उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री ने डॉक्टरों से मरीजों के लिए दवाइयों और जांचों के नाम हिंदी या देवनागरी लिपि में लिखने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इससे मरीजों को यह समझने में आसानी होगी कि उन्हें कौन सी दवा दी गई है और कौन सी जांच करानी है।

उन्होंने डॉक्टरों के नाम दो पन्नों का हस्तलिखित पत्र जारी किया और इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी साझा किया। पत्र में हिंदी के साथ क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया है।

अपनी अपील में उन्होंने कहा कि डॉक्टर यदि मरीजों से उनकी मातृभाषा भोजपुरी या अवधी में संवाद करें, तो चिकित्सकीय सलाह को समझने में उन्हें और अधिक आसानी हो सकती है। उन्होंने इसे मरीजों के हित में उपयोगी कदम बताया।

पत्र की शुरुआत उन्होंने “राष्ट्र नायकों की अभिलाषा, चले देश में देशज भाषा” पंक्ति से की। इसके बाद डॉक्टरों से आग्रह किया कि दवाओं और जांचों के नाम हिंदी या देवनागरी में लिखे जाएं, ताकि मरीज को अपनी दवा की जानकारी स्पष्ट रूप से मिल सके।

उन्होंने यह भी कहा कि व्यक्तिगत तौर पर वे ऐसी दवाओं को प्राथमिकता देंगे, जिनके नाम हिंदी में लिखे होंगे। साथ ही हिंदी का इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों को सम्मानित करने की बात भी पत्र में कही गई है।

उन्होंने पत्र में लिखा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर भारतीय भाषाओं, खासकर हिंदी के अधिक इस्तेमाल का संकल्प लिया जा सकता है। उन्होंने डॉक्टरों से चिकित्सा क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने का आग्रह किया।

पत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विदेशों में हिंदी और भारतीय भाषाओं में संवाद करने का भी उल्लेख किया गया है। उन्होंने कहा कि डॉक्टर भी भारतीय भाषाओं के माध्यम से मरीजों से संवाद करें, ताकि चिकित्सकीय जानकारी उन्हें बेहतर तरीके से समझ आ सके।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अपील उपमुख्यमंत्री या चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तथा चिकित्सा शिक्षा मंत्री के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक भारतीय नागरिक के रूप में भी है। उनके मुताबिक यह विचार उन्हें पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 22 अप्रैल 1963 को पांचजन्य में प्रकाशित एक लेख को पढ़ने के बाद आया।

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