संपादकीय

टीकमगढ़ के पलेरा थाना क्षेत्र के बन्नेबुजुर्ग गांव में 20 दिन की एक मासूम बच्ची की हत्या का आरोप उसकी अपनी दादी पर लगना केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि समाज के उस कड़वे सच का आईना भी है, जिससे हम आज भी पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाए हैं। एक ओर हम नवरात्र में कन्या पूजन करते हैं, बेटियों को देवी का स्वरूप मानते हैं, "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" जैसे अभियान चलाते हैं, वहीं दूसरी ओर कहीं बेटी के जन्म पर मातम मनाया जाता है, कहीं भ्रूण हत्या होती है, कहीं नवजात बच्चियों की हत्या कर दी जाती है और कहीं उन्हें जीवनभर भेदभाव, हिंसा और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।

यह विरोधाभास केवल कानून से समाप्त नहीं होगा। इसके लिए समाज की सोच बदलनी होगी। जब तक बेटी को परिवार का समान और सम्मानित सदस्य नहीं माना जाएगा, तब तक ऐसे दुखद घटनाक्रम सामने आते रहेंगे।

भारत ने शिक्षा, विज्ञान, खेल, राजनीति, सेना, न्यायपालिका और अंतरिक्ष जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश की बेटियां हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। वे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, सैनिक, पायलट, न्यायाधीश, खिलाड़ी, उद्यमी और प्रशासनिक अधिकारी बनकर देश का नाम रोशन कर रही हैं। इसके बावजूद यदि किसी घर में बेटी के जन्म पर निराशा छा जाती है, तो यह हमारी सामाजिक मानसिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि कई शहरी परिवारों में भी बेटी को आज भी आर्थिक बोझ मानने की मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसके पीछे दहेज, पितृसत्तात्मक सोच, वंश चलाने की संकीर्ण अवधारणा, संपत्ति के प्रति भेदभाव और सामाजिक दबाव जैसे अनेक कारण हैं। कई परिवार यह मानते हैं कि बेटा परिवार का सहारा बनेगा, जबकि बेटी दूसरे घर चली जाएगी। लेकिन बदलते समय ने इस सोच को बार-बार गलत साबित किया है। आज अनेक बेटियां अपने माता-पिता की जिम्मेदारियां निभा रही हैं, उनका सहारा बन रही हैं और परिवार की आर्थिक तथा सामाजिक मजबूती का आधार बन रही हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि कई स्थानों पर बेटी का संघर्ष जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। कहीं भ्रूण हत्या होती है, कहीं जन्म के बाद उपेक्षा, कुपोषण और शिक्षा से वंचित रखा जाता है। यदि वह बड़ी हो जाती है तो छेड़छाड़, बाल विवाह, यौन अपराध, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और सामाजिक भेदभाव जैसी अनेक चुनौतियां उसका इंतजार करती हैं। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती।

महिलाओं और बच्चियों के प्रति होने वाली हर प्रकार की प्रताड़ना पर कठोर सामाजिक और कानूनी रोक आवश्यक है। केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। समाज को अपराध होने से पहले ही ऐसी मानसिकता को रोकने का प्रयास करना होगा। परिवारों में बेटों और बेटियों के बीच समानता का व्यवहार बचपन से सिखाया जाना चाहिए। स्कूलों में नैतिक शिक्षा, लैंगिक समानता और संवेदनशीलता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। पंचायतों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और स्थानीय नेतृत्व को भी इस दिशा में निरंतर जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। दहेज प्रथा आज भी अनेक परिवारों के लिए अभिशाप बनी हुई है। बेटी के जन्म को बोझ समझने के पीछे दहेज का डर भी एक बड़ा कारण माना जाता है। 

जब तक समाज दहेज लेने और देने की मानसिकता को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करेगा, तब तक बेटियों के प्रति भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। दहेज मांगने वालों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। विवाह को लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि दो परिवारों के सम्मानजनक संबंध के रूप में देखा जाना चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, समाज, शैक्षणिक संस्थान, प्रशासन और प्रत्येक नागरिक की समान जिम्मेदारी है कि वह महिलाओं और बच्चियों के सम्मान और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। किसी भी प्रकार की छेड़छाड़, हिंसा, शोषण या उत्पीड़न को सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। समय पर शिकायत, त्वरित जांच, निष्पक्ष कार्रवाई और पीड़ित को सहयोग—ये सभी एक सुरक्षित समाज की आवश्यक शर्तें हैं। देश के कई क्षेत्रों में आज विवाह योग्य युवकों के लिए जीवनसाथी मिलना कठिन होता जा रहा है। 

इसके पीछे कई सामाजिक और जनसांख्यिकीय कारण हैं, जिनमें लंबे समय तक बेटियों की संख्या में असंतुलन भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। यदि समाज बेटियों के जन्म को हतोत्साहित करेगा, तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा। परिवार और समाज दोनों का संतुलन स्त्री और पुरुष की समान भागीदारी से ही संभव है। इसलिए बेटी केवल एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की आवश्यकता है।यह भी समझना होगा कि किसी भी समाज की प्रगति उसकी महिलाओं की स्थिति से मापी जाती है। जिस समाज में महिलाएं सुरक्षित, शिक्षित और सम्मानित होती हैं, वहां आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और सांस्कृतिक समृद्धि अधिक मजबूत होती है। इसलिए बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और आत्मनिर्भरता पर किया गया निवेश वास्तव में पूरे देश के भविष्य में किया गया निवेश है। 

माता-पिता की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें बेटियों को आत्मविश्वासी बनाना चाहिए, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलानी चाहिए, उनके सपनों को प्रोत्साहित करना चाहिए और यह विश्वास दिलाना चाहिए कि वे किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकती हैं। वहीं बेटों को भी बचपन से महिलाओं के प्रति सम्मान, समानता और जिम्मेदारी का संस्कार देना आवश्यक है। यदि केवल बेटियों को सावधान रहना सिखाया जाएगा और बेटों को जिम्मेदार नागरिक बनना नहीं सिखाया जाएगा, तो सामाजिक परिवर्तन अधूरा रहेगा। मीडिया, फिल्म, साहित्य और सोशल मीडिया की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। 

ऐसी सकारात्मक कहानियां अधिक सामने आनी चाहिए जो बेटियों की उपलब्धियों, संघर्ष और योगदान को समाज तक पहुंचाएं। साथ ही महिलाओं के प्रति अपमानजनक या हिंसक सोच को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्तियों का विरोध होना चाहिए। सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्रों तक पहुंचे, यह भी सुनिश्चित करना होगा। बालिकाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब उनका ईमानदारी से क्रियान्वयन होगा और समाज भी उनमें सक्रिय भागीदारी करेगा। आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने की है। 

हर परिवार को यह संकल्प लेना होगा कि बेटी और बेटे में कभी भेदभाव नहीं करेंगे। हर गांव, हर मोहल्ला और हर शहर यह संदेश दे कि बेटी का जन्म उत्सव है, बोझ नहीं। महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, दहेज उत्पीड़न, बाल विवाह, यौन शोषण, घरेलू हिंसा और हर प्रकार के भेदभाव के खिलाफ समाज को एकजुट होकर खड़ा होना होगा। यदि हम वास्तव में विकसित और संवेदनशील भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो बेटियों को सुरक्षित, सम्मानजनक और समान अवसरों वाला वातावरण देना ही होगा। एक मासूम बच्ची की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है कि यदि हमारी सोच नहीं बदली, तो विकास के सारे दावे अधूरे रह जाएंगे। बेटियां बोझ नहीं हैं। 

वे जीवन की निरंतरता हैं, परिवार की खुशहाली हैं, समाज की संवेदना हैं और राष्ट्र की शक्ति हैं। जिस दिन हर घर में बेटी के जन्म पर उतनी ही खुशी मनाई जाएगी जितनी बेटे के जन्म पर होती है, उसी दिन हम सच्चे अर्थों में एक समान, न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की ओर बढ़ सकेंगे।




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