सहारनपुर के 70 वर्षीय राजेंद्र जी ने पशु-पक्षियों के प्रति ऐसा प्रेम दिखाया है, जिसने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई है। जहां इंसान अपना दर्द बयान कर सकता है, वहीं बेजुबान जानवर अपनी पीड़ा कह नहीं पाते। राजेंद्र जी कहते हैं कि उन्होंने इसी दर्द को महसूस किया और उसे अपना मिशन बना लिया।

आज उनके पास गाय, खरगोश, बिल्लियां, कबूतर, मछलियां, कुत्ते और मुर्गों सहित कई तरह के पशु-पक्षियों का बड़ा परिवार है। उन्हें यह प्रेरणा राजाजी नेशनल पार्क में घूमते समय मिली, जब उन्होंने देखा कि कई जीव संरक्षण के अभाव में अपनी जान गंवा देते हैं। तभी से उन्होंने ठान लिया कि जितना संभव हो सके, वे जीवों को बचाकर उनका पालन-पोषण करेंगे।

राजेंद्र जी पिछले 25 से 30 वर्षों से इस कार्य में जुटे हैं। उनके पास कुछ पशु-पक्षी 20-25 साल से भी अधिक समय से हैं। वे अपने परिवार के साथ पहले पशु-पक्षियों को अपने हाथों से भोजन कराते हैं, उसके बाद स्वयं खाना खाते हैं।

उनका मानना है कि पर्यावरण केवल पेड़-पौधों तक सीमित नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और समस्त जीव-जंतुओं का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कई ऐसी गायों को भी बचाया, जिन्हें कटान के लिए ले जाया जा रहा था। विदेशी नस्ल की मुर्गियां, खरगोश, देसी और पर्शियन बिल्लियां, अलग-अलग नस्ल के कबूतर और रंगीन मछलियां उनके संरक्षण में हैं। उनका कहना है कि इन जीवों की सेवा से उन्हें आत्मिक शांति और सच्ची खुशी मिलती है।

राजेंद्र जी ने अपने स्थान को एक तरह का मिनी जू बना दिया है, जो बच्चों और बड़ों के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुका है। यहां मोर की तरह पंख फैलाकर नाचने वाले कबूतर, सिर पर चोटी और पैरों में पंखों वाले दुर्लभ कबूतर, 18 वर्ष तक जीवित रहने वाले मुर्गे, चार-पांच फुट लंबी पूंछ वाला विशेष मुर्गा, टर्की, तीतर और जापानी बटेर भी हैं।

देसी सफेद खरगोश बच्चों के साथ खेलते हैं और हाथ से दाना खा लेते हैं। एक बड़े तालाब में लाल, सफेद, काली और अन्य रंगों की मछलियां तैरती नजर आती हैं, जिनकी लंबाई अब डेढ़ से दो फुट तक पहुंच चुकी है। यहां आने वाले लोग पशु-पक्षियों को दाना खिलाते हैं, फोटो-वीडियो बनाते हैं और आनंद का अनुभव करते हैं।

राजेंद्र जी का कहना है कि यदि किसी जीव की मृत्यु हो जाए तो उन्हें गहरा दुख होता है, क्योंकि वे उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानते हैं। उनका विश्वास है कि पशु-पक्षी भी इंसानों की तरह भावनाएं रखते हैं और उनकी देखभाल करना हमारा कर्तव्य है। ठंड के मौसम में वे रात में भी उठकर पशुओं की चिंता करते हैं।

उनके इस समर्पण की सराहना कई अधिकारी और समाजसेवी कर चुके हैं। उनकी यह पहल समाज को संदेश देती है कि यदि इंसान संवेदनशील हो जाए, तो बेजुबान जीवों की दुनिया भी सुरक्षित और खुशहाल बन सकती है।

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