मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार एक ऐसी गंभीर समस्या बन चुका है, जिसने शासन और प्रशासन की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। प्रदेश का शायद ही कोई ऐसा विभाग बचा हो, जहां बिना ‘लेन-देन’ के काम होने की उम्मीद जनता कर सके। स्वास्थ्य विभाग से लेकर राजस्व विभाग तक, नगर निगम से लेकर पीडब्ल्यूडी तक, हर जगह रिश्वतखोरी और अनियमितताओं की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि आम नागरिकों के बीच यह धारणा मजबूत हो गई है कि सरकारी कार्यालयों में बिना घूस दिए काम कराना लगभग असंभव है। इंदौर में विजय नगर थाने का मामला चल रहा है, जिसमें पुलिस वालों ने तस्कर को पकड़ा और छोड़ने के बदले 10 लाख रुपए मांगे। इसी तरह एरोड्रम थाना के मामला क्रिप्टो करेंसी को लेकर चल रहा है,उसमें भी पुलिसकर्मियों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है।

हाल के वर्षों में लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू)  द्वारा की गई कार्रवाइयों में डॉक्टर, इंजीनियर, तहसीलदार, पटवारी, पुलिसकर्मी और यहां तक कि छोटे कर्मचारियों तक के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले सामने आए हैं। करोड़ों रुपए की अवैध संपत्ति मिलने और रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े जाने की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि भ्रष्टाचार अब केवल व्यक्तिगत लालच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक संगठित व्यवस्था का रूप ले चुका है।

राजस्व विभाग बना भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा केंद्र

प्रदेश में सबसे अधिक शिकायतें राजस्व विभाग को लेकर सामने आती हैं। जमीनों के नामांतरण, बंटांकन, सीमांकन और रिकॉर्ड सुधार जैसे कार्यों के लिए लोगों को महीनों सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं। आरोप है कि पटवारी, आरआई, तहसीलदार और अन्य राजस्व अधिकारी बिना रिश्वत लिए फाइल आगे नहीं बढ़ाते।

ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि उनकी जमीन से जुड़े कार्य समय पर नहीं हो पाते। कई मामलों में किसानों और गरीब परिवारों से हजारों से लेकर लाखों रुपए तक की मांग की जाती है। यदि कोई व्यक्ति रिश्वत देने से इनकार करे, तो उसकी फाइल जानबूझकर लंबित रख दी जाती है।

प्रदेश के कई जिलों में पटवारियों के खिलाफ लगातार शिकायतें सामने आने के बावजूद कार्रवाई सीमित नजर आती है। यही कारण है कि लोगों के बीच यह धारणा बन चुकी है कि राजस्व विभाग भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा बन गया है।

आरोप : पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय ‘सौदेबाजी’ कर रही

पुलिस विभाग पर भी सवाल

कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगातार लगते रहे हैं। कई बार थानों में शिकायत दर्ज कराने, जांच प्रभावित करने या मामलों में समझौता कराने के नाम पर अवैध वसूली की शिकायतें सामने आती हैं।

जनता का आरोप है कि कई मामलों में पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय “सौदेबाजी” करती नजर आती है। यही कारण है कि आम लोगों का भरोसा कानून व्यवस्था पर कमजोर होता जा रहा है। हालांकि प्रदेश सरकार समय-समय पर पुलिस सुधारों की बात करती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता।

छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े अधिकारी तक सवालों के घेरे में :  प्रदेश में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां छोटे कर्मचारियों के पास करोड़ों रुपए की संपत्ति मिली। हाल ही में कई विभागों के चपरासियों, लिपिकों और निम्न कर्मचारियों के यहां छापेमारी में भारी नकदी और संपत्ति बरामद होने से लोग हैरान रह गए। यदि एक छोटे कर्मचारी के पास करोड़ों की संपत्ति मिलती है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि उच्च अधिकारियों की स्थिति क्या होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना ऊपर तक संरक्षण मिले इतना बड़ा भ्रष्टाचार संभव नहीं है।

लोकायुक्त कार्रवाई कर 

रहा, लेकिन डर खत्म

मध्यप्रदेश लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू लगातार भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं। लगभग हर सप्ताह किसी न किसी विभाग के अधिकारी या कर्मचारी के रिश्वत लेते पकड़े जाने की खबर सामने आती है। इसके बावजूद भ्रष्टाचार रुकने का नाम नहीं ले रहा।  विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भ्रष्टाचार के मामलों में सजा की प्रक्रिया बेहद धीमी है। कई अधिकारी वर्षों तक निलंबित रहते हैं, फिर बहाल होकर दोबारा उसी व्यवस्था में लौट आते हैं। कुछ मामलों में राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण के आरोप भी लगते हैं।

स्वास्थ्य विभाग में भी गंभीर आरोप

स्वास्थ्य विभाग, जिसे जनता की सेवा का सबसे संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है, वह भी भ्रष्टाचार के आरोपों से अछूता नहीं है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दवाइयों, जांचों और भर्ती तक के लिए परेशान किया जाता है। कई मामलों में डॉक्टरों और कर्मचारियों पर निजी अस्पतालों या जांच केंद्रों को लाभ पहुंचाने के आरोप लगे हैं। लोकायुक्त की कार्रवाई में कई डॉक्टर रिश्वत लेते पकड़े गए हैं। कहीं मेडिकल प्रमाण पत्र बनाने के नाम पर पैसा लिया गया, तो कहीं सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के एवज में घूस मांगी गई। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और अधिक खराब बताई जाती है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के बीच भ्रष्टाचार ने जनता की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

नगर निगम और पीडब्ल्यूडी में 

भी अनियमितताएं

नगर निगमों और नगरीय निकायों में भवन निर्माण अनुमति, नक्शा पास कराने, टैक्स निर्धारण और सफाई व्यवस्था से जुड़े कार्यों में भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हो चुकी हैं। कई शहरों में बिना रिश्वत दिए निर्माण अनुमति प्राप्त करना कठिन माना जाता है। इसी तरह लोक निर्माण विभाग (PWD) में सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों में गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगते हैं कि कमीशनखोरी के कारण घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग किया जाता है, जिससे सड़कें कुछ महीनों में ही खराब हो जाती हैं। ठेके देने से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की चर्चा आम है।

जनता की बढ़ती परेशानी... भ्रष्टाचार का सबसे अधिक असर आम जनता पर पड़ता है। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। किसान अपनी जमीन के रिकॉर्ड सुधारने के लिए परेशान हैं, मरीज अस्पतालों में भटक रहे हैं, व्यापारी नगर निगम और अन्य विभागों के चक्कर काट रहे हैं।  कई लोग मजबूरी में रिश्वत देते हैं, क्योंकि उन्हें समय पर काम चाहिए होता है। यही मजबूरी भ्रष्टाचार की व्यवस्था को और मजबूत करती जा रही है।

सरकार के सामने बड़ी चुनौती... प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार रोकने के लिए कई दावे करती रही है। ऑनलाइन सेवाएं शुरू करने, ई-गवर्नेंस लागू करने और पारदर्शिता बढ़ाने जैसे प्रयास किए गए हैं। कुछ विभागों में डिजिटल प्रक्रियाओं से भ्रष्टाचार कम भी हुआ है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती।  केवल तकनीक से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक जवाबदेही और कठोर दंड व्यवस्था जरूरी है। साथ ही शिकायतकर्ताओं को सुरक्षा और त्वरित न्याय मिलना भी आवश्यक है।

नियमों की नरमी से बढ़ रहे हौसले...  भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होने से घूसखोर अधिकारियों के हौसले लगातार बढ़ रहे हैं।   विभागीय जांच वर्षों तक चलती रहती है और अंततः मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। जब तक भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित सुनवाई और कठोर सजा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक स्थिति में सुधार संभव नहीं है। केवल ट्रांसफर या निलंबन जैसी कार्रवाई भ्रष्टाचार रोकने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।

कौन बचा भरोसे लायक?... ‘धरती के भगवान’ भी घूसखोरी करने लगे

बड़वानी में तीन डॉक्टर रिश्वत लेते पकड़ाए....। धरती के भगवान कहे जाने वाले ये डॉक्टर मरीजों को प्राइवेट लैब भेजकर 50 प्रतिशत कमीशन लेते थे। ऐसा लगता है कि इन डॉक्टरों ने फर्जी डिग्री लेकर ही डॉक्टरी शिक्षा प्राप्त की है, जिसके लिए इन्होंने रिश्वत दी होगी। यदि इनके माता-पिता ने इनकी बेईमानी में साथ दिया होगा तो उन्हें आज पश्चाताप तो ही रहा होगा कि जो रास्ता बच्चों को दिखाया गया, उसकी का यह नतीजा है...। और यदि ईमानदारी से बच्चों पर भरोसा किया होगा तो उन्हें आज बहुत अफसोस हो रहा होगा कि काश इन्हें डॉक्टर बनाने के लिए जी-तोड़ मेहनत नहीं करते? 

मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के राजपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में इंदौर लोकायुक्त की टीम ने गुरुवार को छापेमारी की। तीन डॉक्टरों को रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया। मरीजों को लैब भेजने के बदले 50% कमीशन लेते पकड़ाए हैं। आरोपियों में मेडिकल ऑफिसर डॉ. अमित शाक्य, डॉ. दिव्या साईं और संविदा चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनोहर गोदारा शामिल हैं। इंदौर लोकायुक्त की टीम ने ये कार्रवाई राजपुर स्थित सेवा पैथोलॉजी लैब के मैनेजर अदनान अली की शिकायत के बाद की है।

शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त को बताया कि अस्पताल के डॉक्टर मरीजों को जांच के लिए उनकी लैब में भेजते थे। इसके बदले कमीशन की मांग करते थे। शुरुआत में यह कमीशन 20 प्रतिशत तय था, लेकिन पिछले महीने तीनों डॉक्टरों ने मिलकर इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया।

अदनान अली के मुताबिक डॉक्टर्स ने जांच के एवज में मोटी रकम की मांग शुरू कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने मामले की शिकायत लोकायुक्त कार्यालय इंदौर में करने का फैसला लिया।

पिछले महीने मांगे थे हजारों रुपए

शिकायत में बताया गया कि पिछले महीने की जांच के एवज में डॉ. अमित शाक्य ने 18 हजार रुपए, डॉ. दिव्या साईं ने 8 हजार रुपए और डॉ. मनोहर गोदारा ने 21 हजार 800 रुपए कमीशन के रूप में मांगे थे। इस संबंध में अदनान अली ने 4 मई 2026 को विशेष पुलिस स्थापना, लोकायुक्त कार्यालय इंदौर के पुलिस अधीक्षक राजेश सहाय से औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। लोकायुक्त टीम ने शिकायत मिलने के बाद पूरे मामले का सत्यापन कराया। जांच में शिकायत सही पाए जाने के बाद ट्रैप कार्रवाई की योजना बनाई गई। इस दौरान आरोपी डॉक्टर कम राशि लेने पर सहमत हो गए। समझौते के अनुसार डॉ. अमित शाक्य 8 हजार रुपए, डॉ. दिव्या साईं 5 हजार रुपए और डॉ. मनोहर गोदारा 12 हजार रुपए लेने के लिए तैयार हुए। इसके बाद गुरुवार को लोकायुक्त इंदौर इकाई ने विशेष ट्रैप दल का गठन कर कार्रवाई को अंजाम दिया।

रिश्वत लेते ही दबोचे गए डॉक्टर : पहले से बिछाए गए जाल के तहत शिकायतकर्ता ने डॉक्टरों को रिश्वत की राशि सौंपी। जैसे ही तीनों डॉक्टरों ने रकम ली, लोकायुक्त टीम ने उन्हें रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। कार्रवाई के दौरान अस्पताल परिसर में हड़कंप मच गया।


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