भारत की जेलों में बंद कैदियों का बड़ा हिस्सा अभी तक किसी मामले में दोषी घोषित नहीं हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश की कुल जेल आबादी में करीब 73 से 74 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं, जो अपने मामलों में अदालत के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया में हो रही देरी और जेल व्यवस्था की चुनौतियों को दर्शाती है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक देशभर की जेलों में पांच लाख से अधिक कैदी बंद हैं। इनमें लगभग तीन-चौथाई ऐसे लोग हैं जिनके मामलों का निपटारा अभी बाकी है। दूसरी ओर, दोष सिद्ध कैदियों की संख्या कुल कैदियों का लगभग 25 से 26 प्रतिशत है। इस असंतुलन के कारण जेलों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।


विचाराधीन कैदियों में युवाओं की हिस्सेदारी भी चिंता का विषय बनी हुई है। रिपोर्टों के अनुसार, करीब आधे अंडरट्रायल कैदी 18 से 30 वर्ष की आयु के हैं। सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया के चलते युवाओं का महत्वपूर्ण समय जेलों में बीत जाता है, जिससे उनके भविष्य और सामाजिक पुनर्वास पर असर पड़ सकता है।

देश की अधिकांश जेलें अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक कैदियों को रखने के लिए मजबूर हैं। राष्ट्रीय स्तर पर जेलों का औसत ऑक्यूपेंसी रेट 120 प्रतिशत से ज्यादा बताया जाता है। कुछ राज्यों में स्थिति और गंभीर है। राजधानी क्षेत्र की कई जेलों में क्षमता के मुकाबले लगभग दोगुने कैदी रहने की खबरें सामने आती रही हैं। इससे आवास, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक अदालतों में लंबित मामलों की बड़ी संख्या इस समस्या की प्रमुख वजह है। इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के कई आरोपी जमानत राशि जमा नहीं कर पाते या उन्हें समय पर पर्याप्त कानूनी सहायता नहीं मिल पाती, जिसके कारण वे लंबे समय तक जेल में रहते हैं।

स्थिति में सुधार लाने के लिए विभिन्न स्तरों पर कदम उठाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित अंडरट्रायल रिव्यू कमेटियां (यूटीआरसी) नियमित रूप से जेलों का निरीक्षण करती हैं और ऐसे कैदियों की पहचान करती हैं जिन्हें जमानत या कानूनी सहायता का लाभ मिल सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 39ए के तहत आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का प्रावधान भी किया गया है। इसके अलावा जेल सुधारों को ध्यान में रखते हुए मॉडल प्रिजन एंड करेक्शनल सर्विसेज एक्ट जैसे उपाय लागू किए गए हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जेलों में बढ़ती भीड़ को कम करने और न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के लिए लंबित मामलों का तेजी से निपटारा, न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि और जमानत प्रक्रिया को अधिक सरल एवं सुलभ बनाना आवश्यक है।

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