आपदा में आया है अवसर

भारत भावना से हो काम

जवाबदेही फिर सामाजिक सरोकार के तहत अपनी बात देश के युवाओं के सामने रख रहा है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। काम करने की लगन ही आदमी को बड़ा अवसर देती है और बड़ा रोजगार भी। कुछ ऐसा ही एक अवसर आपदा में हमारे सामने आया है। वर्तमान में बढ़ती महंगाई का कारण अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध है, जिसकी वजह से क्रूड ऑइल महंगा हो गया है और जिसका असर हमारे देश पर भी पढ़ रहा है और महंगाई बढ़ती जा रही है। दरअसल, महंगाई को दो-तीन साल तक कंट्रोल में लाने के सरकार को पुरजोर प्रयास करना होंगे। सरकार को भारत भावना से काम करना होगा, ऐसा नहीं कि इस राज्य में हमारी सरकार नहीं है तो वहां ध्यान नहीं दिया जाएगा। भारत की भावना से काम करने से एक साथ पूरे देश का कचरा साफ होगा और हमारे देश की प्रशंसा दुनियाभर में होगी और लोग हमारे देश को देखने आएंगे कि यहां देश में एक समान नीति पर काम होता है। युद्ध के कारण जो हालात बने है, उसके अनुसार अभी दो से तीन साल महंगाई कम नहीं होगी

गौरतलब है कि क्रूड ऑइल (कच्चा तेल) के शोधन (Refining) से पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, एलपीजी , जेट फ्यूल, और बिटुमिन (डामर) जैसे उत्पाद मुख्य रूप से निकलते हैं। इसके अलावा, पेट्रोकेमिकल्स का उपयोग प्लास्टिक, उर्वरक, मोम, ग्रीस, और स्नेहक (Lubricants) बनाने में किया जाता है। 1 बैरल (159 लीटर) कच्चे तेल से लगभग 42% पेट्रोल और 27% डीजल प्राप्त होता है।

पेट्रोकेमिकल्स: प्लास्टिक, कृत्रिम रबर, और विभिन्न प्रकार के रसायन। 

यानि क्रूड ऑइल से जो वस्तुएं हमें मिलती है, वो लगभग हमारे देश के कचरे के ढेर में ही पड़ी हुई है। वर्तमान में इंदौर, चंडीगढ़ और सूरत सहित कई शहर साफ हो रहे हैं लेकिन फिर भी पूरे देश में शहरों से लेकर गांवों तक में कचरे के ढेर है, जिनसे हम कांच, कपड़ा, प्लास्टिक आदि अलग-अलग निकालकर देश को आर्थिक मुसीबत से बचा सकते हैं। इसके लिए सरकार को सफाई अभियान को और वृहद स्तर पर चलाना होगा और इसमें युवाओं की भागीदारी को रोजगार के रूप में जोड़ना होगा। देशभर के थानों में वाहन सड़ रहे हैं, साइकिल, दो पहिया वाहन, ऑटो रिक्शा, कार, बस ट्रक सहित तमाम वाहन जो किसी काम के नहीं है। वाहनों के कई पार्ट चोरी तक हो जाते हैं। देशभर के थानों से तत्काल इन सड़े-गले वाहनों को रिसाइकिलिंग के लिए भेजना चाहिए, ताकि देश को लोहा आयात न करना पड़े।  

देशभर में कई जगह हादसे हो जाते हैं, जिनमें चार पहिया से लेकर दो पहिया वाहन, बस, ट्रक, टैम्पो ट्रैवलर्स आदि वाहन या तो सड़क किनारे पड़े होते हैं या फिर किसी खाई में भंगार होते रहते हैं। वहीं हाईवे से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क किनारे कई वाहन जली हालत में पड़े हैं, जो किसी काम के नहीं है।  चोर  इन्हें काटकर बेच रहे हैं और नशा कर अपराध तक कर रहे हैं।  

देशभर में मिलेगा मुफ्त लोहा

देशभर में मुफ्त का लोहा पड़ा है, जिसे सरकार को वृहद स्तर पर उठाना शुरू कर देना चाहिए। नाम मात्र की मजदूरी पर अरबों रुपयों का लोहा सरकार मिलेगा और आयात पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। इस काम को करने के बदले में हजारों युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। 

युवाओं के लिए भारत-जी राम जी योजना सबसे बेहतर

देशभर के युवाओं को भारत-जी राम जी योजना से जोड़कर कचरों के ढेर से लोहा, प्लास्टिक, कचरा, थर्मोंकोल, कांच सहित सारा कचरा-अलग करवाना चाहिए इन युवाओं को कचरा छांटने-बिनने के लिए ग्लव्ज आदि सुविधाएं और दवाइयों की भी व्यवस्था निशुल्क करना चाहिए, ताकि उन्हें किसी प्रकार का डर ना लगे।

हमारे देश में योजनाओं के माध्यम से जो काम करवाया जाता रहा है वो सब मशीनों से किया जाता है और भ्रष्ट लोगों द्वारा सरकार को दिखाने के लिए मजदूरों के हस्ताक्षर किए जाते रहे हैं। इसका परिणाम गलत भी सामने आ रहा है कि मजदूर काम तो करता नहीं है, कर्ताधर्ता फर्जी हस्ताक्षर कर बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार कर रहे हैं। मजदूर काम नहीं करने की वजह से आलसी हो रहे हैं। 

कुछ राज्यों के थानों की स्थिति

मध्यप्रदेश: इंदौर, भोपाल सहित  कई थानों में दशकों से जब्त वाहन पड़े हैं और जगह घेरकर कबाड़ में बदल रहे हैं।

गुजरात: करीब 28,749 वाहन पुलिस थानों में पड़े-पड़े खराब हो रहे थे, जिनकी कीमत 162 करोड़ रुपए से ज्यादा आंकी गई।

राजस्थान (भरतपुर): 27 थानों में 4050 वाहन कबाड़ बन चुके थे, जिनकी कीमत लगभग 65 करोड़ रुपए थी।

हरियाणा (यमुनानगर): सिर्फ एक जिले में ही 500 से ज्यादा वाहन नीलामी के इंतजार में पड़े थे।

पंजाब (मोहाली): कई थानों में हर थाने में 100+ वाहन सालों से खड़े होकर जंग खा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश (प्रयागराज): थानों के बाहर खुले में वर्षों से खड़े वाहन कबाड़ बन रहे हैं और सुरक्षा खतरा भी पैदा कर रहे हैं।

'विकसित भारत-जीरामजी' योजना से युवाओं को जोड़ना शुरू हो

कोरोना काल ने हमें यह सिखाया था कि विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन रुकता नहीं, बल्कि नए रास्ते खोजता है। जब पूरी दुनिया लॉकडाउन में थी, तब भारत ने न केवल खुद को संभाला, बल्कि डिजिटल क्रांति के माध्यम से नए अवसर भी पैदा किए। ऑनलाइन शिक्षा, वर्क फ्रॉम होम, ई-कॉमर्स और होम डिलीवरी जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ। लाखों लोगों ने अपनी नौकरी खोने के बाद छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू किए और आज वे आत्मनिर्भर बन चुके हैं। आज वही स्थिति एक बार फिर सामने है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार संकट स्वास्थ्य का नहीं बल्कि आर्थिक और औद्योगिक है। ऐसे में घबराने के बजाय हमें उसी जज्बे के साथ आगे बढ़ना होगा, जो हमने कोरोना के समय दिखाया था।

संकट की जड़ और उसका समाधान

मिडिल ईस्ट के संघर्ष के कारण भारत में लोहा, एल्यूमिनियम, कांच जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल की कमी उत्पन्न हो रही है। कई उद्योग बंद होने की कगार पर हैं और लाखों लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। लेकिन यदि गहराई से देखा जाए, तो इन समस्याओं का समाधान हमारे अपने देश में ही मौजूद है। देशभर में फैले कचरे के ढेर केवल गंदगी का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे संसाधनों का भंडार भी हैं। इन ढेरों में बड़ी मात्रा में धातुएं, प्लास्टिक, कांच और अन्य पुनर्चक्रण योग्य सामग्री मौजूद है। यदि इनका वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए, तो न केवल कच्चे माल की कमी दूर हो सकती है बल्कि लाखों युवाओं को रोजगार भी मिल सकता है।

एक राष्ट्रीय अभियान

‘कचरे से कमाई’... यह समय है कि भारत ‘वेस्ट टू वेल्थ’  यानी कचरे से संपत्ति बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाए। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक व्यापक योजना लागू करनी चाहिए, जिसमें युवाओं को सीधे जोड़ा जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ने स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से देश को साफ-सफाई का महत्व समझाया। इंदौर जैसे शहर इसका जीता-जागता उदाहरण हैं, जहां कचरे के ढेर आज सुंदर गार्डनों में बदल चुके हैं। अब इस पहल को अगले स्तर पर ले जाने का समय है, जहां सफाई के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण भी जुड़ा हो।

मानसिकता में बदलाव की जरूरत

हमें यह समझना होगा कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। कोरोना काल में जब इंजीनियर सब्जी बेच रहे थे और मैनेजर डिलीवरी बॉय बन रहे थे, तब समाज ने काम की गरिमा को समझा था। आज फिर उसी सोच को अपनाने की जरूरत है। यह संकट हमारे लिए परीक्षा है, लेकिन साथ ही एक अवसर भी है, दुनिया को यह दिखाने का कि हम केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादक भी बन सकते हैं।यदि हम अपने कचरे को संसाधन में बदल दें, अपने युवाओं को रोजगार से जोड़ दें और अपनी नीतियों को समय के अनुसार ढाल लें, तो यह संकट हमें एक नए भारत की ओर ले जा सकता है। देशभर के कचरों के ढेर में लोहा, कपड़ा, प्लास्टिक, थर्मोकोल, कांच सहित तमाम ऐसी वस्तुएं पड़ी है, जिसे रिसाइकल कर फिर से उपयोग में लाकर अच्छा खासा पैसा कमाया जा सकता है। भारत में लौह अयस्क का आयात वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 12-14 मिलियन टन तक पहुँचने का अनुमान है, जो पिछले सात वर्षों में सबसे अधिक है। यह बढ़ोतरी उच्च गुणवत्ता वाले अयस्क की कमी और मजबूत घरेलू मांग के कारण हो रही है।


Post a Comment

Previous Post Next Post