सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हाईकोर्ट समेत ओडिशा की विभिन्न अदालतों द्वारा पारित उन आदेशों पर कड़ी नाराजगी जताई है, जिनमें आरोपियों को जमानत देने के एवज में ‘पुलिस स्टेशनों की सफाई’ करने की शर्त रखी गई थी। इन आरोपियों में मुख्य रूप से दलित और आदिवासी समुदाय के लोग शामिल बताए गए हैं। शीर्ष अदालत ने ऐसे सभी आदेश रद्द कर दिए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इन शर्तों को मानवाधिकारों का उल्लंघन और व्यक्ति की गरिमा पर सीधा प्रहार बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया था।
हाल ही में आई रिपोर्टों में सामने आया था कि ओडिशा की कई अदालतें, जिनमें ओडिशा हाईकोर्ट भी शामिल है, जमानत देते समय असामान्य शर्तें लगा रही थीं। पिछले छह महीनों में लगभग 50 ऐसे आदेश पारित किए जाने की जानकारी सामने आई। इनमें से कई मामले उन लोगों से जुड़े बताए गए हैं, जो खनन-विरोधी प्रदर्शनों में शामिल थे। कुछ मामलों में आरोपियों को जमानत के लिए दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ करने जैसी शर्तें लगाई गई थीं।
पीठ ने इस स्थिति पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए न्यायिक रवैये पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि इस तरह के आदेश समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों के प्रति पूर्वाग्रह को दर्शाते हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को जमानत देते समय ऐसी शर्तें सामान्यतः नहीं लगाई जातीं, जिससे समानता के सिद्धांत पर सवाल खड़े होते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे आदेश न्यायपालिका की छवि को प्रभावित करते हैं और संविधान में निहित ‘समानता’ के सिद्धांत के विपरीत हैं। उन्होंने जोर दिया कि न्यायपालिका से नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की अपेक्षा की जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए—
प्रभावित आरोपियों को ओडिशा हाईकोर्ट में जाकर शर्तें हटवाने की अनुमति दी गई।
हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह इन शर्तों के स्थान पर कोई अन्य असामान्य शर्त न लगाए और आरोपियों की जमानत जारी रहे।
देशभर के न्यायाधीशों के लिए संदेश
पीठ ने देशभर की न्यायपालिका को निर्देश दिया कि भविष्य में किसी भी प्रकार की जातिगत या भेदभावपूर्ण शर्तें न लगाई जाएं, जिससे सामाजिक असमानता या तनाव बढ़े।
संक्षेप में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का दायित्व नागरिकों के मौलिक अधिकारों और गरिमा की रक्षा करना है।

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