स्वहित को त्यागना होगा...
आंगनवाड़ियों के हालात कभी नहीं सुधरे
जवाबदेही @ इंदौर
मध्यप्रदेश चमत्कारों वाला प्रदेश हैं! यहां कब क्या हो जाए कुछ कह नहीं सकते। एक चमत्कारिक योजना के तहत आंगनवाड़ियां खिलखिलाएं और नन्हें-मुन्नों के चेहते पर खुशी देने की योजना पर काम किया गया, क्योंकि कई सालों से प्रदेशभर के अफसरों की फौज कुपोषण मिटाने के लिए प्रयासरत है, लेकिन बच्चों को कुपोषण दूर ही नहीं होता..., कई योजनाएं आंगवाड़ियों को लेकर बनाई गई, लेकिन सब बेकार जा रही है। जानकारों का मानना हैै कि हमारे प्रदेश में सबसे ज्यादा दिक्कत आंगनवाड़ियों में आ रही है...ये भी एक चमत्कार ही है, क्योंकि सामाजिक जागरुकता और आम लोगों द्वारा मदद नहीं करने के कारण ऐसा हो रहा है..., ऐसा माना जाता है। अब बच्चों का कुपोषण दूर करने के लिए पोषण मटका कार्यक्रम शुरू किया था, जिसके बारे में बताया जा रहा है कि वह सफल नहीं हो पाया।
कारणों की हम बात नहीं करते, कि क्यों सफल नहीं हो पाया। वहीं, आंगनवाड़ियों की जर्जर होती हालत किसी से छुपी हुई नहीं है और आंगनवाड़ियों की दरिद्रता दूर करने और बच्चों के चेहरे पर खुशी लाने के लिए एक चमत्कारिक योजना, आइडिया पर काम किया गया..., मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ठेला लेकर निकल पड़े भोपाल, इंदौर में तो ट्रक भर-भरकर खिलौने, टीवी और न जाने क्या दान-दाताओं ने दे दिए...एक चमत्कार ही हुआ कि दो-तीन घंटों में जिसकी कल्पना नहीं की थी, वह हो गया।
एक ही गली में मिला इतना माल....
इंदौर में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जब लोधीपुरा की गली नंबर एक में आंगनवाड़ी गोद ले अभियान के तहत ठेला लेकर निकले तो उनके आश्चर्य का भी ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि जनता ने हाथ खुले कर दिए और खिलौने तो छोटी-मोटी वस्तु हैं, बड़े उपहार भेंट किए, ठेलाभर कर एलसीडी दान में देे दी (चमत्कार)!, इसके अलावा इंदौरी कहां मानने वाले थे, दान तो खुले दिल से करते हैं तो साढ़े आठ करोड़ रुपए के चेक भी प्रशासन के खाते में जमा करा दिए। कुछ बच्चों ने तो अपनी गुल्लक भी दान में दे दी। उस दौरान माहौल तो ऐसा बना कि ऐसा माहौल तो कोई चमत्कार ही कर सकता है। ऐसा लग रहा था मानो कोई उत्सव हो, लोग स्टॉल लगाकर, जिसमें कई तरह के खिलौने सजाकर रखे थे....और महिलाएं तो सजधज कर इस अभियान में काफी उत्सुक रहीं और मुख्यमंत्री कि इस क्षेत्र में पहुंचते ही मानो चमत्कार हुआ और कृपा बरसने लगी... मुख्यमंत्री ने भी लोगों का भरे दिल धन्यवाद दिया और कहा भी इंदौरियों का दिल काफी बड़ा है, जो आंगनवाड़ी और वहां आने वाले बच्चों के लिए बहुत कुछ सोचते हैं...।
इंदौर में ही एक गली में मिले थे आठ करोड़ रुपए के चेक
आठ करोड़ के चेक का हिसाब कौन देगा?
असल कहानी तो ये है कि आंगनवाड़ियों की हालत ठीक नहीं है, ढाई साल पहले पोषण मटका अभियान शुरू किया गया था, लेकिन इस अभियान की हालत यह है कि अधिकांश आंगनवाड़ियों में रस्म अदायगी इस योजना को लेकर की जा रही है। कारण यह बताया जा रहा है कि लोगों से दान में पोषण वाली सामग्री नहीं मिलना है? ये क्या बात हुई भला..., जब प्रदेेश के दो ही शहरों से करोड़ों रुपए के चेक मिले थे, तो उसकी रकम कहां गई...? मई महीने में ही दो से तीन दिन के भितर जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नेे खुद ठेला लेकर घूमे तो लोगों ने झोली भर दी थी..., फिर आंगनबाड़ियों को पोषण आहार के लिए लोगों के दान का इंतजार क्यों?
पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए
सरकार जब जनता से सार्वजनिक रूप से आंगनवाड़ियों के लिए मदद मांग रही है और जनता भी करोड़ों रुपए दे रही है तो इन रुपयों को कहां खर्च किया गया है, इसकी ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से की जाना चाहिए..., ताकि लोगों को पता लग सके कि उनके रुपयों का आखिर हुआ क्या?
सवाल?
आखिर क्या वजह है कि सरकार के करीब 20 साल के शासन के बाद भी आंगनवाड़ियों की हालत सुधर नहीं रही। मध्य प्रदेश के महिला बाल विकास विभाग के आंकड़े चौंकाने वाले हैं.
मार्च 2022 तक के आंकड़े
आंगनवाड़ियों की संख्या 97135
ऐसी आंगनवाड़ी जिसमें शौचालय नहीं है 32153
ऐसी आंगनवाड़ी जिसमें पीने का पानी उपलब्ध नहीं है 16626
ऐसी आंगनवाड़ी जिसमें शिक्षण सामग्री नहीं है 12705
ऐसी आंगनवाड़ी जिसमें बाउंड्रीवॉल नहीं है 60211
ऐसी आंगनवाड़ी जिसके पास खुद का भवन नहीं है 25917
ऐसी आंगनवाड़ी जिसमें चिकित्सा किट नहीं है 51464
(मध्य प्रदेश महिला बाल विकास विभाग की वेबसाइट के आधिकारिक आंकड़े)
ये बात भी किसी चमत्कार से कम नहीं
करीब ढाई साल पहले शुरू हुए इस अभियान की हालत यह है कि अधिकांश आंगनवाड़ियों में इसकी रस्म दायगी की जा रही है। इसकी वजह है लोगों से दान में पोषण वाली सामग्री का न मिलना। इस मामले में आंगनबाड़ी केन्द्र की कार्यकर्ता से लेकर सहायिका तक परेशान है। दरअसल इन पर काम को बोझ तो पहले से ही रहता है उसके बाद बीच-बीच में अन्य काम का बोझ भी डाल दिया जाता है, जिसकी वजह से वे अपना मूल काम करने का वक्त ही नहीं निकाल पाती हैं।

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