बेटी की शादी हो जाए तो उसके पारिवारिक जीवन में पूछताछ करना गलत
गोपाल झुनझुने @ जवाबदेही
इंदौर। मां-बेटी का रिश्ता ही कुछ अजीब है। एक दोस्त की तरह मां बेटी का साथ देती है। उसके हर सुख-दुख का ख्याल रखती है। मां बच्चों के लिए एक अच्छा गुरु होती हैं, जो उसे सामाजिक अच्छाइयों और बुराइयों का पाठ पढ़ाती है और बच्चे मां की अच्छाइयों को अपने जीवन में उतार लेते हैं। लेकिन मां की जिम्मेदारी तब तक ठीक रहना चाहिए, जब तक उसकी बेटी अपने घर में है, अर्थात मां के घर में। जब बेटी की शादी हो जाए तो बेटी के पारिवारिक जीवन में ज्यादा पूछपरख नहीं करना चाहिए, क्योंकि एक मां का बेटी की ससुराल में दखल देना बेटी को ससुराल से बेदखल कर देता है।
इस अंक में जवाबदेही उस मुद्दे पर अपनी बात रख रहा है, जिसकी वजह से कई लड़कियों के घर बर्बाद हो रहे हैं। इसके पीछे का कारण सिर्फ एक ही निकलकर आ रहा है कि बेटी की ससुराल में बेटी की मां का ज्यादा दखल देना है।
मां बेटी का रिश्ता बेहद प्यारा होता है। हर मां अपनी बेटी के विवाह के सपने देखती है। हर मां चाहती है कि उसकी बेटी शादी के बाद अपनी ससुराल में हर तरह से सुखी रहे। हर माता-पिता इसी उम्मीद से अपनी बेटी का विवाह करते हैं और आशीष देते हैं कि वह हमेशा खुश रहे. लेकिन, कई बार कुछ ज्यादा खुशी देने के चक्कर में बात बिगड़ भी जाती है। कुछ मां इस आशा में कि उन की बेटी को वह सब मिले जिसकी वह हकदार है, शादीशुदा बेटी की गृहस्थी में दखल देने लग पड़ती है।
वह यह नहीं समझ पाती कि उनकी बेटी अभी-अभी शादी कर के गई है। उसे नए घर में, नए परिवार के साथ बसने के लिए कुछ समय लगेगा। ठीक वैसे ही जैसे नए परिवार को भी उसे पूर्णतया अपनाने हेतु थोड़ा समय देना होगा। वहीं, ऐसी माताएं अपना वक्त भूल जाती हैं कि उन्हें भी तो कई वर्ष लग गए अपनी गृहस्थी की बागडोर को पूरी तरह से संभालने में...लेकिन बेटी की तरफ से जरा-सी भी बात बताई गई कि मम्मी मेरे सास ने आज कहा कि चाय ठीक नहीं बनाई...तो उधर से मां का जवाब बेटी को समझाने की बजाए, उकसाने वाला होता है..., बोल देना...अपने हाथ से बना लिया करो..। बस इन्हीं छोटी-छोटी बातों से शुरू होने वाले विवाद तलाक तक पहुंच रहे हैं।
विवाद, जिसे तूल दिया जाता है
जब नई-नई बहू घर आती है तो करीब एक महीने तक सब कुछ सामान्य सा रहता है। शादियों के सीजन में ब्याह होता है, ऐसे में दोनों परिवारों के रिश्तेदारों के यहां भी शादी रहती है, ऐसे में दोनों परिवार एक-दूसरे के रिश्तेदारों के यहां पहुंचते हैं, साथ में भोजन करते हैं। इस दौरान मां की खास नजर रहती है, बच्ची को दिए हुए गहने, साड़ियां और शृंगार की वस्तुओं पर.....। अगर कोई कोर-कसर रह गई तो इसके लिए बेचारी सास बेवजह दोषी साबित कर दी जाती है। (उदाहरण : मां का बेटी से संवाद - क्यों तूने वो साड़ी और वो हार नहीं पहना..., इस पर बेटी का जवाब.., नहीं, वो मम्मी (सास) ने कहा ये अच्छा लगेगा, इसलिए यह पहन लिया...(इधर मां - जानकर तेरी सास ने तेरे को पहनने नहीं दिया...) हो गई शुरुआत ससुराल में विवाद की...। उस बहू के मन में सास के प्रति तब तक कोई नाराजगी नहीं थी, लेकिन आज उसके मन में सास के प्रति शंका-कुशंका के सवाल उसकी मां ने डाल दिए।
बात छोटी है, पर गंभीर...
लगभग ऐसा होता ही है कि बहू अगर कोई साड़ी या जेवर पहनती है तो या तो पति को बताएगी या फिर अपनी सास या ननद को...। सास, जो कि समाज में बहू को कहीं ले जा रही है तो वह खास ध्यान रखेगी, कि उसकी बहू का पहनावा ठीकठाक हो... और अगर इस दौरान सास ने कहा नहीं, मैं जो साड़ी लाई थी, वो पहन...(तो...बहू का शक और गहरा जाता है) कि उसकी मां जो कह रही थी, कि तेरी सास जानकर करती है..., तो वह इस बात को सच्चा मान लेती है...। और उसके मन में सास के प्रति नफरत बढ़ने लग जाती है...।
मायके जाने की धमकी
सास, ननद अगर किसी बात को लेकर टोका-टाकी करती हैं तो उसकी भी शिकायत फोन पर अपनी मां व अन्य परिजनों से करती हैं। इसे लेकर मायके पक्ष के लोग खासतौर पर मां की भूमिका अहम रहती है और वह हस्तक्षेप करना शुरू कर देती है। वहीं दूसरी ओर इन मामलों में पति की शिकायत यह रहती है कि पत्नी एक-एक बात अपनी मां को बताती हैं, ऐसे में सासु मां अपनी बेटी को समझाने के बजाय उसे शह दे देती हैं और वह मायके का सपोर्ट मिलने पर जरासी अनबन होने पर वह मायके जाने की धमकी देती हैं। दूसरी ओर मां-बाप भी हां आजा, क्या हमारे घर पर नहीं है खाने के लिए...। बस यहीं से गृहस्थी बिगड़ने की शुरुआत होने लगती है।
तकरार ...
गहने किसी भी बहाने से सास से लेकर अपने पास रख
इसी तरह गहने को लेकर भी तकरार बेटी की मां ही ससुराल में करवाती आ रही है..., वर्तमान में जेवर बनवाना काफी महंगा होता है.., उस पर चोरी या खो जाने का डर...। नई-नई बहू होती है, तब तक ठीक रहता है। इसके बाद सास बहू को कहती है कि जेवर को अब लॉकर में रख देते हैं। वह अपनी तिजोरी में जेवर रख लेती है...। (ये बात लड़की की मां को अच्छी नहीं लगती), वो बेटी को ज्ञान देने लगती है। बेटा जेवर तो तेरे है, हमने जो अलमारी तुझे दी थी, उसमें रखा कर। तेरे गहनों पर तेरा ही हक है। उनसे अपने गहने वापस मांग, किसी भी बहाने से सही और फिर अपने पास रख ले। बेटी भी नासमझी में मां के बताए रास्ते पर चलती है और सास से जेवर ले लेती है और इस बात पर अनबन शुरू हो जाती है, क्योंकि सास को भी लगने लगता है कि बहू उस पर विश्वास नहीं करती..। जबकि सास गहने इसलिए अपने पास रखती है, क्योंकि वह जानती है कि बहू अभी गहनों के प्रति इतनी समझदार नहीं हैं.. और इधर-उधर रख देगी तो नुकसान का उसे डर सताता है। बस यही वजह रहती है कि वो जेवर अपने पास रखती है, क्योंकि सास को उसके अपने पति की भी बात माननी है, ताकि गृहस्थी ठीक से चलती रहे। बस इन कारणों से वह बहू से जेवर लेकर अपने पास रखती है..., जिसे बहू की मां गलत समझती है.., (भले ही वो अपने घर में इसी सास जैसा बर्ताव करती हो, लेकिन बेटी के घर में वैसा नहीं होने देना चाहती)। इसी तरह ससुराल की हर एक बात, मां के घर पहुंचाने की आदत आजकल की बहुओं में कुछ ज्यादा ही हो गई है। और इन सबका गुनहगार है मोबाइल...। इस यंत्र ने कई गृहस्थियों को तोड़ दिया है..., कई लोगों को मौत की नींद सुला चुका है...., कई परिवारों में कलह करा चुका है... और करा रहा है..। मां का प्यार बेटी के प्रति ससुराल जाने के बाद इतना उमड़ने लगा है कि बेटी के सुबह जागने से लेकर सोने तक की हर बात उसे पता रहनी चाहिए...। ...और हां बातों की शुरुआत तब होती है, जब घर के कामकाजी लोग दफ्तर निकल जाते हैं।
समस्या
परिवार छोटा होना भी विवाद का कारण
आजकल जो दौर चल रहा है हम दो हमारे दो का वह समाज के लिए काफी खतरनाक है। कई परिवारों में एक लड़का और एक ही लड़की है। दो बच्चों के बाद तीसरे बच्चे के लिए करीब-करीब कोई परिवार सोच ही नहीं रहा है। इसके पीछे का कारण बच्चों की अच्छी परवरिश को भी बताया जाता है। और मां-बाप बच्चों की पढ़ाई की तरफ भी ध्यान दे रहे हैं..., लेकिन इन बच्चों की शादियां हो जाने के बाद इनकी गृहस्थी ठीक से चले, इस ओर ध्यान न देकर सास ने क्या बोला, ननद क्या बोल रही थी, देवर-जेठ तो कुछ नहीं बोलते, जेठानी आराम तो नहीं फरमाती जैसे बेफिजूल की बातें करते हैं और रिश्ते मजबूत होने की बजाए कमजोर होते चले जा रहे हैं। अब परिवार छोटा होना विवाद का कारण कैसे बनता है..., एक बेटा एक ही बेटी है तो उस परिवार को बेटी को पास में रखने से कोई दिक्कत नहीं होती, क्योंकि बेटी को इतना पढ़ा-लिखा दिया जाता है (अच्छी बात है) कि वह कहीं भी नौकरी कर 20-25 हजार रुपए महीना कमा ही लेती है..., इस वजह से मां-बाप को उसकी शादीशुदा जिंदगी बिगड़ रही है तो उससे कोई सरोकार नहीं रहता...बस आजा तू तो यहां सब निपट लेंगे...और बेटी ससुराल में समझौता नहीं कर मां-बाप के कहने पर ससुराल छोड़कर अपनी गृहस्थी में खुद आग लगाकर मां-बाप के यहां चली जाती है..। मामले में शिकायत..., दहेज प्रताड़ना, या घरेलू हिंसा या पति नपूंसक है या फिर, अप्राकृतिक सेक्स करता है, जैसे कई आरोप लगाकर ससुराल की बदनामी और उस घर को पूरी तरह बर्बाद कर देते हैं।
मोबाइल फोन से शुरू होती कलह....
इस बात को भी जान लेते हैं
.... दोपहर के 12 या एक बजे नहीं कि मां को बेटी के फोन का इंतजार रहता है... या फिर बेटी को मां के फोन आने का इंतजार...। (शादी के शुरुआत में तो ससुराल में सास खुद कहती है कि बेटा अपनी मां, पिता और भाई से बात कर लिया कर..., क्योंकि शुरू-शुरू में बहू मान-मर्यादा समझकर अपने मां-बाप को जल्दी फोन नहीं लगाती है) लेकिन शादी के कुछ महीनों या हफ्तों ही कह लो चलेगा, दिनभर बतियाना शुरू हो जाती है...।
हां, तो फोन आने का रहता है इंतजार... यहां से हम अपनी बात कह रहे थे। बेटी और मां बिल्कुल घड़ी के कांटे पर नजर रखते हैं...और जैसा ही फोन बजा...बहू तड़ाक से बोल देती है...अभी-अभी मैंने मम्मी को याद किया था...और फोन धीरे से पहले सास को पकड़ा देती है.... (दोनों समधन में जयश्रीकृष्ण हुई) कि इससे बाद सास ही बोेल देती है, ले बात कर ले मम्मी से...और तपाक से मोबाइल लेकर बात करते-करते बहू अपने कमरे में चली जाती है...,ताकि सास मां-बेटी की बात न सुन सके।
मां उधर से बोलती है, बन गया खाना, जवाब हां..और गए सब ड्यूटी पर, जवाब हां.., फिर तून सुबह कुछ खाया या नहीं..., (अगर बेटी ने हां बोला तो ठीक, ना बोला तो...) अपना खयाल रखा कर, तू घर पर भी तो सुबह-सुबह खा लेती थी...., क्या तेरी सास मना करती है (यहां सास को दोषी बनाना जरूरी है...!) बेटी भले ही मां की बात पर सहमति ना दे, लेकिन सास के प्रति उकसाने का बेटी की मां कोई मौका नहीं छोड़ती। कपड़े धो लिए..., तेरे और तेरे पति के धो लिया कर.., तेरी सास धो लेगी तेरे ससुर के कपड़े और ननद के। दोपहर में सो जाया कर। शाम का खाना तेरी सास या ननद को बनाने के लिए कहा कर या मदद करने के लिए कहा कर..., बर्तन धोने के लिए भी कहा कर। यहां तक भी मन नहीं भरता है तो बोल ही देती है...जंवाई ठीक रहता है तेरे साथ..., समय पर तो घर आता है... पी कर तो नहीं आता.., गुस्सा तो नहीं करता न जाने ऐसे कितने ही फालतू सवाल करके बेटी को इन सवालों के पीछे भागने पर मजबूर कर देती है बेटी की मां...। उतना ही किया कर जितना तेरे से होता हो...।
न चाहते हुए भी बेटी को मां को ही अपना आदर्श मान लेती है और अपने ससुराल में विलेन की भूमिका निभाने लग जाती है और ससुराल की पल-पल की खबरें अपनी मां तक पहुंचाने लग जाती है। सास को बहू के फोन पर लगे होने पर समझ में आ जाता है कि ये ससुराल की बातें मायके में बताती है। कुछ दिन तो वह नहीं बोलती, क्योंकि उसे अपने बेटे की गृहस्थी की चिंता रहती है..., और अगर उस सास की भी सास घर में हो तो उसके लिए तो दोहरी चिंता रहती है, कि उसकी सास उसे क्या कहेगी कि एक बहू तेरे से नहीं संभलती...!
एक कारण यह भी शहर में ही हो रिश्ता तो बेहतर
पहले जब आवागमन के साधनों की उपलब्धता कम रहती थी, तब भी लोग अपने शहर में बेटी की शादी न करके दुरस्थ शहरों या गांवों में करते थे। वर्तमान में वाहनों की व्यवस्था होने के बावजूद लोग अब जिस शहर में रहते हैं, उनकी कोशिश रहती है कि रिश्ता उसी शहर में हो जाए। एक ही लड़की है, कभी भी उससे मिलने जाया जा सकता है। कुछ ये कारण भी लड़की का घर बिगाड़ने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। इसके पीछे का कारण भी है कि दोनों परिवार महीने-दो महीने में एक दूसरे को भोजन का निमंत्रण देते हैं। लगभग बेटी का ससुराल पक्ष बार-बार बहू के घर जाकर भोजन करना उचित नहीं समझता। दूसरी तरफ अगर ससुराल वाले बहू के माता-पिता को भी इसी तरह आमंत्रित करते रहते हैं, तो ये उन्हें भी अच्छा नहीं लगता....। बात दोनों घरों की है, अगर दोनों में से एक एक परिवार ने आमंत्रण स्वीकार नहीं किया तो विवाद की शुरुआत हो जाती है...। इसके अलावा बहू संडे-के संडे मायके जाने की जिद करने लग जाती है, जो पति और ससुराल वालों को भी पसंद नहीं हैं। उधर, लड़की की मां को ज्यादा आपत्ति रहती है कि दामाद बेटी को छोड़ने नहीं आता या छोड़ जाता है तो लेने नहीं आता.... और इन छोटी-छोटी बातों पर विवाद कर बेटी का घर बिगाड़ने की भी शुरुआत हो जाती है।
रिश्तों को बनाए मजबूत, बेटी का घर बसने दें
किसी जमाने में माता-पिता बच्चों की शादी कर देने के बाद कहते थे कि चलो अब गंगा नहा लिये, यानि परिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए, लेकिन आजकल बच्चों की शादी के बाद उनकी जिम्मेदारियां कम होने के बजाय बढ जाती हैं। अधिकतर बहू बेटे नौकरी करतें हैं और इस कारण घर का बहुत सा काम सास और बाहर का काम ससुर को करना पड़ता है। पोते-पोतियों की भी देखभाल करनी पड़ती है। इन जिम्मेदारियों को वो खुशी खुशी निभा लेते हैं, परंतु जब किसी कारण बेटे और बहू मेंे ही अनबन रहने लगती है या बेटी ससुराल से लड़-झगड़कर उनके पास आ जाती है तो वो टूटने लगते हैं।
जीवनभर थाने या कचहरी का मुंह भी ना देखने वाले बहुत से बुजुर्ग माता-पिता को बेटे या बेटी से जुड़े दहेज या तलाक के केस में पुलिस थाने और कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं। देखने मे आता है कि बहुत से मामलों मे ससुराल या मायके वालों की झूठी शान या गरूर नवविवाहित जोड़े मे आपसी मनमुटाव का कारण बनता है और दोनो परिवारों की सुख शान्ति को ग्रहण लग जाता है। अधिकतर मामलों मे मायके वालों का केवल अपने आप को ही लड़की का सच्चा हितैषी मान उसके ससुराल की हर बात में मे दखलअंदाजी करना ही झगड़े का कारण बनता है।
परिवार या घर पत्नी के दम पर ही चलता है चाहे वो नौकरी भी क्यों न करती हो। घर का रख रखाव, बच्चों की देख भाल और खाना पकाना आदमी के बलबूते से बाहर की बात है। शायद इसी लिए पत्नी को गृहलक्ष्मी का दर्जा दिया गया है।
एक कहावत है कि स्त्री सूई के नोक से घर को बना या गिरा सकती है जो कि जीवन की सच्चाई है।
अपवाद के रूप मे कुछ लड़कियां शादी के बाद माता पिता के बहकावे मे आ केवल अपने हक का ही ध्यान रख अपने फर्ज को भूल जाती है। अभी तक तो लड़कियों को ही शादी के बाद पति के घर आना पड़ता है। इसलिये नये माहौल मे अपने को ढालने की जिम्मेदारी भी लड़की की बनती है, परंतु इसके लिये पति और ससुराल के सदस्यों का सहयोग का होना भी बहुत आवश्यक है।
बेटे का घर बसाने का जतन
सब माता-पिता अपने बेटे की शादी उसके घर बसाने के ही लिये करतें हैं और बहुत अधिक मामलों मे उसका घर बस जाता है। शादी के एक दो साल तक तो पति पत्नी को कुछ समय के लिये भी एक दूसरे से मजबूरी में दूर रहना भी खलता है। इसका करण कुदरती तौर मे आपस मे प्यार और लगाव का पनपना ही होता है। ऐसे मेंे यदि कोई लड़की बात बात पर रूठ कर मायके चली जाये तो उसके माता पिता का फर्ज बनता है कि वो उसे समझायें ना की भड़काएँ, क्योंकि अधिकतर मामलों मे समय के साथ छोटी मोटी गलतफहमियां अपने आप ही दूर हो जाती हैं। ससुराल मे लड़की को कौन सी कमियां का सामना करना पड सकता है। ऐसी बातें लड़की के माता पिता को शादी तय होने से पहले देखनी चाहिये। बाद मेंे विवाद पैदा कर लड़के या उसके घर वालों को कोसना लड़की के वैवाहिक जीवन को नुकसान ही पहुंचाता है। नयी पीढी के लड़के-लड़कियों मे किताबी ज्ञान तो बहुत अधिक है, परन्तु व्यावहारिक ज्ञान का अभाव भी है।
कुछ कारण
लड़की के पिता का लालची होना और बेटी की शादी को भी कमाई का जरिया बनाना समाज में आ रही गिरावट को दिखाता है।
...तो रिश्ता टूटना तय
वहीं, मायके वाले लड़की को कुछ अधिक लाड़ प्यार दिखा उसके वैवाहिक जीवन को ही खत्म करने पर अामादा दिखते हैं। लड़की सास से लड़े, ननदों से लड़े या किसी और से तो किसी प्रकार निभ जाएगी, परंतु यदि उसके दिल में अपने पति के प्रति अपनत्व और लगाव की भावना ही पैदा नहीं होगी तो शादी का देर सबेर टूटना तय है। सबसे बड़े दुख की बात यह है कि आज अगर लड़की ससुराल वालों या पति से लड़-झगड़ कर मायके आ बैठती है तो अधिकतर मामलों मे उसके माता पिता उसे समझाने की बजाय बदला लेने की नियत से ससुराल वालों पर सच्ची या झूठी दहेज और घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज करा लड़के के साथ अपनी लड़की का जीवन भी बर्बाद कर देते हैं....।
ससुराल को जल्द अपना लेगी
बेटी को ससुराल भेजने से पहले उसे दे अच्छी सीख
हर मां को ससुराल जाने से पहले अपनी बेटी को कुछ अच्छी सीख देनी चाहिए, जिससे वह आसानी से ससुराल में सामंजस्य बिठा सके और अपनी जगह बना सके। अगर आपको अपनी बेटी की भावी जिंदगी सुखद बनानी है तो उसे अच्छी सीख दें। जवाबदेही यह सुझाव इसलिए दे रहा है कि बेटियां करीब-करीब 21 से 24 या 25 साल तक मां-बाप के घर रह लेती है। इस दौरान उसके भाई की भी शादी लगभग हो जाती है, अगर बड़ा है तो.., लड़की को मां-बाप के घर में हुकूमत चलाने की आदत पड़ जाती है...और वह इसी तरह की हुकूमत ससुराल जाकर चलाने लगती है, जो गलत हैं.., क्योंकि जब तक ससुराल में उसकी सास और ससुर है, तब तक उसे उस घर की जिम्मेदारी नहीं मिल सकती। जिम्मेदारी जल्द भी मिल जाती है, लेकिन तब, जब बहू उस घर को पूरी तरह अपना समझ लें और मायका पक्ष की न सोचकर ससुराल ही मेरा अपना है तब।
1 सभी की आदतों को समझना : जिस तरह मायके में सबकी आदत अलग-अलग होती है, ठीक ससुराल में भी ऐसा ही होता है। सभी की पसंद-नापसंद भी अलग होती है। ऐसे में बेटी को समझाए कि कि वह कुछ समय सबके व्यवहार समझे। उनकी भावनाओं की कद्र करे। उसे बताएं कि इस दौरान पति को सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है। वही उसका हमसफर जो है...।
2 ससुराल के तौर-तरीकों को अपनाना- मायके और ससुराल के रहन-सहन के तौर-तरीके काफी अलग होते हैं। ऐसे में अपनी बेटी को वहां के तौर-तरीकों को समझने और अपनाने की सलाह दें। इससे वह जल्द ही पूरे परिवार की करीबी बन जाएगी।
3. बहुत जल्दी किसी के प्रति राय न बनाना- घर में हर सदस्य का स्वभाव अलग होता है। अगर कोई आपसे थोड़ा रूखा व्यवहार कर रहा है तो जरूरी नहीं कि वह ऐसा ही है। थोड़ा वक्त दें, क्या पता वह अभी किसी वजह से परेशान हो।
4. खुशी-खुशी सबकी मदद करना- घर के किसी सदस्य को अगर आपकी मदद की जरूरत हो तो खुशी से उसकी मदद करें। इससे सभी उससे अपनी परेशानी साझा करने लगेंगे।
5. भूलकर भी ससुराल की तुलना मायके से न करना- ससुराल की कुछ बातें आपको अच्छी लगेंगी तो कुछ बुरी। कुछ कम लगेगा, तो कुछ ज्यादा, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि ससुराल की हर बात बुरी है। इसलिए मायके से ससुराल की तुलना या किसी तरह की बुराई न करें। शांति व विवेक से काम लें।
6. सबका आदर करना- घर में सबका आदर करना चाहिए। यह आदर भाव ही आपकी बेटी को उसकी ससुराल में प्यार का हकदार बनाएगा।
7. सबसे स्नेह का भाव रखना- घर में सबसे स्नेह की भावना रखनी चाहिए। आखिर इन्हीं लोगों के साथ आपको जिंदगी बितानी है। यह बात अपनी बेटी को जरूर सिखाएं।
8. ससुराल की सारी बातें मायके में न बताना- ससुराल की कोई बात अच्छी लगे या बुरी, मायके में न बताए। इससे आपके ससुराल और मायके वाले लोगों के संबंध बिगड़ सकते हैं। अब यह आपकी बेटी पर निर्भर करता है कि वह कैसे मैनेज करती है।
9. मीठे बोल बोलना- प्यार के दो बोल आपकी बेटी को घर भर के करीब ला देंगे। इसलिए अपनी बेटी को यह प्यार भरी सीख जरूर दें।
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