इंदौर, जो स्वच्छता में देश का सिरमौर बन चुका है, वहीं ट्रैफिक अनुशासन के मामले में लगातार फिसलता नजर आ रहा है। शहर के हालिया आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि समाज के तौर पर हमारी प्राथमिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं। वर्ष 2026 के पहले तीन महीनों, जनवरी, फरवरी और मार्च में ट्रैफिक पुलिस ने हेलमेट न पहनने वाले वाहन चालकों के खिलाफ 1 लाख से अधिक चालान काटे और करीब 4 करोड़ 37 लाख रुपए का जुर्माना वसूला। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि मानसिकता का आईना है। सवाल यह है कि क्या इंदौर के नागरिकों को अपनी जान की कीमत से ज्यादा जुर्माना भरना आसान लग रहा है?
शहर में हेलमेट न पहनने की प्रवृत्ति इतनी व्यापक है कि पुलिस के लगातार अभियान और सख्ती के बावजूद लोग सुधरने को तैयार नहीं हैं। जनवरी में 31,813, फरवरी में 34,866 और मार्च में 36,679 चालान काटे गए। यानी हर महीने नियम तोड़ने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। यह स्थिति बताती है कि लोगों ने ट्रैफिक नियमों को ‘विकल्प’ समझ लिया है, ‘अनिवार्यता’ नहीं।
लोगों के लिए 500 या 1000 रुपए का चालान भरना शायद आसान है, लेकिन हेलमेट पहनने की आदत डालना कठिन। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति है।
चार करोड़ का सवाल: क्या यह पैसा बच सकता था?
तीन महीनों में 4 करोड़ 37 लाख रुपए का जुर्माना, यह राशि केवल सरकारी खजाने में जमा हुई रकम नहीं है, बल्कि यह उन नागरिकों की मेहनत की कमाई है, जो अपनी ही सुरक्षा को नजरअंदाज कर रहे हैं। यदि यही लोग हेलमेट पहन लेते, तो यह पैसा बच सकता था।
और यही वह बिंदु है जहां यह मुद्दा केवल ट्रैफिक नियमों से उठकर सामाजिक जिम्मेदारी तक पहुंच जाता है।
क्या नियम तोड़ने वाले इस दिशा में सोच सकते हैं...?
इंदौर में एक मासूम बच्ची, अनिका शर्मा, जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही है। उसे स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) टाइप-2 जैसी दुर्लभ बीमारी है, जिसके इलाज के लिए करीब 9 करोड़ रुपए का इंजेक्शन जरूरी है। अब तक क्राउड फंडिंग के जरिए करीब 4.5 करोड़ रुपए जुटाए जा चुके हैं। यानि अभी भी लगभग उतनी ही राशि की जरूरत है।
अब जरा सोचिए : जिस शहर ने सिर्फ तीन महीनों में ट्रैफिक नियम तोड़ने के कारण 4 करोड़ से ज्यादा का जुर्माना भर दिया, क्या ये नियम तोड़ने वाले इतनी राशि अनिका शर्मा का जीवन बचाने के लिए दे सकते हैं?
प्राथमिकताएं क्या हैं हमारी?
- क्या हम अपनी जान की सुरक्षा को महत्व नहीं देते?
- क्या हमें नियमों का पालन करना शर्मिंदगी लगता है?
- क्या हम केवल मजबूरी में जुर्माना भरते हैं, लेकिन स्वेच्छा से अनुशासन नहीं अपनाना चाहते?
यातायात पुलिस की सख्ती
इंदौर ट्रैफिक पुलिस ने इस साल की शुरुआत से ही सख्त अभियान चलाया है। आईटीएमएस (इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम) के जरिए ई-चालान जारी किए जा रहे हैं, चौराहों पर चेकिंग बढ़ाई गई है, और विभिन्न नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की जा रही है। फिर भी, हेलमेट न पहनने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके अलावा रेड लाइट जंप करना, लेफ्ट टर्न के नियमों का पालन नहीं करना सहित तमाम परेशानियां हैं, जिससे निजात नहीं मिल पा रही है। खासकर दो पहिया वाहन चालकों की वजह से और ई-रिक्शा चालकों की वजह से पूरे शहर का ट्रैफिक बिगड़ा हुआ है।
तेज रफ्तार पर ढील, सिस्टम की कमजोरी
जहां एक ओर हेलमेट को लेकर सख्ती है, वहीं तेज गति से वाहन चलाने वालों पर नियंत्रण लगभग न के बराबर है। पिछले तीन महीनों में तेज गति के केवल 2 मामले दर्ज होना यह बताता है कि या तो निगरानी कमजोर है, या फिर व्यवस्था पूरी तरह सक्रिय नहीं।
ट्रैफिक अव्यवस्था का एक बड़ा कारण अतिक्रमण
- फुटपाथों पर दुकानें
- सड़कों पर ठेले
- अवैध पार्किंग
- सार्वजनिक स्थानों पर कब्जे
जवाबदेही किसकी?
यह सवाल बार-बार उठता है कि जवाबदेही किसकी है, शासन की या जनता की? सच यह है कि जिम्मेदारी दोनों की है। प्रशासन का काम है नियम बनाना और उनका पालन कराना। जनता का कर्तव्य है उन नियमों का सम्मान करना, लेकिन जब जनता ही नियमों को नजरअंदाज करने लगे, तो कोई भी सिस्टम सफल नहीं हो सकता।
मानसिकता बदलने
की जरूरत
इंदौर को अगर ट्रैफिक के मामले में भी उदाहरण बनना है, तो सबसे पहले मानसिकता बदलनी होगी। हमें यह समझना होगा कि हेलमेट चालान से बचने के लिए नहीं, अपनी जान बचाने के लिए है। ट्रैफिक नियम कोई बोझ नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच हैं। जुर्माना भरना साहस का काम नहीं, बल्कि लापरवाही का प्रमाण है।
क्या हम उस समाज का हिस्सा बनना चाहते हैं, जहां:
- लोग नियम तोड़ने में गर्व महसूस करते हैं?
- जुर्माना भरना आम बात है?
- और एक बच्ची के इलाज के लिए पैसा जुटाना कठिन?
- या हम वह समाज बनना चाहते हैं, जहां:
- लोग जिम्मेदारी से वाहन चलाते हैं
- नियमों का पालन स्वेच्छा से होता है
- और जरूरतमंद की मदद के लिए लोग आगे आते हैं
- जुर्माना नहीं, जागरूकता जरूरी
इंदौर के आंकड़े एक चेतावनी हैं
यह केवल ट्रैफिक का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का प्रश्न है। चार करोड़ रुपए का जुर्माना यह साबित करता है कि लोगों के पास पैसा है, लेकिन प्राथमिकताएं गलत हैं। अब फैसला इंदौर के लोगों को करना है कि उन्हें जुर्माना भरने वाला शहर बनना है, या जिम्मेदारी निभाने वाला।क्योंकि आखिर में सवाल सिर्फ हेलमेट का नहीं है, सवाल है सोच का।
देवगुराड़िया के पास सड़क हादसे में चार की मौत, आठ घायल
देवगुराड़िया मार्ग पर रविवार रात ढाई बजे के करीब सड़क हादसे में चार लोगों की जान चली गई। मिनी ट्रक और वैन की आमने-सामने टक्कर हो गई। टक्कर इतनी जोरदार थी कि गाड़ी में सवार लोग सड़क पर आ गिरे तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक की मौत उपचार के दौरान हुई। घटना में आठ लोग घायल हुए हैं। मृतकों की पहचान इरफान, आशिर और फरहान व एक अन्य रुप में हुई है। मृतक व घायल सदर बाजार निवासी है। वाहन में बाराती सवार थे। आष्टा से शादी के बाद वे इंदौर की तरफ लौट रहे थे और मिनी ट्रक सामने की दिशा से आ रहा था। घटना की जानकारी मिलने के बाद घायलों के रिश्तेदार एमवाय अस्पताल पहुंचे। कुछ लोग मौके पर भी पहुंच गए थे।
इंदौर ट्रैफिक जाम पर हाईकोर्ट सख्त
इंदौर शहर में ट्रैफिक जाम और अव्यवस्थित यातायात प्रबंधन को लेकर दायर जनहित याचिका पर गुरुवार को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में सुनवाई हुई। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच के समक्ष यह मामला प्रस्तुत किया गया। यह जनहित याचिका राजलक्ष्मी फाउंडेशन द्वारा दायर की गई है, जिसमें शहर में बढ़ते ट्रैफिक जाम, ट्रैफिक सिग्नलों के समुचित संचालन के अभाव और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अजय बागड़िया, एडवोकेट शिरीन सिलावट के साथ उपस्थित हुए। सुनवाई के दौरान कोर्ट को अवगत कराया गया कि इस मामले में 14 अक्टूबर 2019 को पारित आदेश आज भी पूर्ण रूप से प्रासंगिक है। उस आदेश में हाईकोर्ट ने निर्देश दिए थे कि शहर के सभी प्रमुख चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल 24 घंटे चालू और कार्यशील रखे जाएं, पीक आवर्स में दो-दो ट्रैफिक कर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए, विशेष रूप से सुबह 8 बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम 5 बजे से रात 11 बजे तक।
साथ ही राज्य को यातायात का निर्बाध और सुरक्षित प्रवाह सुनिश्चित करने का दायित्व निभाने के लिए कहा गया था। सुनवाई में कोर्ट ने पूर्व आदेश की भावना को दोहराते हुए प्रतिवादियों को निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि यह विषय केवल प्रशासनिक सुविधा का नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा, समय की बचत और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा है। कोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख 20 अप्रैल नियत की है। इसमें कलेक्टर, निगम कमिश्नऔर डीसीपी ट्रैफिक को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं।
शाम को प्रतिदिन लगता जाम : शहर में प्रतिदिन शाम को जाम के हालात देखने को मिलते है। मुख्यमार्गो को जोड़ने वाली सड़क तक जाम लग जाता है। ट्रैफिक पुलिस ड्रोन कैमरों से नजर रखकर जाम खुलवाती भी है, प्रतिदिन लगने वाले जाम से जनता परेशान हो चुकी है।
- ऑनलाइन और डिजिटल काम
- सोशल मीडिया मैनेजमेंट
- कंटेंट क्रिएशन
- यूट्यूब चैनल
- फ्रीलांसिंग
अगर सही दिशा और मेहनत हो, तो यह क्षेत्र भी अच्छा रोजगार दे सकता है।
सोच बदलने की जरूरत... समस्या का मूल कारण यह है कि समाज में अभी भी “छोटा काम” करने को लेकर एक हीन भावना बनी हुई है। युवा यह सोचते हैं कि जब तक सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी, तब तक वे कोई अन्य काम नहीं करेंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता, सोच छोटी होती है। जो युवा समय रहते छोटे काम से शुरुआत करते हैं, वही आगे चलकर बड़े उद्यमी बनते हैं।
सरकार और सिस्टम की जिम्मेदारी...
यह भी सच है कि सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वे युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार के अवसर पैदा करें। लेकिन केवल सरकार पर निर्भर रहना भी समाधान नहीं है।
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