इंदौर के एक परिवार ने गहरे शोक के बीच भी मानवता का अद्भुत उदाहरण पेश करते हुए नेत्रदान कर चार जरूरतमंदों के जीवन में उजाला लाने का संकल्प निभाया। परिवार की दो पीढ़ियों (चाची और भतीजी) का 12 घंटे के भीतर अलग-अलग कारणों से निधन हो गया, लेकिन दुःख की इस घड़ी में भी परिवार ने परमार्थ का मार्ग चुना।
गोपालबाग क्षेत्र की 84 वर्षीय मीरा देवी लंबे समय से अस्वस्थ थीं। गुरुवार देर रात उनका निधन हो गया। परिवार इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि शुक्रवार को शिवधाम क्षेत्र में रहने वाली उनकी 35 वर्षीय भतीजी लता का हृदयाघात (कार्डियक अरेस्ट) से निधन हो गया। लता अविवाहित थीं।
दुखद परिस्थितियों के बावजूद परिवार ने दोनों की आंखें दान करने का निर्णय लिया। एक सामाजिक संस्था के स्वयंसेवकों ने समन्वय कर नेत्रदान की पूरी प्रक्रिया संपन्न करवाई।
परिवार के इस संवेदनशील निर्णय से चार दृष्टिबाधित मरीजों को दृष्टि मिलने की संभावना है, जिससे उनके जीवन का अंधकार दूर हो सकेगा।
आई बैंक विशेषज्ञों के अनुसार, नेत्रदान की गई आंखों में से लगभग 65 से 70 प्रतिशत कॉर्निया सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण में उपयोग की जा सकती हैं। नेत्रदान के बाद रक्त नमूने की जांच कर हेपेटाइटिस ए, बी, सी और एचआईवी जैसी बीमारियों की स्क्रीनिंग की जाती है। यदि किसी प्रकार की चिकित्सकीय या तकनीकी बाधा पाई जाती है, तो लगभग 30 प्रतिशत कॉर्निया उपयोग योग्य नहीं रह पातीं।
इंदौर में हर माह औसतन करीब 100 नेत्रदान होते हैं, जो जरूरतमंदों के लिए उम्मीद की किरण साबित हो रहे हैं। इस परिवार का यह निर्णय समाज के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है।

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