ब्लॉक पैवर्स वाली जगह कच्ची छोड़ना होगी और कच्ची जगहों पर रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाना होगा। ताकि बारिश का पानी नालों में ना बहकर सीधे जमीन में उतर जाए। पूरे इंदौर में इस तरह की कवायद करना होगी। गली-मोहल्ला, कॉलोनी में भी ब्लॉक पैवर्स वाला सिस्टम खत्म करना होगा। आज हर कॉलोनी में पक्की सड़क मुख्य दरवाजों तक हो गई है....। लोग बारिश में कीचड़ से और अन्य मौसम मे धूल से बचना चाहते हैं, लेकिन जब गर्मी आती है और पेयजल संकट होता है तो तब पता चलता है पानी का मोल...? शहर में जितनी भी कॉलोनियां, मोहल्ले हैं, उन सब लोगों को जनजागरुकता अभियान खुद के बल पर शुरू करना होगा.... और हर गली में रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना होगा। हर छत का पानी बहकर नाले में जा रहा है और जल स्तर कम होता जा रहा है। नगर निगम के भरोसे जनता रही तो प्यासी ही रहेगी। सिर्फ गार्डन तक वाटर रिचार्ज सिस्टम सीमित ना रहे, बल्कि गली-मोहल्लों, सड़कों, सार्वजनिक स्थानों पर भी इसे बनाया जाए, ताकि आने वाले सालों में इंदौर में पानी की कमी ना हो।
देश में लगातार स्वच्छता का सिरमौर बन चुका इंदौर आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे सफाई से आगे बढ़कर जल प्रबंधन की दिशा में भी राष्ट्रीय मॉडल बनने की जरूरत है। हर साल मानसून आते ही शहर की चमचमाती सड़कें पानी में डूब जाती हैं, कई इलाकों में घंटों जलभराव रहता है, सड़कें उखड़ जाती हैं, गड्ढों में वाहन दुर्घटनाएं होती हैं और करोड़ों लीटर बारिश का पानी नालों और सीवर के जरिए शहर से बाहर बह जाता है। दूसरी ओर गर्मियों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और कई क्षेत्रों में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। सवाल यह है कि जब प्रकृति हर वर्ष मुफ्त में इतना पानी दे रही है तो उसे सहेजने की ठोस व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा रही?
यदि इंदौर के लगभग चार से पांच लाख मकानों, अपार्टमेंट्स, व्यावसायिक भवनों, संस्थानों और सरकारी परिसरों में यह अनिवार्य कर दिया जाए कि उनकी छत पर गिरने वाली वर्षा की हर बूंद रिचार्ज पिट, रिचार्ज शाफ्ट, बोरवेल रिचार्ज या अन्य वैज्ञानिक रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली के माध्यम से उसी परिसर में जमीन के भीतर पहुंचाई जाएगी तथा छत का पानी सीधे ड्रेनेज, नालों या सीवर में छोड़ने पर रोक लगाई जाएगी, तो आने वाले कुछ वर्षों में शहर की तस्वीर काफी हद तक बदल सकती है। इससे न केवल भूजल भंडार समृद्ध होगा बल्कि बारिश के दौरान सड़कों पर बहने वाले पानी की मात्रा भी कम होगी और जल निकासी व्यवस्था पर दबाव घटेगा।
हालांकि यह दावा करना उचित नहीं होगा कि इससे जलभराव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। जलजमाव सड़क की ढाल, नालों की क्षमता, अत्यधिक वर्षा, अतिक्रमण, ठोस कचरे के कारण अवरुद्ध ड्रेनेज और रखरखाव जैसी अनेक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। लेकिन यह निश्चित है कि यदि शहर स्तर पर व्यापक रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग लागू होती है तो जलभराव की समस्या में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है और भूजल पुनर्भरण में बड़ा सुधार संभव है।
बारिश का पानी बन रहा बोझ, जबकि वही सबसे बड़ी पूंजी है
हर मानसून में शहर पर लाखों घनमीटर पानी बरसता है। इसका बड़ा हिस्सा भवनों की छतों से पाइपों के माध्यम से सीधे सड़क पर आता है और फिर नालों में बहकर शहर से बाहर निकल जाता है। यही पानी यदि जमीन के भीतर पहुंचाया जाए तो वह प्राकृतिक जलभंडार को भर सकता है। भूजल स्तर सुधरेगा तो भविष्य में पेयजल संकट कम होगा, बोरवेल अधिक समय तक जलयुक्त रहेंगे और नगर निगम पर नर्मदा जल परियोजनाओं का बढ़ता दबाव भी कम किया जा सकता है। वर्षा जल को वहीं रोकना सबसे प्रभावी जल प्रबंधन है जहां वह गिरता है।
यदि हर छत बनेगी जल संरक्षण केंद्र
इंदौर में लाखों आवासीय मकान, बहुमंजिला अपार्टमेंट, कॉलोनियां, मॉल, होटल, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, उद्योग और सरकारी भवन हैं। यदि प्रत्येक भवन में उसकी छत के क्षेत्रफल के अनुसार वैज्ञानिक रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली स्थापित की जाए तो बारिश का बड़ा हिस्सा स्थानीय स्तर पर जमीन में समा सकता है। इसके लिए महंगी तकनीक की भी आवश्यकता नहीं है। भवन की क्षमता के अनुसार रिचार्ज पिट, रिचार्ज शाफ्ट, फिल्टर यूनिट, परकोलेशन टैंक, सोक पिट या बोरवेल रिचार्ज जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं। इससे पानी का प्राकृतिक पुनर्भरण होगा और शहर के नीचे मौजूद जलभंडार धीरे-धीरे समृद्ध होंगे।
केवल छतें नहीं, पार्किंग और खुले परिसर भी बनें जल संरक्षण क्षेत्र
आज अधिकांश भवनों की पार्किंग पूरी तरह सीमेंट और कंक्रीट से ढकी होती है। संस्थानों के बड़े-बड़े खुले परिसर भी अभेद्य सतह में बदल चुके हैं। परिणाम यह है कि वर्षा जल जमीन में समाने के बजाय तेजी से बहकर नालों तक पहुंच जाता है। यदि पार्किंग क्षेत्रों में परमीएबल पेवमेंट, सोक पिट, वर्षा जल संग्रहण खांचे और खुले प्लॉटों में जल रिसाव की वैज्ञानिक व्यवस्था विकसित की जाए तो हजारों लीटर पानी स्थानीय स्तर पर जमीन में पहुंच सकता है। इससे न केवल जल संरक्षण होगा बल्कि शहरी बाढ़ जैसी स्थितियों को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी।
सिर्फ नाले साफ करना स्थायी समाधान नहीं
हर वर्ष मानसून से पहले नगर निगम करोड़ों रुपये खर्च कर नालों की सफाई करता है। जलभराव वाले स्थानों का सर्वे होता है, पंप लगाए जाते हैं और आपातकालीन दल तैनात किए जाते हैं। इसके बावजूद पहली तेज बारिश में कई प्रमुख सड़कें पानी से भर जाती हैं। कारण स्पष्ट है। शहर में जितना पानी गिर रहा है, उसका अधिकांश भाग कुछ ही समय में नालों की ओर भेज दिया जाता है। जब एक साथ अत्यधिक पानी ड्रेनेज सिस्टम पर पहुंचता है तो उसकी क्षमता जवाब देने लगती है। यदि उसी पानी का बड़ा हिस्सा भवनों के परिसर में ही जमीन में समा जाए तो नालों पर तत्काल दबाव काफी कम हो सकता है।
हर घर में रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग
- हर बूंद सीधे जमीन में पहुंचे
- भूजल स्तर बढ़ेगा
- पेयजल संकट घटेगा
- जलभराव कम होगा
- नालों पर दबाव घटेगा
- बोरवेल लंबे समय तक जलयुक्त रहेंगे
- आने वाली पीढ़ियों का पानी सुरक्षित होगा
कानून तो हैं, लेकिन पालन नहीं
नए भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान कई स्थानों पर नियमों में शामिल है, लेकिन वास्तविकता यह है कि अनेक भवनों में या तो व्यवस्था बनाई ही नहीं गई या फिर वह वर्षों से बंद पड़ी है। कई जगह केवल नक्शा पास कराने के लिए कागजों में व्यवस्था दिखाई जाती है। जरूरत इस बात की है कि नगर निगम केवल अनुमति देने तक सीमित न रहे बल्कि प्रत्येक वर्ष इन प्रणालियों का निरीक्षण करे। जो भवन वर्षा जल को सीधे नालों में छोड़ रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई भी की जाए। वहीं जो नागरिक प्रभावी जल संरक्षण कर रहे हैं, उन्हें कर में रियायत या अन्य प्रोत्साहन देकर इस अभियान से जोड़ा जा सकता है।
स्वच्छता की तरह
बने जनआंदोलन
इंदौर की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनभागीदारी रही है। स्वच्छता अभियान तभी सफल हुआ जब नागरिक स्वयं उससे जुड़े। ठीक उसी प्रकार वर्षा जल संरक्षण को भी जनआंदोलन बनाना होगा। यदि हर नागरिक यह संकल्प ले कि उसके घर की छत से गिरने वाली एक भी बूंद सड़क पर नहीं जाएगी, तो शहर के जल प्रबंधन में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है। स्कूलों में जागरूकता अभियान, कॉलोनियों में प्रशिक्षण, आवासीय संघों की भागीदारी, उद्योगों की जिम्मेदारी और सरकारी भवनों में आदर्श मॉडल विकसित कर इस दिशा में व्यापक परिवर्तन लाया जा सकता है।
अब बदलनी होगी प्राथमिकता
इंदौर ने यह साबित कर दिया है कि यदि प्रशासन और जनता साथ आएं तो असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं। अब अगली चुनौती जल संरक्षण और वर्षा जल प्रबंधन की है। शहर की पहचान केवल साफ-सफाई तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे जल सुरक्षा और भूजल संवर्धन का भी राष्ट्रीय उदाहरण बनना होगा। आज आवश्यकता केवल मानसून से पहले नाले साफ करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिससे बारिश का अधिकतम पानी धरती के भीतर पहुंचे। यही भविष्य की सबसे सस्ती, सबसे टिकाऊ और सबसे प्रभावी जल नीति है। बारिश की हर बूंद वहीं रुके, जहां वह गिरे। यदि इंदौर इस सिद्धांत को शहर की नीति बना ले, तो आने वाले वर्षों में भूजल स्तर में सुधार, जल संरक्षण में वृद्धि और बारिश के दौरान होने वाली समस्याओं में उल्लेखनीय कमी संभव है। देश के सबसे स्वच्छ शहर को अब देश का सबसे बेहतर वर्षा जल प्रबंधन वाला शहर बनने की दिशा में भी कदम बढ़ाना होगा। तभी स्वच्छता के साथ-साथ जल सुरक्षा का सपना भी साकार हो सकेगा।

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