाश से अधिक प्यारा तथा अच्छा होता है। पिता परमात्मा के दरवाज़े सब के लिए खुले हैं। जगत् में अच्छा जीवन बिताओ। परमात्मा के पैदा किए गए सब के साथ प्यार करो तथा उन की सेवा करो। अपने सृजनहार करतार को हरदम याद रखो। इस तरह करने से तुम सारे ही चाहे तुम किसी भी जाति-जन्म के होवो अपने सब सांझे दयालु पिता के दरबार में स्थान प्राप्त कर सकोगे। मानव-मात्र की सेवा मनुष्य को ऊँचा करती है, नीचा नहीं करती। जो भाईचारा कायम करने के लिए मैं जगत् में आया हूँ उस में केवल उन का ही सत्कार होगा जो अपने पिता परमात्मा के पैदा किए गए लोगों की ज्यादा से ज्यादा सेवा करेंगें। प्रेम सहित की गई सेवा मुझे बहुत प्यारी है। आओ, सारे हर समय के लगातार तथा ज़िन्दगी भर के संयम तथा रहत के राह पर चलो। मेरी शिक्षा के अनुसार चलने वाले मेरे सिक्ख बनो। यह सीधी खड़ी ढलान वाला तंग रास्ता है; यह खंडे से तीखा तथा बाल से बारीक रास्ता है, पर यह पिता परमात्मा के साथ मेल की प्राप्ति का रास्ता है, सब लब, लोभ, अहंकार तथा निम्न चाहतें, अहंकार भरे सब नीच ख्याल, जन्म तथा जाति के सारे भ्रम-ये सब कुछ सदा के लिए त्यागना पड़ेगा। यहाँ अमल या करनी की आवश्यकता पड़ेगी, बातों की नहीं।
इस तरह गुरू नानक देव जी ने ऐसे पवित्र भाईचारे की नींव रखी जिस में नस्ल तथा धर्म के पक्ष से, राजकीय अधिकारी तथा धार्मिक विचारों के दृष्टिकोण से निम्न से निम्न तथा उच्च से उच्च सब बराबर हैं। जो उपदेश आप ने दूसरों को दिया वह आप ने जीवन में आप कमाया। जो भी उन के पास आता, वे उस की सेवा करते। वे पूर्ण आज़ादी से किसी प्रकार के संकोच के बिना प्रत्येक के साथ संगति करते थे, मिलते थे। उन के द्वारा ऐसा करने पर उच्च जाति के लोग उन से क्रूद्ध हो गए। उन लोगों ने आप को कुराह पर चलने वाला कहना शुरू कर दिया। वे कहते थे कि गुरू साहिब ठीक रास्ता छोड़ कर गलत रास्ते पर पड़ गए थे तथा अन्यों को भी कुमार्ग पर ले जा रहे थे। पर आप ने उन की बिल्कुल परवाह न की। उन के व्यंग तथा हसीं पर आप ने ध्यान ही न दिया। आप ने अपना यह प्रचार कि परमात्मा सब का साझा पिता है तथा सब मनुष्य भाई-भाई है. जारी रखा। आप के नौ जानशीन गुरू साहिबान ने बड़ी नम्रता तथा उत्साह के साथ शुरू किये इस कार्य को चालू रखा। जन्म तथा जाति के आधार पर बने नीचा करने वाले सब भेदभाव समाप्त हो गए। ‘वे सब जो आप के उसूलों को मानते थे एक ही स्तर के होते थे तथा जो ब्राह्मण आप के फ़िरके में शामिल होता था, उसे उस निम्नतम शूद्र से, जो उस के घर झाडू लगाता था अपने को किसी प्रकार का ऊँचा समझने का कोई अधिकार नहीं था।’ भाई गुरदास जी के कथन के अनुसार गुरू नानक देव जी ने ‘चार वरन इक वरन कराइआ’। अपने नए धर्म के प्रचार के लिए गुरू जी ने प्रत्येक स्थान पर सत्संग कायम किया। एक जगह के सारे श्रद्धालु सिक्ख एक स्थान पर जुड़ते। सब से बड़ी श्रद्धा वाला सिक्ख, चाहे वह किसी भी जाति, गोत्र बरादरी का होता. उन का नेता होता था। कई स्थानों पर तथाकथित नीच तथा अछूत जातियों के सिक्ख सर्वसम्मति से इस पदवी के लिए चुने जाते थे। सिक्ख संगत में प्रत्येक व्यक्ति जैसे जैसे आता, बैठता जाता; तथाकथित शुद्र ब्राह्मणों के साथ जुड़ कर बैठते थे। कोई भी अपवित्र नहीं मानता था तथा कोई भी हीनता की भावना से प्रभावित हो कर पीछे या परे हो कर नहीं बैठता था। इस तरह इक्टठे हो कर वे परमात्मा का यश गाते थे। यदि गर्मी की ऋतु होती तो हर कोई जुड़े बैठे भाईयों को पंखा करने तथा जल पिलाने की सेवा धन्य भाग समझ के करता। यह सेवा सारे करते थे तथा सारे ही दूसरों से सेवा ऐसे ही स्वीकार करते थे, जैसे भाई, भाईयों से करता है। जो सिक्ख, गुरु के घर जन्म लेने (सिक्ख बनने) से पहले ब्राह्मण होता, वह ऐसे सिक्ख से, जो इस पवित्र भाईचारे में मिलने से शूद्र था वैसे ही प्रसन्नता से जल पानी स्वीकार करता, जैसे वह स्वयं उस को छकाता। न इस तरह जल छका कर वह अपवित्र होता तथा न जल छका कर वह नीचा ही हो जाता। सेवा तथा वह सेवा जिस को हीन तथा नौकरों द्वारा की जाने वाली गिना जाता था, जिस को उस समय तक सारे लोग छोटी तथा छोटा करने वाली मानते थे, सिक्ख संगत में उत्साह तथा चाव के साथ की जाती। प्रत्येक सेवा करने का उत्साह रखता था। इस सेवा के कारण लोग गुरु जी तथा सिक्ख की नज़रों में ऊँचे, पवित्र तथा आदर योग्य बन जाते थे।
छुआ-छूत का नाम निशान भी न रह गया। सारे सिक्ख इक्टठे हो कर ऐसे बैठते थे जैसे चूल्हे के पास सगे भाई बैठते हैं। एक बार गुरू गोबिन्द सिंह जी ने देखा कि एक आदमी उन के दरबार में आया तथा दूर से ही माथा टेक कर, अलग हो कर एक कोने में जा बैठा। गुरू जी ने उसे अपने पास बुलाया तथा उस के संगत से अलग हो कर बैठने का कारण पूछा। गुरू जी को पता लगा कि उस आदमी के मन में हीनता का वह भाव जड़ पकड़ कर बैठा है जो युगों से जात-पात के सिलसिले की बेइन्साफियों को सहन करके निम्न जातियों के लोगों में पैदा हुआ था। उस ने हाथ जोड़ कर विनती की - सच्चे पातशाह! लोग मुझे अछूत कहते हैं। यदि मैं उन के साथ छू जाऊँ, या मेरी परछाई उन पर पड़ जाए तो वे अपवित्र हो जाते हैं, मैले हो जाते हैं। आप जन्म के क्षत्रिय हो, उच्च जाति के हो। आप के पास ब्राह्मण तथा अन्य उच्च जाति के लोग बैठे हैं। मैं यह जुरअत कैसे कर सकता था कि बीच में आ कर इन को अपवित्र कर देता? यदि मैं ऐसा कुछ कर बैठता तो मेरी दुर्गति होती! गुरू जी अपने तख्त से उतरे तथा उस आदमी को जिस से उच्च जाति वाले नफरत करते थे, बाहों में लिया तथा कहा ‘आ भाई मेरे! तू अछूत नहीं, तू तो मेरा प्यारा है, मेरा हीरा है। तू पूर्ण आज़ादी से यहाँ आया कर बिल्कुल संकोच मत किया कर। जो भी यहाँ आते हैं वे शूरवीर तथा संत बन जाते हैं। परमात्मा के सिपाही, मानव जाति के वीरों की एक नई कौम।
इस ही ढंग से गुरू जी नीचों को ऊँचा करते थे तथा जन्म जाति से पैदा होने वाला अहंकार तथा हीनभावना मिटाते थे।

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