भारत में बच्चों और वयस्कों में मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2000 से 2022 के बीच स्कूल जाने वाले बच्चों और किशोरों में मोटापे की दर 2 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गई। यानी इस अवधि में इसमें करीब पांच गुना बढ़ोतरी दर्ज हुई है।

बढ़ते मोटापे और खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोगों के स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत ने केंद्र सरकार को जंक फूड के पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने के अपने आदेश को लागू करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि केंद्र सरकार इस दिशा में खुद कदम उठाती है तो बेहतर होगा, अन्यथा अदालत आगे आवश्यक निर्देश जारी करेगी। पीठ ने उन दलीलों को स्वीकार करने से इनकार किया, जिनमें अंतरराष्ट्रीय और विकसित देशों के मानकों के अनुरूप कदम उठाने में कठिनाई की बात कही गई थी।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि खाद्य सुरक्षा का मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार से जुड़ा है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या भारत को केवल इसलिए कम विकसित मानकों पर बने रहना चाहिए क्योंकि दूसरे देशों में अलग व्यवस्था है।

यह मामला गैर सरकारी संगठन '3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी' की ओर से दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों को कई साल बीत चुके हैं, लेकिन इस दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने कहा कि इस बीच स्थिति और गंभीर होती जा रही है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अधिक नमक, चीनी, संतृप्त वसा और कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों को स्वास्थ्य के लिए संभावित जोखिम वाला बताया। अदालत ने कहा कि लोगों को बेहतर और स्वस्थ विकल्प चुनने में मदद करने के लिए खाद्य उत्पादों पर पोषण संबंधी जानकारी साफ और स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराना जरूरी है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत में अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बाजार में 2009 से 2023 के बीच 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। इसी अवधि में देश में मोटापे की समस्या में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई है।

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