आरटीओ की दिखावे की जांच का ही असर है कि मध्यप्रदेश में डबल डेकर बसें दौड़ रही है। नियमों के विपरीत ढांचों में तब्दील इन बसों की वजह से लोगों की जान जा रही है, लेकिन सिस्टम है की पैसे लेकर अपना मुंह बद कर लेता है। जवाबदेही सिस्टम को इस समाचार के माध्यम से आंखें खोलने के लिए कह रहा है कि जागो, कब तक पैसों के लालच के चलते लोगों की जिंदगी से खेलोगे? ईश्वर न करे आपके परिवार का कोई सदस्य ऐसे हादसों का शिकार हो जाएगा, क्या तब पूरे प्रदेश में कार्रवाई करोगे। अधिकारी जिला प्रशासन के साथ पहुंचते हैं, कुछ हजारों का चालान बनाकर चले आते हैं। बस वालों को हजारों रुपए के चालान से कोई फर्क नहीं पड़ता, जितने का चालान आरटीओ वसूलते है, उतने तो वह किसी भी शहर-गांव के एक फेरे में वसूल लेता है और हमेशा की तरह लापरवारी पूर्वक ऐसी बसें मौत बनकर दौड़ती रहती है? बस संचालकों को भी पता है कि चालानी कार्रवाई तो दिखाने के लिए अफसरों को करनी ही पड़ती है, क्योंकि ऊपरी सांठ-गांठ की वजह से ही हजारों बसें अनफिट होकर प्रदेशभर में दौड़ रही है।
इसी कड़ी में मध्यप्रदेश के शाजापुर से एक दुखद घटना सामने आई है, जिसमें एक चार साल के मासूम बच्चे की जलकर मौत हो गई। यात्रियों ने वायर जलने की गंध की शिकायत भी की, लेकिन बस चालक ने कोई ध्यान नहीं दिया...।
दरअसल, शाजापुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे पर शुक्रवार रात दिल दहला देने वाला हादसा हो गया। इंदौर से ग्वालियर जा रही इन्टरसिटी एक्सप्रेस एयरकंडीशन बस (MP-07 ZL 9090) में शॉर्ट सर्किट के कारण भीषण आग लग गई। हादसे में शिवपुरी निवासी अभिषेक जैन का 4 वर्षीय मासूम बेटा अनय बस के भीतर ही जिंदा जल गया। बस में सवार यात्रियों और चश्मदीदों के मुताबिक, सफर के दौरान बस में से लगातार वायरिंग जलने की बदबू आ रही थी। महिला यात्री मालती शर्मा सहित अन्य लोगों ने इसकी शिकायत बस चालक से भी की थी, लेकिन उसने चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया। रात करीब 12 बजे बस नेशनल हाईवे पर स्थित होटल जैन पथ पर रुकी। उस समय कुछ यात्री बस में बैठे हुए थे, जबकि कई यात्री नीचे उतरकर नाश्ता करने चले गए थे। करीब 5 मिनट बाद बस में आग लग गई। भगदड़ के बीच चार वर्षीय मासूम भीड़ में फंस गया। वह बाहर नहीं निकल सका। परिजन जब तक उसे बचाने पहुंचे, तब तक आग विकराल रूप ले चुकी थी। हालात ऐसे थे कि बच्चे को बचाने की कोशिश करने वाला भी आग की चपेट में आ सकता था।
न इमरजेंसी गेट था, न अग्निशमन यंत्र
हादसे के वक्त बस में 50 से अधिक यात्री सवार थे। आबस में न तो कोई आपातकालीन (इमरजेंसी) खिड़की थी और न ही आग बुझाने के लिए कोई अग्निशमन यंत्र मौजूद था। यहां तक कि बस का मुख्य दरवाजा भी नहीं खुल रहा था। ऐसे में स्थानीय लोगों की मदद से कांच और खिड़कियां तोड़कर यात्रियों को बाहर निकाला गया। इस अफरा तफरी के बीच ड्राइवर और क्लीनर मौके से फरार हो गए। आग इतनी भीषण थी कि अधिकांश यात्रियों का सामान जलकर खाक हो गया। आग पर काबू पाने के बाद भी मासूम अन्य का कहीं पता नहीं चल रहा था। बच्चे को ढूंढने के लिए प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ी। मौके पर जेसीबी मशीन बुलाई गई, जिसके पंजे से बस के गेट और खिड़कियां तोड़ी गईं। इसके बाद पीछे का रास्ता बनाने के लिए वेल्डिंग मिस्त्री को बुलाकर गेट कटवाया गया और सीटें हटाई गईं। करीब दो घंटे के सर्च ऑपरेशन के बाद एक सीट के नीचे से मासूम का कंकाल बरामद हुआ।
काश बच्चे के पिता की इंसानियत
देख जाग जाए आपका जमीर
पिता ने कई की जान बचाई, लाखों के गहने सौंपे
इस दुखद घड़ी में भी मासूम के पिता अभिषेक जैन ने इंसानियत की एक अभूतपूर्व मिसाल पेश की। जिस वक्त वो बस के मलबे में रोते-बिलखते अपने बेटे को ढूंढ़ रहे थे, उन्हें बस के अंदर किसी यात्री के गिरे हुए लाखों रुपए के सोने के जेवर मिले। खुद का सब कुछ उजड़ जाने के बाद भी अभिषेक ने उन गहनों को तुरंत तराना टीआई रामचरण भदौरिया को सौंपा। इसके अलावा आग लगने के तुरंत बाद अभिषेक ने खुद की जान जोखिम में डालकर कई यात्रियों को भी सुरक्षित बाहर निकाला।
ऐसे हालात है सिस्टम के...?
पहली फायर ब्रिगेड आई, उसमें पानी ही नहीं था
अस्पताल में रोते-बिलखते हुए पिता अभिषेक जैन ने प्रशासन और फायर ब्रिगेड की बड़ी लापरवाही को उजागर किया। उन्होंने कहा- मैं अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ इंदौर से रात 10 बजे शिवपुरी के लिए निकला था। ड्राइवर को बदबू के बारे में बताया पर उसने नहीं सुना। आग लगने के बाद मैंने खुद फायर ब्रिगेड को फोन लगाया। आधे घंटे बाद जो गाड़ी आई, उसमें पानी ही नहीं था। उसके बाद दूसरी गाड़ियां आईं। यह प्रशासन लोगों की जान ले रहा है। मीडिया से मेरा अनुरोध है कि इसे आगे उठाएं, ताकि किसी और का भविष्य ऐसे न जले, मेरा तो भविष्य जल गया।
-जगजीतसिंह भाटिया
अब शुरू होगा जांच का खेल
हमेशा की तरह अब फिर जांच-जांच का खेल शुरू होगा..., कुछ दिन प्रदेशभर की बसों के इमरजेंसी गेट की जांच की जाएगी, चालानी कार्रवाई की जाएगी... और फिर वैसे ही हालात नजर आएंगे। कायदे से जिस भी ट्रैवल्स की बस है, उसके मालिक पर हत्या का केस दर्ज कर सीधे अंदर डाल देना चाहिए, इसके अलावा प्रदेशभर के ट्रैवल्स संचालकों की बसों मे खामी पाई जाती है तो सबको जेल में डाल दो...? देखो कैसे सिस्टम सुधरता है। आरटीओ के अफसरों को भी शर्म आनी चाहिए कि कब तक रिश्वत लेकर अपना घर भरकर दूसरों का उजाड़ते रहोगे?

Post a Comment