इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी के चलते गई हुई मौतों पर हाहाकार मचा हुआ है। इसके साथ ही पूरे देश में इस दुखद घटना की चर्चा हो रही है। इस बीच एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। इसके अनुसार, शहर में जो त्रासदी हुई है वह भारत के कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (कैग) की साल 2019 की रिपोर्ट का नतीजा है। कैग ने इंदौर और भोपाल में नगर निगम द्वारा सप्लाई किए जा रहे पीने के पानी का परफॉर्मेंस ऑडिट किया था। उस रिपोर्ट में वही कमियां बताई गई थीं, जिनकी वजह से अब इंदौर में दूषित पानी पीने से 17 लोगों की मौत हो गई। बता दें कि ये 17 मौतें भागीरथपुरा इलाके में हुईं। वहीं, यहां से करीब 200 से ज्यादा लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। यहां जमीन के नीचे पानी की पाइपलाइन और उसके ठीक ऊपर सीवेज लाइन में लीकेज हो गया था। इससे पीने का पानी मल और गंदगी से दूषित हो गया। इस इस घटना के बाद लोगों में गुस्सा है।

एक तरफ घटना के बाद से लोगों में गुस्सा है। वहीं, एनजीओ के कैग की रिपोर्ट में हुए खुलासे के बाद सवाल उठ रहे हैं कि जब कैग ने सालों पहले चेतावनी दी थी, तो इंदौर नगर निगम और राज्य सरकार ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। दरअसल, कैग की रिपोर्ट में कहा गया था कि दोनों नगर निगमों में फिल्ट्रेशन प्लांट पर पानी की क्वालिटी और टैंकों से लोगों तक पहुंचने वाले पानी की क्वालिटी में बड़ा अंतर था। पाइपलाइन लीकेज पर नजर रखने के लिए लीकेज डिटेक्शन सेल की कमी भी एक बड़ी समस्या थी।

क्या था कैग की रिपोर्ट में

रिपोर्ट के अनुसार, पीने के पाइपलाइन लीकेज की मरम्मत में काफी देरी हुई। शिकायतों के बाद समाधान के कई मामलों में 22 दिन से लेकर 182 दिन तक का समया लगा रहे थे।। इसका कारण यह था कि सालाना कॉन्ट्रैक्ट की जगह हर बार अलग-अलग टेंडर निकाले जाते थे। सवाल उठता है कि जब समाधान में इतने दिन लगते थे तो लोगों की जान कैसे बचाई जा सकती थी। कैग ने बताया कि 2013 से 2018 के बीच 4,481 पानी के सैंपल खराब क्वालिटी (बीआईएस10500) के मानकों पर खरे नहीं उतरे। नगर निगमों ने इस पर क्या कार्रवाई की, यह साफ नहीं है। स्वतंत्र जांच में लिए गए 54 सैंपलों में से 10 गंदगी और मल कोलीफॉर्म के कारण खराब पाए गए।

रोका जा सकता था त्रासदी को

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जांच किए गए 45 ओवरहेड टैंकों में से 23 की नियमित सफाई नहीं हुई। साथ ही जरूरी गाद के सैंपल भी नहीं लिए गए। इंदौर नगर निगम बिना जांच के बोरवेल का पानी सप्लाई कर रहा था। जांच में कई बोरवेल सैंपलों में आयरन, नाइट्रेट, कैल्शियम और फीकल कोलीफॉर्म तय मानकों से ज्यादा पाए गए। कैग के अनुसार, ऐसे दूषित पानी से लिवर, दिल, पैंक्रियाज से जुड़ी बीमारियां, डायबिटीज, दस्त, उल्टी, पीलिया, टाइफाइड और किडनी स्टोन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।


Post a Comment

Previous Post Next Post