महाराष्ट्र से दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने जा रहे 14 कार्यकर्ताओं को मध्य प्रदेश के इटारसी रेलवे स्टेशन पर गोवा एक्सप्रेस से उतार लिया गया। ये कार्यकर्ता मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और चुनाव से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शन करने दिल्ली जा रहे थे।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध ट्रेन से उतारकर एक निजी रिसॉर्ट में रखा। इस कार्रवाई के विरोध में कुछ कार्यकर्ताओं ने भूख हड़ताल भी शुरू कर दी थी। बाद में एक राजनीतिक दल के महासचिव ने दो छात्रों को जूस पिलाकर उनकी भूख हड़ताल समाप्त कराई।
शुक्रवार रात करीब 11 बजे सभी 14 कार्यकर्ताओं को एक निजी बस से पुणे के लिए रवाना किया गया। बस में चार पुलिसकर्मी भी मौजूद थे। रवाना होते समय कार्यकर्ताओं ने 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाए।
प्रदर्शनकारियों को जिस निजी रिसॉर्ट में रखा गया था, उसके तीन साझेदार होने की जानकारी सामने आई है। इनमें एक राजनीतिक नेता के बेटे, एक राजनीतिक कार्यकर्ता और एक अन्य व्यक्ति का नाम बताया जा रहा है। हालांकि, रिसॉर्ट की साझेदारी से जुड़े दस्तावेजों और संबंधित लोगों की भूमिका की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में दायर हुईं याचिकाएं
छात्र-छात्राओं को ट्रेन से उतारकर कथित तौर पर उनकी इच्छा के विरुद्ध रोके जाने का मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंच गया है। इस संबंध में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर की गई हैं। इनके जरिए संबंधित व्यक्तियों को अदालत के सामने पेश करने की मांग की गई है।
9 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने राज्य शासन को संबंधित व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि शासन संबंधित व्यक्ति की परिवार तक सुरक्षित वापसी की व्यवस्था कर सकता है।
मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महाराष्ट्र के पुणे से दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे छात्र-छात्राएं गोवा एक्सप्रेस से यात्रा कर रहे थे। आरोप है कि इटारसी स्टेशन पर उन्हें ट्रेन से उतारकर रोक लिया गया। प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध रोका गया। इसी कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं।
अब मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी, जिसमें अदालत संबंधित तथ्यों और राज्य शासन के पक्ष पर आगे विचार करेगी।

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