जमीनी स्तर पर जागरुकता की कमी

देशभर में गहराया जलसंकट

जवाबदेही @ इंदौर

हमारे देश में समय पर और जब मुसीबत सिर पर आ  जाती है, तब जागने की आदत अफसरों, नेताओं को पड़ गई है...। वर्तमान में हमारे देश में जलसंकट गहरा गया है। शहरों में नगर निगम जैसे-तैसे व्यवस्था कर रहा है, लेकिन गांवों में हालात काफी दयनीय है। लोगों को चार से पांच किलोमीटर दूरी से पानी लाना पड़ रहा है। इन सबका जिम्मेदार खुद सरकारी सिस्टम है। विकास के नाम पर लाखों पेड़ों को काटा जा रहा है। सड़कें चकाचक होनी चाहिए, सफर आरामदायक होना चाहिए, लेकिन पेयजल को लेकर कोई गंभीर नहीं है। पूरे देश में प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। पहाड़ियां काटी जा रही है, अवैध खनन हो रहा है, कोयले के लिए पेड़ों को अंधाधुंध तरीके से काटा जा रहा है, जबकि सर्वविदित है कि पेड़ ही बारिश को धरती पर लाते हैं...।

जनता विरोध करती है, लेकिन उसकी आवाज किसी के कानों तक नहीं पहुंच रही है। सरकार कहती है कि हर घर तक नल पहुंचाएंगे, नल तो पहुंच जाएंगे, पानी कहां से आएगा? देशभर के जलस्रोत दम तोड़ रहे हैं, क्योंकि नदियों के आसपास के जंगल भी कट रहे हैं। जवाबदेही ने गत अंकों में इस बात को प्रमुखता से प्रकाशित किया कि पेड़ की जड़ों से पानी का रिसाव होकर नदियों में मिलता है और नदियां कलकल बहती रहती है। 

इंदौर में कान्ह और उज्जैन में शिप्रा नदी को कलकल बहने और स्वच्छ करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन क्या कभी किसी ने कोई सुधार देखा। इंदौर में तीन पीढ़ियां सुनते-पढ़ते आ रही है कि कान्ह नदी स्वच्छ होगी, क्या कान्ह नदी स्वच्छ और साफ हुई? नहीं, तो फिर करोड़ों रुपया क्यों इस प्रोजेक्ट पर फालतू उड़ाया जा रहा है। कान्ह नदी को स्वच्छ बनाने के लिए केंद्र सरकार के ‘नमामि गंगे' मिशन के तहत 511 करोड़ रुपए का मुख्य प्रोजेक्ट स्वीकृत किया गया है। इसके अलावा, वर्ष 2028 के सिंहस्थ कुंभ से पहले इसे शिप्रा नदी से जोड़ने व सीवेज रोकने के लिए 416 करोड़ रुपए की एक अन्य परियोजना भी संचालित की जा रही है। सरकार का मिशन सही है, लेकिन कर्ताधर्ताओं की नीयत ठीक नहीं है। योजनाओं के पैसों को कैसे पलीता लगाया जाता है, ये अफसरों ने नौकरी करने के साथ ही सीख लिया है और इसी का परिणाम है कि कुछ अच्छा होता दिखाई नहीं देता।

अभी अगले महीने बारिश शुरू होने वाली  

इंदौर में  सिरपुर तालाब, यशवंत सागर (इंदौर-देपालपुर रोड पर स्थित यह तालाब गंभीर नदी पर बना एक बांध जलाशय है), पिपल्यापाला तालाब, बिलावली तालाब, किशनपुरा / माचल तालाब  इंदौर से धार रोड पर स्थित, इनके अलावा शहर और इसके बाहरी इलाकों में लसूडिया मोरी, टिगरिया बादशाह, कनाड़िया, तलावली चांदा, निपानिया, अरंदिया, खजराना, लिंबोदी, अन्नपूर्णा, हुकमखेड़ी, अहिरखेड़ी, बिजासन और भंवरासला जैसे कई छोटे-बड़े तालाब मौजूद हैं, लेकिन इनकी हालत गर्मी में दयनीय हो जाती है। बिलावली तालाब को कुछ दिनों से गहरा किया जा रहा है, ताकि बारिश का पानी भारी मात्रा में आ सके। यह काम दिसंबर से शुरू हो जाना था, तो अब तक काफी गहराई तक खुदाई हो जाती, लेकिन जैसा कि कहा जा रहा है कि मानसून 12 जून तक प्रवेश करेगा और बारिश होगी..., तो ऐसे में 20 से 22 दिन में सिरपुर तालाब में कितनी गहराई तक खुदाई हो जाएगी? सवाल सिर्फ इतना ही है कि समय पर जागने वाला नगर निगम, समय रहते  काम नहीं करता।

बढ़ती जनसंख्या भी बड़ा कारण

देश में जिस तरीके से जनसंख्या बढ़ती जा रही है, वह भी एक बड़ा संकट देश के सामने है, इसमे खुश होने की कोई आवश्यकता नहीं है कि हम विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में है। ये जनसंख्या विस्फोट भी सभी को ले डूबेगा। इसमें जातिवाद, धर्म से उठकर हर व्यक्ति को सोचना होगा। चाहे हिंदू हो या मुस्लिम या कोई अन्य धर्म के लोग जनसंख्या पर नियंत्रण खुद को करना होगा...। यदि खाद्य पदार्थ और पेयजल ही नहीं मिलेगा तो लोग कैसे जीवन-यापन करेंगे। 

केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट 

166 जलाशयों का स्तर 40% से नीचे

मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, , असम, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु सबसे ज़्ेयादा प्रभावित राज्यों में शामिल, भीषण गर्मी, मानसून की अनिश्चितता और अत्यधिक भूजल दोहन को बताया जल संकट का कारण

गर्मी के दस्तक देने के साथ ही देश में जल संकट गहराने लगा है। यह बात केंद्रीय जल आयोग की एक हालिया रिपोर्ट में सामने आई है। आयोग द्वारा जारी एक बुलेटिन के अनुसार अप्रैल की शुरुआत की तुलना में कई प्रमुख नदी बेसिनों में जल स्तर घटा है। गंगा बेसिन 53.8% से गिरकर लगभग 50.01% पर आ गया है। गोदावरी 47.58 से घटकर 40.69% और नर्मदा 46.09 से गिरकर 38.82 % पर पहुंच गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक देश में जल भंडारण की स्थिति तेजी से बिगड़ रही है, जिससे गर्मियों की शुरुआत में ही जल संकट के स्पष्ट संकेत सामने आने लगे हैं। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार देश के 166 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी घटकर कुल क्षमता के 40 % से नीचे आ गया है। वहीं कई प्रमुख नदी घाटियों में भी जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे क्षेत्रीय जल असंतुलन गहराने की आशंका बढ़ गई है।

केंद्रीय जल आयोग के साप्ताहिक बुलेटिन के अनुसार देश के 166 जलाशयों में कुल लाइव स्टोरेज 71.082 अरब घन मीटर (बीसीएम) रह गया है, जो उनकी कुल क्षमता 183.565 बीसीएम का केवल 38.72% है। 9 अप्रैल 2026 को यह स्तर 44.71 % था, यानी तीन सप्ताह में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। ये 166 जलाशय देश की कुल अनुमानित जल भंडारण क्षमता 257.812 बीसीएम का लगभग 71.20 % हिस्सा रखते हैं। इनमें से 20 जलाशय जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े हैं, जिनकी संयुक्त क्षमता 35.299 बीसीएम है।

2030 तक 40% आबादी को पानी की कमी हो सकती है

वर्तमान में भारत एक गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है, जहाँ लगभग 60 करोड़ लोग उच्च जल तनाव से प्रभावित हैं। 2030 तक देश की 40% आबादी को पीने के पानी की कमी हो सकती है। अत्यधिक भूजल दोहन, प्रदूषण, जनसंख्या वृद्धि, और कृषि में जल-गहन फसलों (जैसे गन्ना/चावल) का उपयोग इस संकट के मुख्य कारण हैं। भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है, जिसके कारण जल स्तर तेजी से गिर रहा है। जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है, और 70% जल स्रोत प्रदूषित हैं। शहरी जल संकट को देखें तो नीति आयोग के अनुसार, 21 प्रमुख भारतीय शहर भूजल समाप्त होने के कगार पर हैं। देश में कुल पानी का लगभग 75% से अधिक हिस्सा कृषि में उपयोग होता है, जो अक्सर अक्षम पद्धतियों के कारण बर्बाद होता है।

कई प्रमुख नदी बेसिनों में जल स्तर घटा

केंद्रीय जल आयोग के अनुसार अप्रैल की शुरुआत की तुलना में कई प्रमुख नदी बेसिनों में जल स्तर घटा है। गंगा बेसिन 53.8% से गिरकर लगभग 50.01% पर आ गया है। गोदावरी 47.58 से घटकर 40.69% और नर्मदा 46.09 से गिरकर 38.82 % पर पहुंच गई है। नर्मदा 46.09 से गिरकर 38.82 % पर पहुंच गई है। कृष्णा बेसिन पहले से ही कमजोर स्थिति में था और अब भी लगभग 22.55% के आसपास बना हुआ है। कावेरी (अब 35.74%) और महानदी (43.51%) में भी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि ताप्ती अपेक्षाकृत संतुलित स्थिति में बनी हुई है।

22 जलाशयों में सामान्य से 80% कम पानी     

मध्य प्रदेश के जलाशयों में पिछले वर्ष की तुलना में कमी दर्ज की गई है। वहीं गोवा में केवल एक प्रमुख जलाशय होने के बावजूद वहां भी 12 % से अधिक गिरावट दर्ज की गई है, जो स्थानीय जल उपलब्धता के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत है। कई प्रमुख जलाशयों में गंभीर स्थिति देश के कई प्रमुख जलाशयों में जल स्तर अत्यंत निम्न स्तर पर पहुंच गया है। असम का खांडोंग जलाशय लगभग 21.16 % पर है, जबकि झारखंड का चंदन डैम पूरी तरह खाली हो गया है। कर्नाटक का तट्टिहल्ला 24.63, केरल का पेरियार 29.21, तमिलनाडु के वैगई 15.17, करायर 49.89 और अलियार 48.89 % नीचे हैं। कुल 166 जलाशयों में से 22 ऐसे हैं, जहां जल स्तर सामान्य के 80 % कम है।

अफसरों का पेट ही नहीं भर रहा

हर साल करोड़ों रुपयों का बजट विकास कार्यों के लिए पास होता है। हालात ये है कि या ता फंड का सालभर तक इस्तेमाल नहीं करते। वहीं, जिस योजना के मद में पैसा मिलता है, उसमें पहले अफसर अपना कमिशन लेता है। काम कहीं भी गुणवत्तापूर्वक नहीं हो पा रहे हैं। कान्ह नदी का ही उदाहरण है कि कई जगह गाद भरी पड़ी है, सौंदर्यीकरण के काम टूट-फूट गए हैं। लोगों को टहलने के लिए जो ब्लॉक पैवर्स लगाए गए थे, वो टूट-फूट गए हैं। गंदगी इतनी है कि इंदौर का कोई भी नागरिक कान्ह नदी के किनारे पर टहलने नहीं जाते। नदी कि किनारों और घाटों के आसपास की दीवारों पर रंगरोगन कर करोड़ों रुपए खर्च कर ‘संवारने की वाली भाषा’ में काम किया जा रहा है। 


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