जगजीतसिंह भाटिया
प्रधान संपादक
हर धर्म हिंसा के खिलाफ है। हिंसा किसी भी प्रकार की हो, वो एक बड़ी समस्या ही है और हिंसा करने किसी समस्या का हल करना नहीं होता। सामूहिक रूप से हिंसा करना सिर्फ कमजोरी को दर्शाता है, न कि किसी शक्ति को। अगर कोई भी व्यक्ति धर्म के नाम पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है और हिंसा करता है तो वह सिर्फ पाप करता है। नारेबाजी कर खुद को धर्म से बड़ा बताना अपराध ही है। आज हमारे देश में जो हो रहा है, वह ठीक नहीं है। बोलने की आजादी का ही परिणाम है कि लोग हिंसा पर उतर आए हैं। जब हम ये कहते हैं कि धर्म का प्रचार करो और अगर किसी मजहब में यदि कोई बात कही गई है और उसे कोई अन्य धर्म का व्यक्ति बोलता है तो वह अपराध कैसे हो सकता है? असम्मान कैसे हो सकता है, जो लिखा है वही तो बोला है। अब जमाना सोशल मीडिया का है, जिसमें लोग अपने विचार साझा करते हैं और अपनी बात रखते हैं। अच्छे विचारों को अमल में लाया जा सकता है। लोगों ने सोशल मीडिया का गलत उपयोग करना शुरू कर दिया। जो लोग गलत कर रहे हैं, उन्हें कानूनी रूप से सजा भी मिल रही है।
विषय चाहे कोई भी हो सत्य को झूठलाया तो नहीं जा सकता, तो फिर मानने में क्या हर्ज है। चाहे वो कोई भी धर्म और मजहब से जुड़ा व्यक्ति हो...। इतिहास में जो हुआ है, वो सभी को मालूम है..,नई पीढ़ी उससे अनजान है। और कहा जा रहा है कि युवाओं को इतिहास की जानकारी होना चाहिए। अब उदयपुर की घटना का जिक्र करते हैं, जहां अमानवीयता हुई और एक व्यक्ति की दो मुस्लिम युवकों ने इसलिए हत्या कर दी कि उसने नुपूर शर्मा का समर्थन किया था। कानून को हाथ में लेने का अधिकार हमारे देश में किसी को नहीं है और न ही सजा देने का हक है, तो फिर क्यों धर्म की आड़ लेकर इंसानियत की हत्या की जाती है।
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