कीमत सभी को चुकाना होगी, न अफसर बचेंगे और न नेता
देशभर में इस समय विकास के नाम पर सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। कहीं एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, कहीं फोरलेन और सिक्सलेन सड़कें, तो कहीं जंगलों के बीच पहाड़ काटकर चौड़ी सड़कें तैयार की जा रही हैं। सरकारें इन परियोजनाओं को आधुनिक भारत की तस्वीर बता रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास वास्तव में देश को सुरक्षित भविष्य दे रहा है या आने वाली पीढ़ियों के हिस्से की सांसें छीन रहा है? पेड़ों की कटाई का विरोध करने वालों के खिलाफ प्रकरण तक दर्ज करा दिए जाते हैं। कई जंगल काटे जा चुके हैं और कई जगह कटाई चल रही है, ऐसे में आने वाले समय में इस विकास की अंधी दौड़ की कीमत सभी को चुकाना होगी, न अफसर बचेंगे और न नेता ।
आज स्थिति यह है कि हजारों-लाखों पेड़ सड़क परियोजनाओं की बलि चढ़ रहे हैं। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे हो, चारधाम परियोजना हो या देशभर में फैलते एक्सप्रेसवे नेटवर्क, हर जगह सबसे पहले कुल्हाड़ी पेड़ों पर चलती है। पेड़, जो दशकों में बड़े होते हैं, उन्हें कुछ घंटों में काट दिया जाता है। फिर औपचारिकता निभाने के लिए कहीं कुछ पौधे लगा दिए जाते हैं, जिनमें से आधे कुछ महीनों में सूख जाते हैं। सरकारें आंकड़ों में हरियाली दिखा देती हैं, लेकिन जमीन पर जंगल खत्म होते जा रहे हैं।
एक तरफ लोगों को पेड़ लगाने के लिए संकल्प अभियान चलाए जाते हैं, ग्लोबल वार्मिंग की चिंता जताई जाती है, दूसरी तरफ धड़ल्ले से पेड़ों को काट दिया जाता है। पर्यावरण के खिलाफ जो अभी निष्ठुरता दिखाई जा रही है, वो भारी पड़ेगी ही। पेड़ धरती को ठंडा करने में मदद करते हैं। इंदौर का ही उदाहरण देख लो, ट्रैफिक सिग्नल के पास यदि पेड़ हैं तो लोग रेड लाइट जंप ही नहीं कर रहे हैं, चुपचाप पेड़ की छांव में दुबके नजर आते हैं..। देशभर के शहर, गांव और कस्बे ही भट्टी बन चुके हैं। तापमान हर साल नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है। बारिश का कोई भरोसा नहीं। कहीं बादल फट रहे हैं, कहीं सूखा पड़ रहा है। हिमालयी राज्यों में भूस्खलन बढ़ रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद विकास का मॉडल नहीं बदल रहा। पता नहीं लोगों की जिंदगी छीनने का प्रयास करने वाला ये कैसा विकास है?
असल समस्या सड़कें बनाना नहीं है, समस्या सोच की है। विकास का मतलब केवल कंक्रीट, डामर और चौड़ी सड़कें मान लिया गया है। किसी भी परियोजना की सफलता किलोमीटर में मापी जाती है, यह नहीं देखा जाता कि उसके बदले कितने जंगल खत्म हुए, कितने जलस्रोत सूखे और कितने जीवों का आशियाना उजड़ा।
जंगल काटकर बनाई गई सड़कें केवल पेड़ नहीं हटातीं, वे प्रकृति का संतुलन बिगाड़ देती हैं। हाथियों के कॉरिडोर टूटते हैं, वन्यजीव सड़कों पर मरते हैं, पहाड़ कमजोर होते हैं और शहरों का तापमान बढ़ता है। सबसे बड़ा नुकसान आम आदमी को होता है, गर्मी, प्रदूषण, जल संकट और बीमारियों के रूप में। दुर्भाग्य यह भी है कि पर्यावरण अब सरकारी फाइलों का विषय बन गया है। “ग्रीन क्लीयरेंस” महज दस्तावेजी प्रक्रिया बनती जा रही है। जिन विशेषज्ञों को जंगल बचाने की जिम्मेदारी है, उनकी आवाज अक्सर विकास की राजनीति में दब जाती है। विरोध करने वालों को “विकास विरोधी” कह दिया जाता है, जबकि सच यह है कि बिना पर्यावरण संरक्षण के कोई भी विकास स्थायी नहीं हो सकता।
दुनिया के कई देश ऐसी तकनीक अपना रहे हैं, जहां पेड़ों को बचाते हुए सड़कें बनाई जाती हैं। वन्यजीवों के लिए अंडरपास और ग्रीन कॉरिडोर बनाए जाते हैं। लेकिन भारत में अभी भी सबसे आसान रास्ता पेड़ काटना ही माना जाता है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में भारत के शहरों में सड़कें तो होंगी, लेकिन छांव नहीं होगी। गाड़ियां तो दौड़ेंगी, लेकिन सांस लेना मुश्किल होगा। विकास का असली अर्थ वही है जो इंसान और प्रकृति दोनों को साथ लेकर चले। केवल कंक्रीट का विस्तार किसी देश को महान नहीं बनाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण छोड़ना ही सच्चा विकास कहलाता है।
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