इंदौर। इन दिनों भीषण गर्मी पड़ रही है और गले को तर रखने के लिए लोग फलों का सहारा लेते हैं, कोई ज्यूस बनाकर पीता है तो कोई फ्रीज में उसे ठंडा होने के बाद खाता है, ताकि गर्मी से राहत मिले और स्वास्थ्य भी अनुकूल रहे। महंगाई के कारण फलों के भाव भी काफी महंगे हो गए हैं..., फिर भी लोग अच्छी सेहत के लिए महंगे दाम भी दे रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें मुफ्त में धीमा जहर दिया जा रहा है।
हां, ये बात सच है कि रुपयों के लालच में किसान फलों को जल्द बड़ा करने के लिए ऑक्सीटोसिन नामक इंजेक्शन लगा रहे हैं, जिससे फल जल्द बड़ा हो जाता है। किसान उसे समय से पहले बड़ा कर बाजार में बेच रहे हैं, और यह इंजेक्शन लगे फल हमारी सेहत बिगाड़ ही रहे हैं। एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें किसान मजदूरों और परिवार के साथ खेत में लगे खरबूजों को आक्सीटोसिन इंजेक्शन लगा रहा है। वीडियो बनाने वाला युवक सख्त लहजे में पूछ रहा है कि ये आप क्या कर रहे हो तो किसान का जवाब है कि कीड़ा मारने की दवाई लगा रहे हैं, जबकि वीडियो बनाने वाले युवक बार-बार कह रहा है कि कीड़ा मारने के लिए स्प्रे से दवाई छिड़की जाती है, न कि इंजेक्शन लगाया जाता है, लेकिन किसान मानने को तैयार नहीं है और बार-बार युवकों को खेत से बाहर जाने के लिए कह रहा है। युवक जब कहता है कि डायल 100 को खबर करता हूं, इसके बाद सारी हेकड़ी निकल जाएगी, इसके बाद भी किसान नहीं मान रहा है। इसके बाद किसान के साथ काम करने वाले मजदूर कहते है कि हां फलों को बड़ा करने के लिए इंजेक्शन लगा रहे हैं..., तो समझा जा सकता है कि किस तरह मानव जीवन के लिए ये लोग खतरा बन गए हैं। ये वीडियो बिहार या यूपी का हो सकता है, क्योंकि जिस देहाती बोेली का उपयोग किया जा रहा है, उससे यह प्रतीत होता है।
खैर ये अकेले उत्तर प्रदेश या बिहार की समस्या नहीं है, पूरे देश की यह समस्या है। रुपयों का लालच लोगों को इस कदर नीचे गिरा रहा है कि वह लोगों की जान की भी परवाह नहीं कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि किसान इस फल को नहीं खाता होगा, उसके बच्चे और परिवार भी खाते होंगे, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।
गाय-भैंसों को भी दूध के लिए लगाते हैं इंजेक्शन
आपको बता दे कि सब्जियों का पोषण करने के लिए भी ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जा रहा है। खासकर लौकी के छोटे से फल में इस इंजेक्शन को लगा दिया जाता है, तो वह सुबह तक बड़ी हो जाती है। इसी तरह तुरई, कद्दू, कटहल, तरबूज, खरबूज के साथ-साथ कई हरी सब्जियों में इस इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाने लगा है। अभी तक इस ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का इस्तेमाल भैंस व गाय का ज्यादा दूध लेने के लिए किया जाता था, लेकिन इससे मवेशी के स्वास्थ्य तक खराब हो जाता है। चूंकि दुधारू मवेशी बेजुबान होते हैं, इसलिए ऑक्सीटोसिन के दर्द को बयां नहीं कर सकते और किसान यही समझता है कि इससे दूध उत्पादन बढ़ रहा है।अब यही इंजेक्शन सब्जी व फलों में लगाया जाने लगा है। यही कारण है कि सरकार ने इसकी बिक्री पर प्रतिबंध भी लगा रखा है, लेकिन गांव की हर किराने की दुकान पर ऑक्सीटोसिन आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
ऐसे हालात हो चुके हैं
शहर में कुछ फल, खासकर केला, पपीता, अमरूद और आम इसी तरह पकाए जा रहे हैं और पूरे शहर में बेचे जा रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि टहनियों और फलों में इंजेक्शन लगाकर सबसे पहले इनका साइज बढ़ाया जा रहा है। 15 दिन में आकार लेने वाला फल इन इंजेक्शनों से तीन-चार दिन में पूरे साइज का हो रहा है, तब इसे कच्चा ही तोड़ा जा रहा है। इसके बाद कारोबारी इसे केमिकल से पकाकर बाजार में उतार रहे हैं। बड़ी फल मंडियों से जितने भी इस तरह के फल बाजार में बेचे जा रहे हैं, ज्यादातर इसी तरह पकाए जा रहे हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि अंगूर की लच्छियां भी कच्ची तोड़कर उन्हें इसी तरह से पकाया जाने लगा है।
प्राकृतिक रूप से फल बड़े होने का नहीं करते इंतजार
ज्यादातर राज्यों में फल लगाने वाले किसान फलों के प्राकृतिक तौर पर बड़े होने का इंतजार ही नहीं कर रहे हैं। जैसे ही फसल आती है, इंजेक्शन तथा अन्य तरीकों का इस्तेमाल शुरू हो जाता है। प्राकृतिक तौर पर महीने-डेढ़ महीने में पूरा आकार लेने वाले फल इंजेक्शनों और दवाइयों से तीन-चार दिन में ही पूरे साइज के हो रहे हैं। साइज बढ़ने के बावजूद ये कच्चे रहते हैं, उसी समय इन्हें तोड़ा जा रहा है। कच्चे फलों का ट्रांसपोर्टेशन आसान है और खराब होने का खतरा नहीं रहता। इन फलों को केमिकल से भरे बर्तन में डूबाया जाता है, वहीं कार्बाइट से भी फलों को पकाया जाता है। कार्बाइड शरीर के लिए सौ फीसदी नुकसानदेह है।
टेगपोन प्रतिबंधित केमिकल का हो रहा इस्तेमाल
टेगपोन प्रतिबंधित केमिकल है। इसके उपयोग से पेट की बीमारी, पांचन तंत्र में गड़बड़ी, लीवर, स्किन तथा कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी की आशंका है, जिसका इस्तेमाल फलों को पकाने में किया जा रहा है। स्वास्थ्य और खाद्य विभाग मौसमी बनकर रह गया है। उन्हें सिर्फ नकली और अमानक मावा पकड़ना ही आता है और वह भी राखी, दीवाली के दौरान, अन्यथा यह विभाग सिर्फ घोड़े बेचकर सोता रहता है और अभी वैसे भी गर्मी का सीजन है तो कूलर और एसी वाले दफ्तर से बाहर निकलने की हिमाकत तो अफसर कर ही नहीं सकते..., और जनता है कि गर्मी से बचने के लिए फल रूपी धीमे जहर को खाते जा रही है, जिससे स्वास्थ्य विभाग और खाद्य विभाग के अफसरों को कोई सरोकार नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये अफसर भी ऐसे फलों को खाने से बचे होंगे, इन्हें भी यह धीमा जहर गटकना ही पड़ रहा है।
इंदौर में फलवालों पर कभी नहीं होती कार्रवाई
हम इंदौर की ही बात करें तो शायद ही कभी किसी फल वाले व्यापारियों के यहां कोई कार्रवाई हुई होगी। शहरभर में कई गोदाम है, जहां फलों को एक ही रात में पकाकर बेचने लायक बना दिया जाता है। इंदौर में केला बुरहानपुर की तरफ से और महाराष्ट्र तरफ से आता है। बुरहानपुर से तो एक ही दिन में ये इंदौर आ जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के दूर-दराज क्षेत्रों से इसे आने में समय लगता है। जानकार बताते हैं कि खेत में जब केली का घड़ काटा जाता है, तभी उसे केमिकल से भरे ड्रम में डूबोकर प्लास्टिक की पन्नियों से पैक कर कैरेट में रखा जाता है, उसके बाद यह शहर के गोदामा तक पहुंचता है, जब तक इसे पकाया नहीं जाएगा, तब तक यह कच्चा ही रहता है। ऐसे ही स्थिति पपीते और आम की भी है। हम जब पके हुए फल खरीदकर घर लाते हैं और उसी दिन अगर उसका उपयोग नहीं किया तो अगल दिन केला-पपीते और आम में काले-काले दाग पड़ने लग जाते हैं और उनमें से अजीब से बदबू आने लग जाती है। बदबू आने का कारण ही केमिकल है।
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