मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य डिंडौरी जिले में जल संरक्षण को लेकर एक अनोखी पहल देखने को मिल रही है। सीमित संसाधनों के बावजूद यहां के लोगों ने पानी बचाने को केवल सरकारी अभियान नहीं, बल्कि जन आंदोलन का रूप दे दिया है। गांव-गांव में लोगों की भागीदारी से जल संरचनाओं का निर्माण हुआ और अब यह जिला पूरे प्रदेश के लिए मिसाल बनता जा रहा है।

जिले में अब तक करीब तीन लाख जल संरचनाएं तैयार की जा चुकी हैं। इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य वर्षा जल का संरक्षण कर भूजल स्तर बढ़ाना और आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी सुरक्षित करना है। प्रशासन और ग्रामीणों के संयुक्त प्रयासों के कारण डिंडौरी ने जल संरक्षण अभियान में प्रदेश में पहला और देश में दूसरा स्थान हासिल किया है।

जल संरक्षण को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रशासन ने कई रचनात्मक अभियान चलाए। गांवों में जल चौपाल आयोजित की गईं, नुक्कड़ नाटकों और रैलियों के माध्यम से लोगों को पानी की अहमियत समझाई गई। इन गतिविधियों का असर यह हुआ कि ग्रामीणों ने पानी बचाने की जिम्मेदारी खुद उठाई और अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाई।

जिले के शासकीय भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाए गए हैं। कई परिसरों में सोकपिट बनाए गए ताकि बारिश का पानी जमीन में समा सके। स्कूलों और छात्रावासों में किचन गार्डन तैयार किए गए, जहां रसोई और स्नानागार से निकलने वाले पानी का दोबारा उपयोग पौधों की सिंचाई में किया जा रहा है।

डिंडौरी में पानी बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर कई नवाचार भी किए गए। जहां पाइपलाइन की सुविधा नहीं थी, वहां लोगों ने पुराने घड़ों और प्लास्टिक की बोतलों का उपयोग कर टपक सिंचाई व्यवस्था विकसित की। इससे कम पानी में पौधों तक नियमित सिंचाई संभव हो सकी।

‘एक बगिया मां के नाम’ योजना के तहत जिले में हजारों फलदार पौधे लगाए गए हैं। स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने इन पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी संभाली और कम पानी में सिंचाई के लिए घरेलू संसाधनों से ड्रिप इरिगेशन मॉडल तैयार किए। इससे पौधों के संरक्षण के साथ जल बचत को भी बढ़ावा मिला।

डिंडौरी का यह मॉडल दिखाता है कि यदि प्रशासन और आम लोग मिलकर काम करें तो सीमित संसाधनों में भी बड़े बदलाव संभव हैं। जल संरक्षण की यह पहल अब दूसरे जिलों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।

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