होलिका दहन की रात मथुरा जिले के फालैन गांव में एक बार फिर आस्था, साहस और परंपरा का अनोखा संगम देखने को मिला। धधकती होलिका, लाठी लेकर नारे लगाते लोग और आसमान छूती लपटें — माहौल ऐसा था कि दूर खड़े लोगों को भी आग की तपिश साफ महसूस हो रही थी।

करीब 25 फीट तक उठती लपटों के बीच सिर पर गमछा और गले में रुद्राक्ष की माला पहने संजू प. नाम का युवक आगे बढ़ा। उसने पहले अग्नि देव को प्रणाम किया और फिर अचानक तेज कदमों से जलती होलिका की ओर दौड़ पड़ा। कुछ ही सेकेंड में वह आग के बीच से पार निकल आया। वहां मौजूद हजारों श्रद्धालु यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए।

यह पूरी प्रक्रिया अचानक नहीं होती। परंपरा के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त, यानी सुबह लगभग 4 बजे, संजू प. ने प्रह्लाद कुंड में स्नान किया। इससे पहले निर्धारित लग्न में दीपक जलाकर जप किया गया। जब तक दीपक की लौ प्रज्वलित रही, मंत्रोच्चार चलता रहा। लौ शांत होने के बाद अग्नि प्रवेश का संकेत दिया गया।

संजू प. की बहन ने जलती होलिका के चारों ओर कलश से जल अर्पित किया। इसके बाद होलिका प्रज्वलित हुई और पूरा गांव ‘बांके बिहारी’ के जयकारों से गूंज उठा।

ग्रामीणों के अनुसार होलिका उपलों और लकड़ियों से तैयार की गई थी। इसकी ऊंचाई लगभग 20 फीट और चौड़ाई करीब 30 फीट थी। हालांकि लपटें 25 फीट तक उठती दिखाई दीं। आग की तपिश इतनी अधिक थी कि 10 फीट दूरी पर खड़ा रहना भी मुश्किल हो रहा था।

गांव के हर घर से उपले लाए जाते हैं। विशेष लकड़ी भी बाहर से मंगाई जाती है। इस आयोजन की तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो जाती है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार यह परंपरा करीब 5200 साल पुरानी मानी जाती है। यह कथा हिरण्यकश्यप, होलिका और भक्त प्रह्लाद की धार्मिक कहानी से जुड़ी है। मान्यता है कि होलिका ने प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का प्रयास किया था, लेकिन वह स्वयं भस्म हो गईं और प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। उसी स्मृति में यहां यह अनोखा अनुष्ठान किया जाता है।

बताया जाता है कि यह दूसरी बार है जब संजू प. ने अग्नि पार की है। इससे पहले उनके बड़े भाई मोनू प. इस परंपरा को निभाते रहे हैं।

आयोजकों के अनुसार इस बार देश-विदेश से करीब 50 हजार से अधिक श्रद्धालु पहुंचे। जैसे ही युवक आग से बाहर निकला, ‘भक्त प्रह्लाद’ और ‘बांके बिहारी’ के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा।

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