संपादकीय

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर परिसर में सोमवार को भगदड़ जैसे हालात बनना केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि आने वाले समय के लिए बड़ी चेतावनी है। 
नाग पंचमी और सावन सोमवार के अवसर पर उमड़ी भारी भीड़ के बीच करंट फैलने की अफवाह ने ऐसा डर पैदा किया कि लोग एक-दूसरे पर गिर पड़े। करीब 13 श्रद्धालुओं के घायल होने की सूचना सामने आई है। 

इसी दिन बिहार के लखीसराय स्थित अशोकधाम मंदिर में भी भीड़ के बीच भगदड़ की घटना में सात श्रद्धालुओं की मौत और कई लोगों के घायल होने की खबर सामने आई। 
वहां भी अफवाह और अचानक बढ़ी भीड़ ने हालात को भयावह बना दिया।

दो घटनाएं, एक ही सवाल? आखिर हम मंदिरों में बढ़ती भीड़ से सबक कब लेंगे?
धार्मिक आस्था बढ़ रही है। बड़े मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। 
लेकिन भीड़ के अनुपात में मंदिर परिसरों, पहुंच मार्गों, पार्किंग, बैरिकेडिंग, निकासी मार्गों और आपातकालीन व्यवस्थाओं का विस्तार उसी गति से नहीं हो रहा। 

सबसे बड़ी समस्या यह है कि प्रशासन अक्सर भीड़ बढ़ने के बाद सक्रिय होता है, जबकि भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था पहले से तैयार होनी चाहिए। 
उज्जैन के लिए यह सवाल और भी गंभीर है, क्योंकि वर्ष 2028 में सिंहस्थ होना है। 

सरकार सिंहस्थ की तैयारियों में जुटी है और भीड़ प्रबंधन, सड़क, पार्किंग तथा यातायात व्यवस्था को लेकर योजनाएं भी बनाई जा रही हैं। 
पुलिस स्तर पर भीड़ नियंत्रण और यातायात प्रबंधन के लिए प्रशिक्षण शुरू हो चुका है। 
लेकिन योजनाएं कागज से जमीन पर कितनी उतरती हैं, इसकी परीक्षा आज ही हो रही है। 

आज यदि किसी बड़े पर्व पर लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने से उज्जैन में दबाव बढ़ रहा है, तो 2028 में करोड़ों श्रद्धालुओं की संभावित आमद के समय क्या होगा? सिंहस्थ के लिए 40 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के आने का अनुमान तक सामने आ चुका है। 
ऐसे में केवल मंदिर परिसर की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। उज्जैन से जुड़े हर मार्ग, हर चौराहे, हर पार्किंग स्थल और आसपास के शहरों तक की यातायात व्यवस्था को एक ही सिस्टम का हिस्सा बनाना होगा।

इसका असर इंदौर पर भी पड़ेगा। उज्जैन जाने वाले श्रद्धालुओं का बड़ा दबाव इंदौर की सड़कों और आसपास के मार्गों पर आएगा। 
आज ही त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के समय इंदौर-उज्जैन मार्ग पर वाहनों का दबाव बढ़ता है। 

यदि समय रहते वैकल्पिक मार्ग, पार्किंग, शटल बस, ट्रैफिक डायवर्जन और रियल टाइम ट्रैफिक मॉनिटरिंग की व्यवस्था नहीं की गई तो सिंहस्थ के दौरान समस्या केवल उज्जैन तक सीमित नहीं रहेगी।
 दूसरी ओर इंदौर-खंडवा मार्ग और ओंकारेश्वर जाने वाले रास्तों की स्थिति भी चिंता पैदा करती है। 

बड़ी संख्या में श्रद्धालु ओंकारेश्वर पहुंच रहे हैं, लेकिन निर्माणाधीन कार्यों और संकरे मार्गों के कारण लोगों को घंटों जाम में फंसना पड़ रहा है। 
भेरूघाट से शारदा ढाबे और घाट के नीचे तक वाहनों की लंबी कतार लगना बताता है कि धार्मिक पर्यटन का दबाव हमारी सड़क व्यवस्था से कहीं आगे निकल चुका है। 

निर्माण कार्य जरूरी हैं, लेकिन सवाल उनकी गति और यातायात प्रबंधन का है। 
संकरी सर्विस रोड, गड्ढे, निर्माणाधीन पुल और उसके बीच वाहनों की बढ़ती संख्या, यह संयोजन किसी भी समय बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है। 

कांवड़ यात्रियों के वाहनों का सड़क पर रुकना, डीजे बजाना, सेल्फी लेना या रास्ते में समूह बनाकर खड़े होना और नाचना यदि यातायात को प्रभावित करता है तो प्रशासन को संवेदनशीलता के साथ लेकिन सख्ती से व्यवस्था संभालनी होगी। 

यह भी चिंता की बात है कि कई जगह पुलिस के सीमित संसाधनों के बीच स्थानीय नागरिक स्वयं यातायात संभालते नजर आते हैं। 
यह नागरिक सहयोग अच्छी बात है, लेकिन कानून-व्यवस्था और यातायात प्रबंधन की जिम्मेदारी आखिरकार प्रशासन की ही है। 
सिंहस्थ 2028 को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्राउड मैनेजमेंट की सबसे बड़ी परीक्षा मानना होगा। 

हर संभावित आपात स्थिति के लिए पहले से अभ्यास होना चाहिए। 
अफवाह फैलने पर भीड़ किस दिशा में जाएगी, आपातकालीन निकास कहां होगा, एंबुलेंस किस रास्ते से पहुंचेगी, अचानक भीड़ बढ़ने पर प्रवेश कहां रोका जाएगा और श्रद्धालुओं को किस वैकल्पिक मार्ग से निकाला जाएगा—इन सभी सवालों के जवाब अभी तैयार होने चाहिए। 

उज्जैन की आज की छोटी-सी भगदड़ जैसी स्थिति को इसलिए गंभीर चेतावनी मानना होगा। 
बिहार की घटना ने बता दिया है कि अफवाह कुछ ही सेकंड में हजारों लोगों की भीड़ को जानलेवा बना सकती है।
सिंहस्थ के लिए समय अभी है, लेकिन तैयारी का समय तेजी से कम हो रहा है। 

सड़कें समय पर सुधरें, निर्माण कार्य निर्धारित समय से पहले पूरे हों, पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था हो, यातायात प्रबंधन आधुनिक तकनीक से हो, पैदल यात्रियों के लिए अलग सुरक्षित मार्ग हों और भीड़ के प्रवेश-निकास का वैज्ञानिक प्रबंधन हो- इन पर अभी से काम करना होगा। 
भगवान के दर्शन के लिए आने वाला श्रद्धालु सुरक्षित घर लौटे, इससे बड़ी कोई व्यवस्था नहीं हो सकती। 

सिंहस्थ की सफलता लाखों-करोड़ों लोगों के आने में नहीं, बल्कि इतनी बड़ी भीड़ को बिना किसी हादसे के सुरक्षित संभाल लेने में होगी। 
उज्जैन की आज की घटना को चेतावनी समझकर यदि अभी नहीं जागे, तो 2028 में समय हाथ से निकल चुका होगा।

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