'स्क्रीन' पर सजा
सट्टे का संसार
बचपन कैद,
युवा बर्बाद..
सिर्फ व्यक्त की जा रही है चिंता
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच का कहना है कि राज्य संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 1 के तहत "सार्वजनिक व्यवस्था" पर अपनी विधायी शक्ति का इस्तेमाल करके ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए की गतिविधियों को विनियमित और प्रतिबंधित कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी गतिविधियों से जुड़े सामाजिक नुकसानों का सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के साथ पर्याप्त संबंध है।
जवाबदेही @ इंदौर
देश में ऑनलाइन गेमिंग अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक संकट का रूप लेती जा रही है। बच्चे पढ़ाई छोड़ रहे हैं, युवा कर्ज में डूब रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं और कई मामलों में आत्महत्या तक की नौबत आ रही है। इसके बावजूद सरकारें और जिम्मेदार एजेंसियां केवल चिंता व्यक्त करने तक सीमित दिखाई देती हैं। सवाल यह है कि जब ऑनलाइन गेमिंग की लत और उससे जुड़ी आर्थिक बर्बादी के दुष्परिणाम खुलेआम सामने हैं, तब इस पर प्रभावी नियंत्रण कौन करेगा? क्या सरकार किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रही है, या फिर करोड़ों युवाओं के भविष्य को बचाने के लिए ठोस और कठोर कदम उठाए जाएंगे? अब समय केवल चर्चा का नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई का है।
सुप्रीम कोर्ट कई बार समाज और देश हित को लेकर टिप्पणी करता है, लेकिन उस टिप्पणी को हमेशा इग्नोर किया जा रहा है। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए का व्यापक प्रसार सार्वजनिक व्यवस्था, सार्वजनिक शांति और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि तकनीकी विकास ने हर मोबाइल फोन को एक "वर्चुअल आम जुआ घर’ में बदल दिया और सट्टेबाजी व जुए को पूरे समाज में ज्यादा सामान्य और सुलभ बना दिया। इसके पहले सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि मुफ्त में मिलने वाली योजनाओं को बंद करना चाहिए। इन योजनाओं की वजह से लोग काम नहीं कर रहे हैं। इस विषय पर जवाबदेही भी स्पष्ट रूप से हमेशा सामाजिक सरोकार के तहत अपनी बात रखता है कि इन योजनाओं से लोगों में मुफ्तखोरी तो बढ़ ही रही है, साथ ही वह काम नहीं कर रहे है। कुशल कारीगर नहीं मिल रहे हैं। ज्यादातर श्रमिक मजदूर चौक पर ऑनलाइन गेम खेलते नजर आते हैं। पूरा दिन श्रम करने की बजाए वह कुछ घंटों में काम करने के पूरे दिन की हाजिरी तक मांग रहे हैं।
दरअसल, हमारे देश में स्मार्ट फोन से जो सुविधाएं लोगों को उठाना चाहिए, वह तो नहीं उठा रहे हैं, बल्कि स्मार्ट फोन का गलत उपयोग होने लगा है। आज युवा पीढ़ी पूरी तरह सोशल मीडिया पर निर्भर हैं। काम-धंधों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। पढ़े-लिखे युवाओं के साथ-साथ जो असाक्षर है, वो भी सिर्फ ऑनलाइन गेम खेल रहे हैं और कम समय में ज्यादा पैसा कमाने का लालच युवाओं को अपराध की ओर धकेल रहा है।
फिर भी ऑनलाइन गेम चल रहे हैं?
सरकार ने शुक्रवार (16 जनवरी 2026) को देश में अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए से जुड़ी 242 वेबसाइट्स के लिंक्स ब्लॉक करने के आदेश दिए। ‘ऑनलाइन गेमिंग एक्ट' बबने के बाद ये सरकार की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई कही गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिकअब तक 7,800 से अधिक अवैध सट्टेबाजी और जुआ वेबसाइटों को बंद किया जा चुका है।" सरकार का लक्ष्य उन प्लेटफार्मों पर नकेल कसना है जो त्वरित धन का लालच देकर लोगों को गुमराह करते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इसके बावजूद ऑनलाइन गेम के मामले थम नहीं रहे हैं। कोई आईपीएल के सट्टेबाजी में बर्बाद हो रहा है तो कोई अन्य ऑनलाइन गेमिंग का शिकार हो रहा है।
ऑनलाइन गेम कौन कराएगा बंद?
दुखद ये है कि अब देश में तेजी से बढ़ रही ऑनलाइन गेमिंग की लत अब एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने जहां तकनीक को आम आदमी तक पहुंचाया है, वहीं दूसरी ओर ऑनलाइन गेमिंग ने कई परिवारों की खुशियां छीन ली हैं। यह लत अब एक तरह के नशे की तरह लोगों की जिंदगी पर हावी होती जा रही है। कई लोग रात-दिन मोबाइल पर गेम खेलने में इतने मशगूल हो जाते हैं कि उन्हें अपने परिवार, काम और जिम्मेदारियों तक का ध्यान नहीं रहता। गौरतलब है कि ऑनलाइन गेमिंग की लत किसी साइलेंट किलर से कम नहीं है। यह धीरे-धीरे व्यक्ति की मानसिक स्थिति, आर्थिक स्थिति और सामाजिक संबंधों को खत्म कर देती है। पिछले कुछ वर्षों में देशभर से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां लोगों ने ऑनलाइन गेमिंग में भारी रकम गंवा दी और कर्ज के बोझ में दबकर आत्महत्या तक कर ली। कई युवाओं ने परिवार की जमा-पूंजी तक दांव पर लगा दी।
मोबाइल गेमिंग का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। कई कंपनियां आकर्षक विज्ञापन और इनाम का लालच देकर युवाओं को अपनी ओर खींच रही हैं। शुरुआत में लोग मनोरंजन के लिए गेम खेलते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है। खासकर किशोर और युवा वर्ग सबसे ज्यादा इसकी चपेट में आ रहा है। पढ़ाई करने की उम्र में कई बच्चे घंटों मोबाइल पर गेम खेलते रहते हैं, जिससे उनका भविष्य भी प्रभावित हो रहा है। सरकार को इस दिशा में काम करना चाहिए और ऑनलाइन इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के बजाए, इसे बंद कर स्कील डेवलपमेंट की तरफ बच्चों का ध्यान आकर्षित करना होगा। नहीं तो ये ऑनलाइन की वजह से युवा पीढ़ी बर्बाद ही होगी।
डिजिटल युग जुए की प्रकृति
तकनीकी विकास ने सट्टेबाजी और जुए की गतिविधियों के पैमाने और पहुंच को मौलिक रूप से बदल दिया है। कोर्ट ने कहा कि स्मार्टफ़ोन, इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल पेमेंट सिस्टम की वजह से ऑनलाइन मनी गेमिंग तेजी से बढ़ा है। कोर्ट ने कहा कि लोग जितनी आसानी से गेमिंग प्लेटफॉर्म तक पहुंच पाते हैं, उसकी वजह से सट्टेबाजी और जुआ काफी हद तक आम बात बन गई। ऑनलाइन मनी गेमिंग में हिस्सा लेना अब सिर्फ कुछ खास लोगों तक ही सीमित नहीं रह गया। कोर्ट के सामने रखे गए आंकड़ों से पता चला कि बड़ी संख्या में खिलाड़ी गाँव के इलाकों और कम इनकम वाले ग्रुप से आते हैं। पारंपरिक जुआ कानूनों का मकसद आम जुआ घरों को फैलने से रोकना था, लेकिन डिजिटल जमाने में यह मकसद काफी हद तक कमजोर पड़ गया।
सेलिब्रिटियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए
देश में तेजी से बढ़ रही ऑनलाइन गेमिंग की लत को लेकर अब समाज में चिंता गहराने लगी है। जवाबेदेही सामाजिक सरोकार के तहत सरकार से अपील करता है कि ऑनलाइन गेमिंग का प्रचार-प्रसार करने वाले सेलिब्रिटियों पर कानून का शिकंजा कसना चाहिए। अभिनेता, खिलाड़ी और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मोटी रकम लेकर इन गेम्स का विज्ञापन करते हैं, जिससे युवा वर्ग तेजी से इसकी ओर आकर्षित हो रहा है। दरअसल, टीवी, इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार ऐसे विज्ञापन दिखाई देते हैं, जिनमें प्रसिद्ध सेलिब्रिटी ऑनलाइन गेम खेलकर बड़ी रकम जीतने का दावा करते नजर आते हैं। इन विज्ञापनों को देखकर युवा ये समझने लग जाते हैं कि वे भी आसानी से पैसा कमा सकते हैं। इसी लालच में कई युवा ऑनलाइन गेमिंग के जाल में फंस जाते हैं और धीरे-धीरे इसकी लत का शिकार हो जाते हैं। वहीं, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच का कहना है कि राज्य संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 1 के तहत "सार्वजनिक व्यवस्था" पर अपनी विधायी शक्ति का इस्तेमाल करके ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए की गतिविधियों को विनियमित और प्रतिबंधित कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी गतिविधियों से जुड़े सामाजिक नुकसानों का सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के साथ पर्याप्त संबंध है। कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन मनी गेमिंग का जनता पर लत, वित्तीय नुकसान और उसके परिणामस्वरूप होने वाली आत्महत्याओं के मामले में निश्चित प्रभाव पड़ता है। कोर्ट ने ये टिप्पणियां तमिलनाडु और कर्नाटक के उन कानूनों को सही ठहराते हुए कीं, जो ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए पर प्रतिबंध लगाते हैं, यहां तक कि कौशल वाले खेलों पर भी। (शेष पेज 4 पर)
गंभीर टिप्पणी...
“लत और मौद्रिक नुकसान के मामले में और परिणामी व्यापक आत्महत्याओं के मामले में, ऑनलाइन मनी गेमिंग का जनता पर निश्चित प्रभाव पड़ता है। जब ऐसा मामला है, तो यह स्वीकार करना होगा कि ऑनलाइन मनी गेमिंग सट्टेबाजी और जुए को अधिक सामान्य और सुलभ बनाकर जनता की शांति को अशांत कर रहा है। इसलिए, सार्वजनिक शांति भंग होती है और परिणामस्वरूप, राज्यों के पास लोक व्यवस्था का आह्वान करने और इस बुराई को रोकने और सार्वजनिक शांति बहाल करने की क्षमता होगी।”


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