ईरान के साथ जारी संघर्ष को इजराइल शुरुआत में उसके परमाणु कार्यक्रम और सत्ता व्यवस्था के खिलाफ निर्णायक मोड़ तक ले जाना चाहता था, लेकिन अब इसके अंत की दिशा इजराइल नहीं बल्कि अमेरिकी पहल तय करती दिखाई दे रही है। अमेरिकी मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार शाम इजराइली प्रधानमंत्री से फोन पर बातचीत कर स्पष्ट संकेत दिया कि ईरान के साथ समझौता जल्द ही अंतिम रूप लेने वाला है और अब युद्ध समाप्त करने का समय आ गया है।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप ने बातचीत के दौरान कहा कि समझौते की रूपरेखा तय हो चुकी है और यह एक मजबूत तथा महत्वपूर्ण डील साबित हो सकती है। बताया जा रहा है कि जब इजराइल ने यह सैन्य अभियान शुरू किया था, तब उसकी सोच कुछ अलग थी। इजराइली नेतृत्व को उम्मीद थी कि यह संघर्ष ईरान में बड़े राजनीतिक बदलाव का मार्ग खोल सकता है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में वार्ता प्रक्रिया में उसकी भूमिका सीमित होती नजर आ रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप द्वारा सोशल मीडिया पर समझौते के करीब होने संबंधी किया गया पोस्ट इजराइली नेतृत्व के लिए भी अप्रत्याशित था। यहां तक कि कई वरिष्ठ इजराइली अधिकारियों को भी इसकी पूर्व जानकारी नहीं थी। बताया गया है कि इस सार्वजनिक बयान के लगभग एक घंटे बाद दोनों नेताओं के बीच फोन पर बातचीत हुई। इस दौरान इजराइली प्रधानमंत्री ने किसी बड़े विरोध या बहस से परहेज किया। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि उन्हें यह आभास हो गया था कि समझौते की प्रक्रिया को रोक पाना अब संभव नहीं होगा।
इजराइल को आशंका है कि युद्ध समाप्त होने और समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद ईरान वार्ताओं को लंबा खींच सकता है। साथ ही, तेल निर्यात और संभावित आर्थिक राहत के जरिए वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को फिर से मजबूत कर सकता है। इजराइली पक्ष को यह भी चिंता है कि लेबनान में संभावित युद्धविराम की स्थिति में हिजबुल्लाह के खिलाफ उसकी सैन्य कार्रवाई पर अतिरिक्त सीमाएं लग सकती हैं। इसके अलावा, भविष्य में किसी बड़े सैन्य कदम से पहले वॉशिंगटन की राय लेने की आवश्यकता भी बढ़ सकती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सप्ताह की शुरुआत में इजराइल ने ईरान के ऊर्जा और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों को निशाना बनाने वाले बड़े हमलों की तैयारी कर ली थी। हालांकि अंतिम समय में अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद इन योजनाओं को आगे नहीं बढ़ाया गया। इसके बाद से वार्ता प्रक्रिया में इजराइल की भूमिका और सीमित हो गई है।

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