संपादकीय
इंदौर ट्रैफिक पुलिस का जनवरी से मई 2026 तक का विश्लेषण एक चेतावनी है, जिसे केवल आंकड़ों की तरह पढ़कर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी। रिपोर्ट बताती है कि रात 9 बजे से 12 बजे के बीच सबसे अधिक सड़क हादसे हुए और इन्हीं तीन घंटों में सबसे ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई। सवाल यह है कि आखिर हर साल सड़क हादसों के आंकड़े क्यों बढ़ते हैं, लेकिन हमारी आदतें क्यों नहीं बदलतीं?
सड़क हादसे कभी सिर्फ दुर्घटना नहीं होते, बल्कि अधिकांश मामलों में वे लापरवाही का परिणाम होते हैं। तेज गति, रेड सिग्नल तोड़ना, हेलमेट नहीं पहनना, सीट बेल्ट नहीं लगाना और ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करना ऐसी गलतियां हैं, जिनकी कीमत किसी की जान देकर चुकानी पड़ती है। जनवरी से मई के बीच 107 लोगों की मौत हो जाना केवल एक संख्या नहीं, बल्कि 107 परिवारों की खुशियों का हमेशा के लिए खत्म हो जाना है।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इन हादसों में बड़ी संख्या उन युवाओं की है, जिनकी उम्र 25 से 35 वर्ष के बीच थी। यही वह उम्र होती है जब कोई अपने माता-पिता का सहारा बनता है, अपने बच्चों का भविष्य संवारने में जुटा होता है और परिवार की सबसे बड़ी जिम्मेदारियां निभा रहा होता है। लेकिन कुछ मिनटों की जल्दबाजी, थोड़ी-सी लापरवाही या स्टाइल दिखाने की मानसिकता पूरे परिवार का भविष्य उजाड़ देती है। जिस घर का कमाने वाला चला जाता है, वहां सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, पूरे परिवार की जिंदगी बदल जाती है।
यह समझना होगा कि हेलमेट पुलिस से बचने के लिए नहीं, सिर बचाने के लिए है। सीट बेल्ट चालान से बचने के लिए नहीं, जिंदगी बचाने के लिए है। तेज रफ्तार बहादुरी का प्रमाण नहीं, बल्कि गैर-जिम्मेदारी की पहचान है। यदि किसी को लगता है कि वह सड़क पर नियम तोड़कर केवल अपनी जान जोखिम में डाल रहा है, तो वह गलत है। उसकी एक गलती किसी निर्दोष राहगीर, दूसरे वाहन चालक या पूरे परिवार को भी बर्बाद कर सकती है। लेकिन इस पूरी तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर है।
यदि नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे नियमों का पालन करें, तो स्थानीय सरकार और प्रशासन की भी जिम्मेदारी है कि वे सुरक्षित सड़कें उपलब्ध कराएं। दुर्भाग्य यह है कि हर साल बारिश शुरू होते ही इंदौर की कई सड़कें गड्ढों में बदल जाती हैं। बारिश से पहले जिन सड़कों का पैचवर्क होना चाहिए था, वह समय पर नहीं हुआ। आज अनेक स्थानों पर बारिश का पानी भर जाने से गड्ढे दिखाई नहीं देते और सबसे ज्यादा दोपहिया वाहन चालक हादसों का शिकार हो रहे हैं।
यह सवाल नगर निगम से पूछा जाना चाहिए कि आखिर सड़कों की मरम्मत हर साल मानसून आने के बाद ही क्यों याद आती है? क्या सड़कों का रखरखाव केवल मौसम देखकर किया जाएगा? यदि पूरे वर्ष नियमित निरीक्षण, गुणवत्तापूर्ण मरम्मत और समय पर पैचवर्क हो, तो अनेक हादसों को रोका जा सकता है। सड़क पर बना हर गड्ढा केवल इंजीनियरिंग की खामी नहीं, बल्कि किसी की जान के लिए खतरा है।
नेशनल हाईवे पर लगातार हो रहे हादसे भी बताते हैं कि केवल चालान काटना पर्याप्त नहीं है। जहां दुर्घटनाएं बार-बार हो रही हैं, वहां सड़क इंजीनियरिंग, प्रकाश व्यवस्था, संकेतक, रिफ्लेक्टर, स्पीड कंट्रोल और आपातकालीन सुरक्षा उपायों की भी गंभीर समीक्षा होनी चाहिए। सड़क सुरक्षा केवल पुलिस का विषय नहीं, बल्कि कई विभागों की साझा जिम्मेदारी है।
आज जरूरत जवाबदेही तय करने की है। नागरिक अपनी जिम्मेदारी निभाएं, हेलमेट पहनें, सीट बेल्ट लगाएं, गति सीमा का पालन करें और नशे की हालत में वाहन चलाने से बचें। दूसरी ओर नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और संबंधित एजेंसियां सुरक्षित सड़कें, बेहतर जल निकासी, समय पर पैचवर्क और प्रभावी यातायात प्रबंधन सुनिश्चित करें। हर वर्ष सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने, जागरूकता रैली निकालने और पोस्टर लगाने से हालात नहीं बदलेंगे।
बदलाव तब आएगा, जब नियम तोड़ने वाला नागरिक यह समझे कि वह अपने परिवार को खतरे में डाल रहा है और प्रशासन यह माने कि टूटी सड़कें और जलभराव भी उतने ही घातक हैं जितनी तेज रफ्तार। सड़क पर निकलते समय यह याद रखना चाहिए कि घर से निकला हर व्यक्ति किसी का बेटा, बेटी, पिता, मां, भाई या बहन है। इसलिए सड़क पर सिर्फ वाहन नहीं चलाइए, जिम्मेदारी भी निभाइए। क्योंकि एक छोटी-सी लापरवाही किसी परिवार की पूरी जिंदगी को अंधेरे में धकेल सकती है।


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