‘मौसमी प्रशासन और राजनीति’
समय पर जागने के दुष्परिणाम...
कहते हैं कि समय पर जागना अच्छी आदत है, लेकिन हमारे नेताओं और अफसरों ने समय पर जागने का ऐसा तरीका विकसित कर लिया है, जिसके दुष्परिणाम जनता को पूरे साल भुगतने पड़ते हैं। वे तब जागते हैं, जब समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। जब लोग सड़कों पर उतर आते हैं, जब मीडिया सवाल पूछने लगता है, जब विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं और जब हालात संभालना मुश्किल होने लगता है। उससे पहले सब कुछ भगवान भरोसे चलता रहता है।
इंदौर सहित पूरे मध्यप्रदेश की स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। जिन समस्याओं पर सालभर काम होना चाहिए, उन्हें मौसमी बना दिया गया है। गर्मी आई तो जल संकट की चिंता शुरू हो गई। जिन क्षेत्रों में हर साल पानी की समस्या होती है, वहां के लिए स्थायी योजना बनाने के बजाय टैंकरों की व्यवस्था को ही समाधान मान लिया गया। लोग परेशान हुए, प्रदर्शन हुए, नेताओं ने दौरे किए, अफसरों ने बैठकों का दौर शुरू किया और नगर निगम ने हाथोंहाथ टैंकर भेजकर लोगों को कुछ समय के लिए शांत कर दिया।
सवाल यह है कि यदि हर साल एक जैसे क्षेत्रों में पानी की कमी होती है तो उसके लिए दीर्घकालिक समाधान क्यों नहीं निकाला जाता? आखिर हर गर्मी में वही संकट और वही सरकारी कवायद क्यों दोहराई जाती है? इसका उत्तर शायद इसलिए नहीं मिलता क्योंकि स्थायी समाधान में राजनीतिक लाभ कम है और तात्कालिक राहत में प्रचार की संभावनाएं अधिक हैं। अब मौसम ने करवट ली है और मानसून दस्तक देने वाला है। अचानक जल संरक्षण की बातें होने लगी हैं। जलजमाव वाले क्षेत्रों का निरीक्षण शुरू हो गया है। नालों की सफाई के दावे किए जा रहे हैं। जिन इलाकों में हर साल बारिश के दौरान लोग परेशान होते हैं, वहां अफसरों के दौरे बढ़ गए हैं। सवाल यह है कि पिछले आठ-दस महीनों तक ये इलाके क्या प्रशासन के नक्शे से गायब थे? वास्तविकता यह है कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था समस्या आने के बाद सक्रिय होती है, समस्या को रोकने के लिए नहीं। यही कारण है कि हर साल मानसून आने से पहले तैयारियों की घोषणाएं होती हैं और मानसून शुरू होते ही उन तैयारियों की पोल खुल जाती है।
इंदौर इसका ताजा उदाहरण है। जून की शुरुआत में दो दिन चली आंधी-बारिश ने शहर की तैयारियों की वास्तविकता उजागर कर दी थी। कई स्थानों पर जलभराव हुआ, पेड़ गिरे, बिजली व्यवस्था प्रभावित हुई । यदि शुरुआती बारिश में यह स्थिति है तो पूरे मानसून के दौरान क्या होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। फिर वही दृश्य दिखाई देंगे। सड़कें उखड़ेंगी, गड्ढे बढ़ेंगे, जलजमाव होगा, ट्रैफिक जाम लगेगा और नागरिक परेशान होंगे। इसके बाद अधिकारी निरीक्षण करेंगे, बैठकें लेंगे, ठेकेदारों को नोटिस देंगे और कुछ निर्माण कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने की चेतावनी देंगे। जनता को आश्वासन मिलेगा कि बारिश के बाद सभी सड़कें सुधार दी जाएंगी। वर्षों से यही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है। विडंबना यह है कि हर साल करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद समस्याएं वहीं की वहीं बनी रहती हैं। यदि सड़कें एक ही बारिश में उखड़ जाती हैं तो जवाबदेही तय क्यों नहीं होती? यदि नालों की सफाई पर खर्च होने के बाद भी जलभराव होता है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? यदि पेड़ों की छंटाई समय पर नहीं होती और हर आंधी में शाखाएं गिरती हैं तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता है?
इधर, जैसे-तैसे मानसून समाप्त होगा और फिर त्योहारों का मौसम शुरू हो जाएगा।
रक्षाबंधन, स्वतंत्रता दिवस, गणेशोत्सव, नवरात्रि, दशहरा और दीपावली जैसे आयोजनों में पूरा प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र व्यस्त दिखाई देगा। शहर सजेंगे, मंच लगेंगे, स्वागत द्वार बनेंगे और शुभकामनाओं के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए जाएंगे। विशेष रूप से नवरात्रि और दशहरा जैसे आयोजन कई नेताओं के लिए जनसंपर्क और प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम बन चुके हैं। पूरे वर्ष जनता जिन समस्याओं से जूझती है, वे कुछ समय के लिए पीछे छूट जाती हैं। लोग भंडारों का आनंद लेने लग जाते हैं...। उत्सवों की चमक-दमक के बीच पानी, सड़क, सफाई, यातायात और बिजली जैसी मूलभूत समस्याएं चर्चा से बाहर हो जाती हैं। जनता भी अपनी रोजमर्रा की परेशानियों को कुछ समय के लिए भूलकर त्योहारों में व्यस्त हो जाती है। यही वह समय होता है जब राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र राहत की सांस लेता है। फिर सर्दी गुजरती है, गर्मी आती है और जल संकट का वही पुराना अध्याय दोबारा शुरू हो जाता है।
यानी पूरा तंत्र समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि उनका प्रबंधन कर रहा है। संकट को समाप्त करने के बजाय उसे नियंत्रित करने की कला विकसित कर ली गई है। यही कारण है कि हर साल वही मुद्दे, वही शिकायतें, वही दौरे, वही घोषणाएं और वही आश्वासन सुनाई देते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जनता को भी अब इस चक्र की आदत पड़ती जा रही है। लोगों ने मान लिया है कि गर्मी में पानी की समस्या होगी, बारिश में जलभराव होगा, सड़कों में गड्ढे होंगे, बिजली कटेगी और फिर कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो जाएगा। जब समाज समस्याओं को नियति मानने लगे और व्यवस्था उन्हें अवसर मानने लगे, तब स्थायी समाधान की उम्मीद कमजोर पड़ जाती है।
इसलिए शायद यह कहना गलत नहीं होगा कि हमारे यहां समय पर जागने की नहीं, सही समय से पहले जागने की जरूरत है। क्योंकि जब तक अफसर और नेता समस्या आने के बाद ही जागते रहेंगे, तब तक जनता को राहत नहीं, केवल आश्वासन मिलते रहेंगे। और तब तक हर साल यही चक्र चलता रहेगा, गर्मी में जलसंकट, बारिश में जलजमाव, त्योहारों में प्रचार और फिर अगले संकट का इंतजार...?
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