इंदौर के नालिया बाखल में रहने वाले अमन नामक युवक ने आईपीएल सट्टे में लाखों रुपए गंवाने के बाद आत्महत्या कर ली। वैसे ये खबर खबर कुछ दिनों तक चर्चा में रहेगी और फिर भुला दी जाएगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक युवक की मौत है या उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है, जो ऑनलाइन जुए और सट्टेबाजी के बढ़ते जाल को रोकने में लगातार असफल साबित हो रही है? सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है कि यह देश के लिए घातक है, लेकिन कोई समझ नहीं रहा है, क्योंकि किसी नेता-अफसर या मंत्री का बेटा ऑनलाइन गेमिंग का शिकार होकर सुसाइड नहीं कर रहा है...।

आज देश में हजारों नहीं, बल्कि लाखों युवा मोबाइल स्क्रीन पर चल रहे ऑनलाइन सट्टे और गेमिंग प्लेटफॉर्म के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। शुरुआत मनोरंजन के नाम पर होती है, फिर लालच बढ़ता है, हार की भरपाई के लिए दांव बड़ा होता जाता है और अंत में कर्ज, तनाव, पारिवारिक कलह तथा आत्महत्या जैसी मुसीबतें सामने आ रही है। घरों में कलह हो रहे हैं...  अमन  द्वारा की गई आत्महत्या का मामला भी इसी खतरनाक सिलसिले की एक कड़ी है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत तक ऑनलाइन सट्टेबाजी और बेटिंग को समाज के लिए गंभीर खतरा बता चुकी है। जवाबदेही सामाजिक सरोकार के तहत लगातार चेतावनी दे रहा है कि यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक स्थिरता और सामाजिक व्यवस्था पर सीधा हमला है। इसके बावजूद सरकारों का रवैया समझ से परे नजर आता है। कार्रवाई के नाम पर कभी-कभार कुछ एप बंद कर दिए जाते हैं, कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाता है या अवैध सट्टे के अड्डों पर छापेमारी कर दी जाती है, लेकिन इससे समस्या खत्म नहीं हो रही है। वास्तविकता यह है कि कानून व्यवस्था का बड़ा हिस्सा केवल सट्टा पकड़ने तक सीमित दिखाई देता है। सवाल यह है कि क्या कभी इस पूरे कारोबार को जड़ से खत्म करने की गंभीर राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई जाएगी? आखिर क्यों ऐसे प्लेटफॉर्म खुलेआम विज्ञापन करते हैं? क्यों क्रिकेट, फिल्म और सोशल मीडिया की दुनिया के प्रभावशाली चेहरे युवाओं को आकर्षित करने वाले प्रचार अभियानों का हिस्सा बनते हैं? और क्यों करोड़ों रुपए का यह कारोबार लगातार फल-फूल रहा है?

विडंबना यह है कि जब कोई युवा आत्महत्या करता है, तब उसके परिवार के हिस्से में केवल आंसू और पछतावा आता है। माता-पिता अपनी जमा-पूंजी गंवा देते हैं, बहनों की शादी रुक जाती है, बच्चों का भविष्य अंधकार में चला जाता है। लेकिन इन घटनाओं के लिए जवाबदेह कौन है? क्या केवल वह युवक, जिसने सट्टा खेला? या फिर वह तंत्र भी, जिसने इस लत को बढ़ने दिया? आज जरूरत केवल जागरूकता अभियान चलाने की नहीं है। जरूरत है कठोर और प्रभावी कानूनों की। ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए को बढ़ावा देने वाले प्लेटफॉर्म पर सख्त प्रतिबंध लगना चाहिए। विदेशी सर्वरों से संचालित एप और वेबसाइटों पर तकनीकी स्तर पर रोक लगाने के लिए केंद्र और राज्यों को मिलकर ठोस रणनीति बनानी होगी। इसके साथ ही ऐसे विज्ञापनों पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए जो युवाओं को आसान कमाई का सपना दिखाकर इस दलदल में धकेल रहे हैं। समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। रातोंरात अमीर बनने की मानसिकता ने मेहनत और ईमानदार कमाई के मूल्यों को कमजोर किया है। जब तक युवा यह नहीं समझेंगे कि सट्टा कभी किसी का स्थायी भविष्य नहीं बना सकता, तब तक यह संकट बना रहेगा। अमन जैसे न जाने कितने युवा मौत को गले लगा चुके हैं, और उनके परिवारों का दर्द भी शायद कभी कम नहीं होगा। लेकिन युवाओं की असमय मौतों पर सरकारें, प्रशासन और नीति-निर्माता नहीं चेते तो आने वाले दिनों में न जाने कितने और घरों के दीपक बुझेंगे। तब हर नई आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं होगी, बल्कि उस व्यवस्था पर आरोप-पत्र होगी जिसने खतरे को देखा, समझा और फिर भी आंखें मूंदे रखीं। देश को यह तय करना होगा कि वह युवाओं को रोजगार, अवसर और सुरक्षित भविष्य देना चाहता है या फिर उन्हें ऑनलाइन जुए और सट्टे के ऐसे अंधे कुएं में गिरते हुए सिर्फ देखता रहेगा। अब केवल चिंता व्यक्त करने का समय नहीं है, निर्णायक कार्रवाई का समय है।


Speed 0.9x
Idle

Post a Comment

Previous Post Next Post