बड़ी देर से कुर्सी में धँसा आनंदराव गुमसुम विचारों में खोया हुआ था। पास ही पलंग पर बैठी पत्नी स्वेटर बुन रही थी। बीच-बीच में उसका ध्यान अपने उदास पति की ओर चला जाता था, तब स्वेटर के फंदे ग़लत पड़ जाने की वजह से उसे दुबारा नए सिरे से फंदे डालना पड़ते थे। सलाइयाँ और ऊन पलंग पर रख वह पति के पास पहुँची और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोली, “आपकी ख़ामोशी एवं उदासी ने बड़े देर से मुझे परेशान कर रखा है।”

रुखे स्वर में आनंदराव बोले, “मैं पहले से ही परेशान हूँ, क्यों डिस्टर्ब कर रही हो?”

“ऐसी कौन सी आफ़त आ गई है जो गहन चिंता में डूबे हुए हो?”

इस बार कुछ नरम लहजे में उन्होंने उत्तर दिया, “तुम नहीं समझ पाओगी, मेरी परेशानी।”

पत्नी सांत्वना भरे स्वर में बोली, “हम दोनों मिलकर परेशानी को हल कर सकते हैं। आप अपनी परेशानी का कारण तो बताओ।”

आनंदराव ने बड़े सहज भाव से उत्तर दिया, “दरअसल मैं सोच रहा था कि अगर... इस बार भी...” वाक्य पूरा होने से पहले ही उनकी पाँच वर्षीय पुत्री दौड़ती हुई आई और पापा से लिपटते हुए बोली, “पापा कल होली है और आप अब तक मेरे लिए रंग और पिचकारी नहीं लाए!”

“बिटिया आज शाम को तुम्हारे लिए बढ़िया आधुनिक पिचकारी और ढेर सारे रंग लाऊँगा।” उसके गाल थपथपाते हुए आनंदराव ने कहा।

यह सुनते ही वह ख़ुशी-ख़ुशी अपने कमरे में चली गई। पत्नी पति के अधूरे वाक्य में निहित उद्देश्य को समझ गई। अनजान बनते हुए उसने पूछा, “इस बार भी से आपका क्या तात्पर्य था?”

पति ने उसे उसे समझाया, “मैं यह कहना चाह रहा था कि इस बार भी अगर मकान के लोन की क़िस्त नहीं भरी तो बड़ी परेशानी होगी।”

पति का उत्तर सुन मुस्करा कर बोली, “क़िस्त के बारे में आप तनिक भी चिंता न करें, मैंने उसके लिए पैसे बचा के रखे है। वास्तविक चिंता से आप मुक्त हो जाएँ। इस बार वहीँ होगा जो आप चाहते है।”

पत्नी की बात सुन हैरत भरी नज़रों से वे उसे देखते रहे। पत्नी ने अपने फूले पेट

चमक जुगनूँ की :: 36


पर हाथ रखते हुए दीवार पर टाँगे कैलेंडर में दर्शाए एक स्वस्थ बालक के चित्र की और इशारा किया और लज्जा से नज़रें झुका लीं।

उपहार

राजेश मोहल्ले भर के लोगों के बिजली, पानी, टेलीफोन के बिल भरता और बाज़ार से सामान ला देता था। हर परिवार उसे सौ रुपये प्रतिमाह देता था, जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। सभी उसकी ईमानदारी एवं निष्ठा के प्रति आश्वस्त थे। एक दिन उदासी समेटे मेरे पास आया और बोला, “साहिब मेरा बच्चा सीरियस है। उसके उपचार के लिए मुझे पाँच सौ रुपये चाहिए। दो-तीन माह में आपको लौटा दूँगा।”

मैंने उसे पाँच सौ रुपये दे दिए। इसके बाद कई माह तक वह नहीं आया। उसके प्रति की गई दया के प्रति मुझे पछतावा हुआ और मेरे भीतर उसके प्रति क्रोध पलता रहा। आज मेरे बच्चे का जन्मदिन था। घर में काफ़ी चहल-पहल थी। कुछ मेहमान आ गए थे और कुछ आने वाले थे। बर्थडे केक काटने की तैयारी थी तभी राजेश ने घर में प्रवेश किया। वह धीरे-धीरे मेरे पास आया और हाथ में पकड़े लिफ़ाफ़े को मुझे थमाते हुए बोला, “बबलू के जन्मदिन पर बहुत-बहुत बधाई।”

इतने दिनों से राजेश के प्रति जो क्रोध मेरे भीतर पनप रहा था उसका इज़हार करता, इसके पहले ही वह चल दिया। बर्थडे केक काटा गया, बर्थडे गीत गाया गया। मेहमानों ने भोजन किया और अपने-अपने घर चले गए। सभी गिफ़्ट टेबल पर पड़े थे। राजेश द्वारा दिया गया लिफ़ाफ़ा मेरी जेब में था। मैंने लिफ़ाफ़ा खोला, उसमें 601 रुपये के नोट और एक छोटा-सा पत्र निकला। पत्र में लिखा था,

‘मैं अपने बच्चे को बचा नहीं पाया था इसलिए शहर छोड़ अपने भाई के पास दिल्ली चला गया था। वहाँ मुझे एक स्कूल में चपरासी की नौकरी मिल गई थी। शर्मिंदा हूँ कि जाते समय आपसे मिल नहीं पाया था। मुझे बबलू की जन्मदिन की तारीख़ याद थी इसीलिए आपसे मिलने के लिए मैंने यह शुभ दिन चुना। पाँच सौ रुपये उधार वाले और एक सौ एक रुपये बबलू के जन्मदिन पर उपहार के लिए स्वीकार करें।’

टेबल पर पड़े क़ीमती गिफ़्ट मुझे राजेश के उपहार के सम्मुख फीके लगे और मैंने उसके पत्र को दस्तावेज़ की तरह अलमारी में सहेजकर रख दिया।

उम्मीद की किरण

बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। धुंध छाई हुई थी और तीखी सर्द हवा चल रही थी। घर के भीतर सुखजीत कौर चिंतित एवं बेचैन थी। रात गहरा जाने पर भी उसका पुत्र अभी तक घर नहीं आया था। वह जानती थी कि ज़रूर शराब के अड्डे पर नशे में बेसुध पड़ा होगा। दीवानसिंह के बापू दिनभर खेत में कड़ी मज़दूरी कर थके-माँदे गहरी नींद सो रहे थे। उसने कंबल ओढ़ा, एक हाथ में लालटेन पकड़ी और दूसरे हाथ में लट्ठ। वह शराब के अड्डे पर पहुँची। ओटले पर बेसुध पड़ा था दीवानसिंह और पास खड़े उसके दोस्त उसकी ऐसी हालत पर हँस रहे थे। लालटेन ज़मीन पर रख सुखजीत ने हाथ में पकड़े लट्ठ को दीवानसिंह के दोस्तों की तरफ़ किया और बरस पड़ी, “शर्म नहीं आती, अपने दोस्त की ऐसी हालत पर हँस रहे हो। 

शेष अगले अंक में




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