दुनिया में कई ऐसे जीव हैं, जिन्हें देखकर पहली नजर में यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि वे वास्तव में धरती के ही प्राणी हैं। ऐसा ही एक अनोखा कैटरपिलर कैबेज ट्री मॉथ का लार्वा है, जिसकी कांटेदार और विचित्र बनावट लोगों को अक्सर किसी एलियन जैसी दिखाई देती है। इसका शरीर चारों ओर से नुकीले कांटों से घिरा होता है, जिससे यह बेहद डरावना नजर आता है। हालांकि, इसकी असली खासियत यह है कि देखने में खतरनाक लगने वाला यह जीव छूने पर मखमल जैसा मुलायम महसूस होता है।
यह कैटरपिलर लगभग 70 मिलीमीटर लंबा होता है। इसका शरीर मोटा होता है और उस पर मुलायम लेकिन नुकीले दिखाई देने वाले कांटे होते हैं। इसका रंग भी अलग-अलग हो सकता है। कुछ में गहरे काले शरीर पर चमकीले सफेद कांटे दिखाई देते हैं, जबकि कुछ में लाल शरीर के साथ पीले कांटे होते हैं। यही रंग और बनावट इसे अन्य कैटरपिलरों से अलग पहचान दिलाते हैं और अधिकांश लोग इसे देखकर दूरी बना लेते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी डरावनी बनावट और चमकीले रंग किसी हमले के लिए नहीं, बल्कि आत्मरक्षा का प्राकृतिक तरीका हैं। इसके कांटे केवल देखने में तेज लगते हैं, लेकिन वास्तव में वे मुलायम और स्पंज जैसे होते हैं। इन्हें छूने से सामान्यतः दर्द नहीं होता। यही कारण है कि पक्षी और अन्य शिकारी इसे जहरीला समझकर हमला करने से बचते हैं।
इस कैटरपिलर से जुड़ा एक और रोचक तथ्य यह है कि ट्रॉपिकल अफ्रीका के कई क्षेत्रों में इसे भोजन के रूप में खाया जाता है। इसमें प्रोटीन, विटामिन और अन्य पोषक तत्व अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। स्थानीय लोग इसे जंगलों से एकत्र कर भूनकर या तलकर खाते हैं। कई स्थानों पर यह स्थानीय बाजारों में भी बिकता है, जिससे लोगों की आजीविका को भी सहारा मिलता है।
यह कैटरपिलर पेड़ों की पत्तियां तेजी से खाता है और जिस पेड़ पर पहुंचता है, उसकी काफी पत्तियां चट कर सकता है। हालांकि, इससे पेड़ को स्थायी नुकसान नहीं होता, क्योंकि कुछ समय बाद उस पर फिर से नई पत्तियां उग आती हैं। इस तरह यह प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का एक सामान्य हिस्सा बना रहता है।
विकास का अंतिम चरण पूरा होने पर यह कैटरपिलर पेड़ से नीचे उतरकर मिट्टी में चला जाता है। वहां कुछ सप्ताह बिताने के बाद इसका कायांतरण होता है और यह भूरे रंग के एक बड़े मॉथ के रूप में बाहर निकलता है। इसके पंखों पर प्राकृतिक रूप से आकर्षक डिजाइन बने होते हैं। वयस्क मॉथ बनने के बाद यह परागण सहित विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं में योगदान देकर प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाता है।

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